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कूटनीतिक के बाद सांस्कृतिक रिश्तों पर जोर

बेहतर कूटनीतिक और राजनीतिक रिश्तों के बिना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रों के बीच समन्वय और कारोबार की कल्पना कम से कम आज के दौर में बेमानी है। सांस्कृतिक रूप से जुड़े होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय संबंधों की महत्वपूर्ण धुरी कूटनीतिक और राजनीतिक रिश्ते ही हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इतने भर से साथ नहीं आ सकती, राष्ट्रों की जनता भी एक साथ खड़ी नहीं हो सकती, जब तक कि राष्ट्रों के बीच सॉफ्ट पॉवर पॉलिटिक्स को बढ़ावा नहीं मिले। साहित्य, संगीत, नाटक, कलाएं आदि  के जरिए राष्ट्रों के बीच ना सिर्फ वैचारिक आदान-प्रदान होता है, बल्कि राष्ट्रों की जनता एक-दूसरे के करीब आती है। एक-दूसरे की संस्कृतियों को समझने की कोशिश करती है। शायद यही वजह है कि शांगहाई सहयोग संगठन के देशों के लेखकों को साथ लाने की कोशिश कर रही है। दिल्ली में विगत 25 और 26 सितंबर को हुए दूसरे शांगहाई सहयोग संगठन के युवा लेखकों का सम्मेलन का मूल उद्देश्य संगठन के सदस्य देशों के लोगों को सांस्कृतिक और सांस्कृतिक स्तर पर एक साथ लाना और इस बहाने संगठन के देशों के बीच कूटनीति के साथ ही सांस्कृतिक समन्वय बनाना रहा है। 

दिल्ली के अशोक होटल में दो दिनों तक चले इस सम्मेलन का आयोजन भारत के राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने किया था। यह संगठन भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था है। इस आयोजन में भारतीय विदेश मंत्रालय का भी सहयोग रहा। भारत में आयोजित यह दूसरा सम्मेलन रहा। इस बार के सम्मेलन का प्रमुख विषय रहा-डिजिटल युग में रचनात्मक क्षेत्रों का विकास:एससीओ के युवा लेखकों के बीच संवाद।

इस सम्मेलन में एससीओ सदस्य देशों के 40 वर्ष से कम उम्र के युवा लेखकों, शोधकर्ताओं और विद्वानों को एक साथ लाने में कामयाब रहा। इस दौरान साहित्य, कला और रचनात्मक उद्योगों में डिजिटल प्रौद्योगिकी की उभरती भूमिका पर बौद्धिक आदान-प्रदान, अंतर-सांस्कृतिक जुड़ाव और सहयोगी संवाद के लिए एक मंच मिला। इस बार की चर्चा में ज्ञान सृजन, लेखन, प्रकाशन, सिनेमा, संगीत, कला, संस्कृति, रेडियो और टेलीविजन पर डिजिटलीकरण के प्रभाव पर विचार किया गया। प्रौद्योगिकी और रचनात्मकता, बौद्धिक संपदा, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और डिजिटल विभाजन को दूर करने के बीच तालमेल पर विशेष जोर दिया गया।

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए भारतीय विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने कहा कि शांगहाई सहयोग संगठन सिर्फ राजनीतिक और आर्थिक मंच नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव का भी सशक्त माध्यम है। इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि के तौर पर भारत के स्कूली शिक्षा विभाग के सचिव संजय कुमार का कहना था कि साझा साहित्य और संस्कृति के ज़रिए एससीओ देशों के बीच सभ्यतागत रिश्तों को मजबूत किया जा सकता है। इसके साथ यह भी जरूरी है कि  तकनीकी प्रगति के साथ पुस्तकों के जरिए भी एक-दूसरे की संस्कृतियों को समझा जा सकता है। भारतीय विदेश विदेश मंत्रालय के अधिकारी आलोक डिमरी को इस सम्मेलन के जरिए लगता है कि एससीओ देशों के युवा ऐसे सम्मेलनों के जरिए करीब आएंगे। ऐसे में एससीओ सचिवालय की सलाहकार मिनारा रखानोवा का भारत के प्रयासों की तारीफ करना और युवा रचनात्मक प्रतिभाओं को समर्थन देने की आवश्यकता पर जोर देना ठीक ही कहा जाएगा। 

