चीन भले ही आज विकास की तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, लेकिन उसकी सभ्यता और संस्कृति हज़ारों साल पुरानी है। चीन में अपनी सभ्यता और वैश्विक सभ्यताओं को जोड़ने और एक-दूसरे से सीखने की कोशिश हो रही है। यह वाकई में बहुत सराहनीय पहल है, क्योंकि आधुनिकता के इस दौर में भी हमें जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। इस बारे में चीन से सीखने की आवश्यकता है। जहां तक हम एशियाई सभ्यता की बात करें तो वह पारिवारिक मूल्यों पर आधारित होती है। आप चाहे चीन, भारत या अन्य देशों का उदाहरण लें, ये सब परिवार को बहुत महत्व देते हैं। इन देशों में परिवार के मूल्य अपनी गहरी जड़ें जमाए हुए हैं।
हाल में चीन के शानतोंग प्रांत के छ्वीफू में विश्व सभ्यताओं पर हुए सम्मेलन में चीन के साथ-साथ कई देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसमें भारत से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) में बौद्ध धर्म और पाली विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अरुण कुमार यादव भी पहुंचे। इस दौरान चाइना मीडिया ग्रुप (सीएमजी) के अधीनस्थ सीजीटीएन हिंदी के संवाददाता अनिल पांडेय ने उनके साथ इंटरव्यू किया।
प्रो. यादव बौद्ध धर्म के साथ-साथ चीनी सभ्यता और चीनी समाज के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। वे कहते हैं कि दुनिया भर के तमाम देशों और सभ्यताओं को देखें तो समझ में आता है कि हर सभ्यता का अपना खास महत्व है। लेकिन हम लोग अक्सर अपने ही दायरे में सीमित रहते हुए समझते हैं कि हमारी सभ्यता बेहतर है। यह इसीलिए होता है क्योंकि हम एक-दूसरे के साथ संवाद नहीं करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हमें अन्य सभ्यताओं के बारे में भी जानें और समझें। इस तरह, हर दिशा से विभिन्न समाज के लोगों की सोच सामने आनी जरूरी है। ऐसे में चीन द्वारा शुरू की गयी इस पहल की तारीफ करनी चाहिए। इससे कई देशों के विद्वान और जानकारों को एक बड़ा मंच मिल गया है। जिसके माध्यम से वे अपने देश, समाज और सभ्यता के बारे में गहन जानकारी साझा करते हैं।
प्रो. यादव ने कहा कि जहां तक हम एशियाई सभ्यता की बात करते हैं तो वह पारिवारिक मूल्यों पर आधारित होती है। आप चाहे चीन, भारत या अन्य देशों का उदाहरण लें, ये सब परिवार को बहुत महत्व देते हैं। इन देशों में परिवार के मूल्य गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। मसलन यूरोपीय सभ्यताओं का उल्लेख आता है तो हमारे वहां भी आम लोगों को वहां की कुछ खास जानकारी नहीं होती। लेकिन जब सभ्यताओं के बारे में बैठक और सम्मेलन आयोजित होते हैं तो उनसे आदान-प्रदान बढ़ता और समझ भी बढ़ती है।
लेकिन हमें यह समझना होगा कि विकास करने के साथ हम अपनी सभ्यता व संस्कृति को नहीं भूल सकते। हमें इस बाबत संतुलन बनाए रखने की जरूरत है, ताकि आधुनिकता और प्राचीन संस्कृति दोनों साथ-साथ चल सकें। इन्टरव्यू में प्रो. यादव ने यह भी कहा कि चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग बार-बार अपनी सभ्यता और संस्कृति को समझने की बात करते हैं। इसके लिए हज़ारों वर्षों की सभ्यता वाला यह देश आधुनिक होने के बाद भी अपने मूल्य और परंपरा को बरकरार रखे हुए है। यह अपने आप में बड़ी बात है, जो चीन को एक समृद्ध देश बनाता है।
(अनिल पांडेय, चाइना मीडिया ग्रुप)

