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सभ्य संवाद से सामरिक संतुलन तक: 75 सालों में चीन और भारत के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग की यात्रा

1 अप्रैल 2025 को चीन और भारत के बीच राजनयिक सम्बंधों की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ है। विश्व की दो सबसे अधिक जनसंख्या वाली प्राचीन सभ्यताओं के रूप में, चीन-भारत सम्बंध हमेशा सहयोग और प्रतिस्पर्धा, संवाद और टकराव से जुड़े रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू युग के “हिंदी-चीनी भाई-भाई“ से लेकर नरेंद्र मोदी युग के “एशियाई शताब्दी“ के दृष्टिकोण तक, तथा वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व में रणनीतिक खेल तक, चीन-भारत सम्बंध आदर्शवाद से व्यावहारिकता की ओर बढ़ चुके हैं। 75 वर्षों के आदान-प्रदान के दौरान, दोनों देशों ने सभ्यताओं के बीच आपसी सीख की गहन विरासत को साझा किया है, और साथ ही, जटिल भू-राजनीतिक चुनौतियों का भी सामना किया है।

वास्तव में, चीन और भारत के बीच आदान-प्रदान के इतिहास को मानव सभ्यताओं के बीच आदान-प्रदान का एक मॉडल माना जा सकता है। चीन में बुद्ध के ज्ञान के प्रसार से लेकर बौद्ध धर्मग्रंथों की खोज के लिए ह्वेनत्सांग की पश्चिम यात्रा तक, पश्चिम की ओर अपनी सात यात्राओं के दौरान कालीकट में रुकने वाले चंग हे के बेड़े से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर के विश्वभारती विश्वविद्यालय में चीनी भवन तक, समय और स्थान से परे ये सांस्कृतिक प्रतीक दोनों देशों के बीच सम्बंधों की सबसे मजबूत आध्यात्मिक नींव का निर्माण करते हैं।

जब साल 1950 में दोनों देशों ने राजनयिक सम्बंध स्थापित किये तो भारत नये चीन को मान्यता देने वाला पहला गैर-समाजवादी देश था। चीनी प्रधानमंत्री चोउ एनलाई द्वारा समर्थित “शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों” का भारत द्वारा समर्थन किया गया, दोनों देशों ने संयुक्त रूप से अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों के इतिहास में एक गौरवशाली अध्याय लिखा है। यहां तक ​​कि सन् 1962 में सीमा संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच के सम्बंधों पर जमी बर्फ के दौरान भी, गंगा और यांग्त्ज़ी नदी के बीच सभ्य संवाद कभी भी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ।

नई सदी की शुरुआत से ही, चीन-भारत सम्बंधों ने अभूतपूर्व बहुआयामी विशेषताएं दर्शायी हैं। आर्थिक पहलू में, द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा साल 2000 में 2.9 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर साल 2023 में 136.2 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई, जो लगभग 50 गुना वृद्धि है। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है, वहीं भारत दक्षिण एशिया में चीन का सबसे महत्वपूर्ण बाजार है। स्मार्टफोन से लेकर फोटोवोल्टिक्स तक, फार्मास्युटिकल कच्चे माल से लेकर इलेक्ट्रिक वाहन आपूर्ति श्रृंखला तक, चीन और भारत के बीच आर्थिक पूरकता लगातार प्रमुख होती जा रही है।

उधर, भू-राजनीतिक पहलू में, “बेल्ट एंड रोड” पहल के खिलाफ भारत की सतर्कता से लेकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर विवाद तक, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर टकराव से लेकर “क्वाड” में भारत के शामिल होने तक, दोनों देशों के बीच रणनीतिक संदेह हमेशा बना रहा है।

वहीं, वैश्विक शासन के पहलू में, जलवायु परिवर्तन का मुकाबला, ब्रिक्स तंत्र का विस्तार, और विश्व व्यापार संगठन में सुधार जैसे मुद्दों पर चीन और भारत की मांगें समान हैं और नियम बनाने की शक्ति को लेकर विवाद भी हैं।

