27 जनवरी को भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने लगभग बीस वर्षों की लंबी वार्ता के बाद एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर सहमति प्राप्त की। यह करार वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 25 प्रतिशत, वैश्विक व्यापार के एक-तिहाई हिस्से और दो अरब से अधिक जनसंख्या को समेटता है। यह न केवल भारत-यूरोपीय संघ के द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापारिक संबंधों में एक मील का पत्थर है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार व्यवस्था के विकास में एक महत्वपूर्ण संकेत भी है, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आर्थिक वृद्धि में नई ऊर्जा भर रहा है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य से यह समझौता बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को सशक्त बनाने का स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। बढ़ते व्यापार संरक्षणवाद और बदलते भू-आर्थिक रुझानों के बीच भारत और यूरोपीय संघ ने 96.6 प्रतिशत द्विपक्षीय व्यापार वस्तुओं पर शून्य या घटे हुए टैरिफ लागू करने पर सहमति व्यक्त की है, जिससे खुले और पारस्परिक सहयोग के लिए एक नया सेतु तैयार हुआ है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है—भारत, यूरोपीय संघ से आयातित कारों पर लगने वाले टैरिफ को वर्तमान 110 प्रतिशत से घटाकर क्रमिक रूप से 10 प्रतिशत तक लाएगा।
इसके अलावा, प्रति वर्ष 2.5 लाख वाहनों का आयात कोटा निर्धारित किया गया है, जिससे BMW, मर्सिडीज-बेंज और फॉक्सवैगन जैसी यूरोपीय कंपनियों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। वाइन पर टैरिफ 150 प्रतिशत से घटाकर अंततः 20 प्रतिशत तक कर दिया जाएगा, जबकि जैतून के तेल पर पाँच वर्षों तक कोई शुल्क नहीं लगेगा। मशीनरी और रासायनिक उत्पादों पर आयात शुल्कों में भी उल्लेखनीय कमी की जाएगी। ये कदम न केवल संरक्षणवाद की प्रवृत्ति का प्रत्युत्तर हैं, बल्कि वैश्विक व्यापार उदारीकरण के एक व्यावहारिक मॉडल का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। “EU की पूँजी और तकनीक” तथा “भारतीय बाज़ार और श्रमशक्ति” का यह पूरक संयोजन वैश्विक औद्योगिक श्रृंखला में विविधता को प्रोत्साहित करेगा और विश्व अर्थव्यवस्था को अधिक संतुलित बहुध्रुवीय दिशा में आगे बढ़ने में मदद देगा।
स्थानीय विश्लेषकों के विचार में यह समझौता “मौक़ों और सहयोग” दोनों का प्रतीक है। अल्पावधि में भारत के श्रम-प्रधान उत्पाद, जैसे वस्त्र और हल्के उद्योग के सामान, यूरोप में चीनी उत्पादों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकते हैं। वहीं, भारत से यूरोपीय संघ को मशीनरी व रासायनिक उत्पादों के निर्यात में वृद्धि से भी प्रतिस्थापन प्रभाव देखा जा सकता है। फिर भी, नई ऊर्जा और उच्च-स्तरीय विनिर्माण क्षेत्रों में भारत फिलहाल चीन के तकनीकी लाभ और उसकी संपूर्ण औद्योगिक श्रृंखला की बराबरी नहीं कर सकता। विशेष रूप से, इस समझौते में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए पाँच वर्ष की टैरिफ सुरक्षा अवधि तय की गई है, जो भारत में कार्यरत चीनी नई ऊर्जा ब्रांडों को अपनी बाज़ार स्थिति सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करेगी।
इसके साथ ही, गहन सहयोग के नए अवसर भी उभर रहे हैं। भारत-यूरोपीय संघ मूल्य श्रृंखला का निर्माण चीन, भारत और यूरोपीय संघ की औद्योगिक श्रृंखलाओं के बीच तालमेल के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। उदाहरणस्वरूप, जब यूरोपीय ऑटोमोबाइल निर्माता भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ाएँगे, तो वे चीन से नई ऊर्जा वाहनों के पुर्जे और इलेक्ट्रॉनिक अवयव जैसे मध्यवर्ती उत्पाद क्रय कर सकते हैं। इससे “चीनी मध्यवर्ती उत्पादन आपूर्ति + भारतीय असेंबली और प्रसंस्करण + यूरोपीय बाज़ार में उपभोग” का एक सहयोग मॉडल विकसित होगा। साथ ही, प्रतिस्पर्धी दबाव चीन को औद्योगिक उन्नयन में तेज़ी लाने, उच्च-तकनीकी और उच्च मूल्यवर्धित क्षेत्रों पर फोकस बढ़ाने तथा वैश्विक मूल्य श्रृंखला में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए प्रेरित करेगा।
चीन हमेशा से खुलेपन की नीति का पक्षधर रहा है और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था का कट्टर समर्थक है। वैश्विक व्यापार परिवेश में हो रहे इन परिवर्तनों के बीच, चीन यूरोपीय संघ, भारत और अन्य देशों के साथ व्यवहारिक सहयोग को और गहरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। वह “बेल्ट ऐंड रोड” पहल जैसे मंचों के माध्यम से व्यापार और निवेश के अवसरों का विस्तार करते हुए पारस्परिक लाभ और साझा समृद्धि पर आधारित नए वैश्विक संबंधों को बढ़ावा देगा। आज की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में, केवल खुले सहयोग और परस्पर फ़ायदे की भावना से ही वैश्विक आर्थिक पुनरुद्धार और साझा विकास में वास्तविक योगदान दिया जा सकता है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)