हर साल की तरह इस साल भी भारत की राजधानी की हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक गिर चुकी है। जैसे-जैसे तापमान में गिरावट आ रही है, वैसे-वैसे घनी धुंध और प्रदूषण भी हवा को जहरीला बना रहा है। इंडिया टुडे के अनुसार दिल्ली का समग्र वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) हाल ही में 264 तक पहुंच गया, जो “खराब”श्रेणी में आता है। इकोनॉमिक टाइम्स ने भी लिखा कि दिल्ली में धुंध अब एक “वार्षिक विशेषता” बन चुकी है।
इसी बीच एक दिलचस्प बात यह है कि भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया पर कहा कि “चीन भी कभी गंभीर धुंध से जूझता था, लेकिन अब हम नीले आसमान की ओर अपनी यात्रा साझा करने के लिए तैयार हैं।” इस टिप्पणी ने फिर से चर्चा छेड़ दी कि आखिर भारत वायु प्रदूषण नियंत्रण में चीन से क्या सीख सकता है। साल 2013 चीन के लिए निर्णायक साबित हुआ, जब चीन की सरकार ने “वायु प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण पर कार्य योजना” जारी की।
इसके बाद चीन ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक व्यवस्थित और व्यावहारिक ढांचा खड़ा किया, जिसके तहत कई स्तरों पर सुधार किए गए, जिसमें वैज्ञानिक निगरानी प्रणाली का निर्माण, स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण, औद्योगिक ढांचे में सुधार और क्षेत्रीय सहयोग शामिल हैं। भारत और चीन दोनों की पर्यावरणीय चुनौतियां कई मायनों में समान हैं — फसल जलाना, वाहनों का उत्सर्जन, और औद्योगिक गतिविधियां दोनों देशों में प्रदूषण के बड़े कारण हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ऊर्जा संक्रमण, निगरानी प्रणाली, क्षेत्रीय सहयोग मॉडल और जनसहभागिता और सख्त नीति जैसे क्षेत्रों में चीन के अनुभव से प्रेरणा ले सकता है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन और भारत पहले से ही सौर ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं, और यह साझेदारी प्रदूषण नियंत्रण के क्षेत्र में भी बढ़ाई जा सकती है। वायु प्रदूषण से निपटने में सहयोग न केवल तकनीकी रूप से लाभकारी होगा, बल्कि यह दोनों देशों के बीच विश्वास और संवाद के नए रास्ते भी खोलेगा।
चीन का अनुभव यह दर्शाता है कि वायु प्रदूषण से निपटना कोई एक-दो साल का काम नहीं, बल्कि यह दीर्घकालिक और कठिन लड़ाई है — जिसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्पष्ट नीति, और निरंतर निवेश ज़रूरी है। अगर भारत चीन के अनुभवों को अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे के अनुरूप ढाल सके, तो शायद आने वाले वर्षों में दिल्ली और अन्य शहरों का आसमान भी नीला नजर आए न कि धुंध से ढका हुआ।
(दिव्या पाण्डेय – चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)