अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के विभिन्न देशों ने दूसरों के लोगों को प्रभावित करने के लिए प्रचार और जनमत का इस्तेमाल करना कभी नहीं छोड़ा है, क्योंकि वे समझते हैं कि उनके मन को नियंत्रित करने से वे उनके व्यवहार को नियंत्रित कर सकते हैं। जनमत, संस्कृति और कला में अपने प्रभुत्व का लाभ उठाते हुए, पश्चिम ने मीडिया, साहित्य, कला, फिल्म, टेलीविजन और अन्य माध्यमों से विकासशील देशों के लोगों के मन में घुसपैठ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि विकासशील देशों में बहुत से लोग लंबे समय से पश्चिमी राजनीतिक और सांस्कृतिक विचारधाराओं से प्रभावित रहे हैं, और उनका संज्ञान पश्चिमी विचारधाराओं से अविभाज्य है।
इधर के वर्षों में पश्चिमी विचारों ने चीन और भारत जैसे विकासशील देशों के शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों में तेज़ी से प्रवेश किया है। पश्चिमी विचारधारा ने हम पर गहरा प्रभाव डाला है, हमारे यहां बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित बुद्धिजीवियों की दिमाग पहले से ही पश्चिमीकृत है। कुछ लोग, इस “वैचारिक उपनिवेशीकरण” के गुलाम होकर, जानबूझकर अमेरिकी और पश्चिमी विचारधारा से जुड़ जाते हैं, और परिणामस्वरूप अपने पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों को अस्वीकार कर देते हैं। यह निर्विवाद है कि मानवता की कुछ अहम सांस्कृतिक विरासत पश्चिम से आती है, और विकासशील देशों के लोगों को निश्चित रूप से इससे सीखना चाहिए। लेकिन तथाकथित “वैचारिक उपनिवेशीकरण” का अर्थ है सही-गलत में भेद किए बिना पश्चिमी मूल्यों को आँख मूँदकर अपनाना, और इस प्रकार पश्चिमी हितों की पूर्ति के लिए अपने हितों के साथ विश्वासघात करना। एक मिसाल है कि चीन और भारत सहित कई विकासशील देशों के छात्रों ने संयुक्त राज्य अमेरिका को अपने शैक्षणिक और व्यावसायिक विकास के लिए एक स्थान के रूप में देखा है, जिसके परिणामस्वरूप विकासशील देशों की प्रतिभाओं का प्रत्यक्ष रूप से भारी नुकसान हुआ है।
अमेरिकी आधिपत्य के पतन के साथ, दुनिया भर के लोग अमेरिका और पश्चिमी मूल्य प्रणालियों में निहित स्वार्थ, पाखंड और दोहरे मानदंडों के प्रति अधिक जागरूक हो गए हैं, और अमेरिकी वैचारिक उपनिवेशवाद की नींव हिलने लगी है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने जानबूझकर अन्य देशों की स्थानीय संस्कृतियों का दमन किया है, साथ ही अमेरिका-ब्रिटिश आधिपत्य ने वैश्विक उपनिवेशीकरण के माध्यम से अंग्रेजी भाषा को जबरन दुनिया भर में फैला दिया, जिससे यह राजनीति, व्यापार, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और जनमत की सार्वभौमिक भाषा बन गई। दुरभाग्यवश, चीन और भारत सहित कुछ विकासशील देशों ने अंग्रेजी वैश्वीकरण की प्रवृत्ति को अपनाकर इसके भाषा आधिपत्य को मजबूत कर दिया है। अपनी प्रमुख विमर्श शक्ति का लाभ उठाते हुए, अमेरिका और पश्चिम एक साथ खुद को महिमामंडित करते हैं और अन्य देशों को कलंकित करते हैं। वे विभिन्न राष्ट्रों की छवि गढ़ने और इस प्रकार वैश्विक जनमत को नियंत्रित करने के लिए “लोकतंत्र” और “तानाशाही”, “स्वतंत्रता” और “अधिनायकवाद”, “बाज़ार अर्थव्यवस्था” और “गैर-बाज़ार अर्थव्यवस्था” जैसी अवधारणाओं का उपयोग करते हैं।
आज की डिजिटल दुनिया में संज्ञानात्मक युद्ध और तेज़ हो गया है। एल्गोरिदम और कंप्यूटिंग शक्ति के विस्तार के साथ, अमेरिका और पश्चिम ने “वैचारिक उपनिवेशीकरण” के माध्यम से विकासशील देशों में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों को विकसित किया है, और उनका उपयोग इस विचार का प्रचार करने के लिए किया है कि पश्चिमी सब कुछ अच्छा है और गैर-पश्चिमी सब कुछ पिछड़ा और अज्ञानी है। मीडिया और कला सहित विभिन्न वैचारिक माध्यमों से संचालित यह “संज्ञानात्मक युद्ध” एक सच्चा युद्ध है, जो सीधे दूसरे देशों के लोगों के दिमाग को निशाना बनाता है। विशेष रूप से, सोशल नेटवर्क दर्शकों की धारणाओं को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकते हैं, और एआई द्वारा संचालित डीपफेक वीडियो साक्ष्यों का उपयोग विदेशों को कलंकित करने के लिए किया जा सकता है। वैश्विक दक्षिण के एक सदस्य के रूप में, चीन ने मानव जाति के लिए एक साझा भविष्य वाले समुदाय के निर्माण के ढाँचे के तहत वैश्विक विकास पहल, वैश्विक सुरक्षा पहल, वैश्विक सभ्यता पहल और वैश्विक शासन पहल सहित कई प्रस्ताव प्रस्तुत किए हैं। इनका उद्देश्य संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम के आध्यात्मिक उपनिवेशीकरण के नियंत्रण से मुक्त होना और दुनिया के लोगों को सच्ची समानता और स्वतंत्रता के आधार पर मुक्त विकास प्राप्त करने में सक्षम बनाना है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)