इस युवा लेखक सम्मेलन में लेखन, संगीत, सिनेमा, कला, रेडियो और टेलीविजन जैसे विषयों पर डिजिटलीकरण के प्रभावों पर गहन चर्चा हुई। लेखन सत्र में एआई और पारंपरिक प्रकाशनों के बीच संतुलन पर भी गहनता से विचार हुआ। चीन, उज्बेकिस्तान और रूस के प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए नए दौर में तकनीक पर बढ़ती निर्भरता की चर्चा की।  

इस सम्मेलन के संगीत सत्र में भारतीय प्राचीन संस्कृत पुस्तक सामवेद से लेकर आज के डिजिटल प्लेटफॉर्म तक की यात्रा पर चर्चा हुई। यहां बताना जरूरी है कि सामवेद संगीत का ही वेद कहा जाता है। इस दौरान सदस्य देशों के लेखकों ने एआई की रचनात्मक क्षमता को स्वीकार करते हुए इसके दुरुपयोग को लेकर दुनिया को सचेत रहने की बात कही। सम्मेलन के सिनेमा सत्र में भारत और ईरान के सिनेमा के सामाजिक प्रभावों पर गहराई से बात तो हुई ही, सिनेमा को सॉफ्ट पावर के साधन के तौर पर स्वीकार भी किया गया। 

कला और संस्कृति सत्र में डिजिटल युग में कलात्मक अभिव्यक्ति और अभिलेखन पर बहस होना स्वाभाविक कहा जाएगा। लेखक सम्मेलन में रेडियो और टेलीविजन की बदलती भूमिका भी चर्चा का विषय रही। रेडियो सत्र में पॉडकास्टिंग के युग में मौखिक संस्कृति के पुनरुत्थान को हर देश के लेखक ने स्वीकार किया। हालांकि सब का मानना रहा कि मौजूदा तकनीकी दौर में डिजिटल प्लेटफॉर्म देशों के बीच सांस्कृतिक पुल की भूमिका निभा रहे हैं। इनके जरिए संस्कृतियां भी एक-दूसरे की करीब आ रही हैं।

शांगहाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के युवा लेखकों का पहला सम्मेलन भारत की अध्यक्षता में साल 2023 में 12-13 अप्रैल को भारत की राजधानी दिल्ली के लीला पैलेस होटल में हुआ था। इस कार्यक्रम के जरिए एससीओ देशों के युवा लेखकों और विद्वानों को सार्थक वैचारिक आदान-प्रदान के लिए एक साथ लाने की कोशिश हुई थी। पहले सम्मेलन का मकसद इतिहास और दर्शन, अर्थव्यवस्था, धर्म, संस्कृति, साहित्य और विज्ञान एवं चिकित्सा जैसे विषयों पर उनके वैचारिक नजरिए को साथ लाने और एक-दूसरे को समझने में मदद करना था। इस सम्मेलन में संगठन के सदस्य देशों के 13 लेखक-विद्वानों ने छह साहित्यिक सत्रों में अपनी बातें रखीं थीं। इस सम्मेलन में रूस, कजाकिस्तान, किर्गिज़ गणराज्य और भारत सहित पूरे क्षेत्र के प्रतिभागी एक साथ आए थे। जबकि दूसरे सम्मेलन में भारत, कज़ाकिस्तान, चीन, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, बेलारूस और ईरान सहित एससीओ सदस्य देशों के 40 वर्ष से कम आयु के 24 लेखकों ने हिस्सा लिया। 

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)

 

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