हाल के वर्षों में, “एशियाई शताब्दी” की अवधारणा का उल्लेख बार-बार किया गया है। चीन और भारत एशिया में सबसे बड़ी आबादी और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले दो देश हैं। “एशियाई शताब्दी” की प्राप्ति चीन-भारत सम्बंधों की स्थिरता से अविभाज्य है। मुख्य बात दोनों देशों के संतुलित विकास में निहित है और यह कि क्या वे शून्य-राशि सोच से आगे बढ़ सकते हैं और सहयोग का एक नया मॉडल ढूंढ सकते हैं।

साल 2020 में गलवान घाटी संघर्ष के बाद, चीन और भारत ने एक सैन्य हॉटलाइन और बफर ज़ोन तंत्र स्थापित किया, और उनका संकट प्रबंधन-नियंत्रण परिपक्व हो गया। पिछले हफ़्ते  मंगलवार, यानी 25 मार्च 2025 को, चीन की राजधानी पेइचिंग में आयोजित नवीनतम चीन-भारत सीमा मामलों के परामर्श के दौरान “सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सौहार्द बनाए रखना” पर बनी आम सहमति, दोनों देशों को “एशियाई शताब्दी” के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए एक अपरिहार्य सुरक्षा आधार प्रदान करेगी। 

वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधियों के रूप में, चीन और भारत के वैश्विक शासन में कई समान हित हैं। जैसे जलवायु परिवर्तन का मुकाबला, वैश्विक वित्तीय ढांचे में सुधार, तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता का शासन, इत्यादि। दोनों देशों के बीच सम्बंधों का वैश्विक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव पड़ेगा तथा यह विश्व के भावी मार्ग और दिशा को गहराई से आकार देगा। यदि चीन और भारत अपने-अपने रुख में समन्वय स्थापित करते हैं और वैश्विक शासन में सहयोग को मजबूत करते हैं, तो इससे न केवल अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ को बल मिलेगा, बल्कि “एशियाई शताब्दी” के आगमन में भी तेजी आएगी।

राजनीतिक सम्बंधों में कभी-कभार उतार-चढ़ाव होने के बावजूद, चीन और भारत के बीच मानविकी आदान-प्रदान बढ़ता जा रहा है। चीन में बॉलीवुड फिल्मों की लोकप्रियता, योग और ताईची के बीच मन-शरीर दार्शनिक संवाद, दोनों देशों के बीच शैक्षिक सहयोग का विस्तार… मानविकी आदान-प्रदान, सम्बंधों पर जमी बर्फ को तोड़ने और राजनीतिक सम्बंधों के लिए लचीला बफ़र प्रदान करने वाला “सॉफ्ट पावर” बन गया है। 

75 वर्षों के चीन-भारत सम्बंधों ने यह साबित कर दिया है कि दोनों देशों को “या तो मित्र या शत्रु” की पूर्ण अवधारणा से ऊपर उठ कर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के तरीके तलाशने चाहिए। “ड्रैगन-हाथी टैंगो” में दोनों को पूर्ण सामंजस्य में चलने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें अपनी लय खोजने और टकराव में संतुलन तलाशने की आवश्यकता है। आज, राजनयिक सम्बंधों की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ पर, चीन-भारत सम्बंध कोई साधारण “मित्रता” या “टकराव” नहीं है, न ही यह काले या सफेद का कोई साधारण आख्यान है। दोनों देशों को एक-दूसरे के साथ मिलकर सह-अस्तित्व के लिए एक अधिक परिपक्व और व्यावहारिक तरीका ढूंढना चाहिए, यानी कि साथ ही अपने मूल हितों की रक्षा करते हुए, बहुध्रुवीय विश्व के लिए “विविधता में सामंजस्य” का पूर्वी समाधान प्रदान करना चाहिए।

जब “ड्रैगन-हाथी टैंगो” रूपक से वास्तविकता में बदल जाता है, तो इसका महत्व न केवल दो सभ्यताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने में निहित होता है, बल्कि मानव जाति के साझा भविष्य वाले समुदाय के लिए एक नई संभावना प्रदान करने में भी निहित होता है।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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