इंटरनेशनल डेस्क: आज दुनिया एक अजीब दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ विकास की दौड़ है, तो दूसरी तरफ खुद धरती सांस लेने के लिए संघर्ष कर रही है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण और रेगिस्तान का बढ़ता दायरा अब सिर्फ़ किताबों तक सीमित शब्द नहीं रह गए हैं; वे हमारी रोज़मर्रा की हकीकत बन चुके हैं। सवाल बिल्कुल साफ़ है: अगर हमने अभी अपनी आदतें नहीं सुधारीं, तो भविष्य में क्या बचेगा? इस बढ़ती बेचैनी के बीच, चीन की “ग्रीन ग्रेट वॉल” एक दिलचस्प और बेहद अहम पहल के तौर पर सामने आती है।
चीन ने पर्यावरण संबंधी चिंताओं को लेकर सिर्फ़ ज़ुबानी जमा-खर्च ही नहीं किया, बल्कि उसने अपने कानूनी ढांचे को ही पूरी तरह से बदल दिया। अलग-अलग बिखरे हुए नियमों को एक साथ मिलाकर, एक “एकीकृत पर्यावरण संहिता” (Unified Environmental Code) बनाई गई। पहले दिक्कत यह थी कि कानून तो मौजूद थे, लेकिन वे आपस में बिखरे हुए थे, जिसकी वजह से उनका असर बहुत सीमित होता था। अब प्रदूषण नियंत्रण, वनों का संरक्षण, जल प्रबंधन और कार्बन उत्सर्जन जैसे सभी मुद्दों को एक ही, सुसंगत ढांचे में शामिल कर दिया गया है। सीधे शब्दों में कहें तो, पूरी व्यवस्था को इस तरह से सुव्यवस्थित किया गया है ताकि ज़मीनी स्तर पर इसका साफ़-साफ़ असर दिखाई दे।
हालांकि, यह कहानी सिर्फ़ कानूनों के बारे में नहीं है; यह सोच में आए बदलाव के बारे में भी है। साल 2012 से, चीन ने यह मान लिया है कि विकास और पर्यावरण को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए गए, स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ाया गया, और प्रकृति संरक्षण को नीतियों में शामिल किया गया। अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टें भी बताती हैं कि दुनिया भर में जो नई हरियाली बढ़ी है, उसमें चीन का एक बड़ा हिस्सा है। पिछले एक दशक में वहां जंगलों का दायरा तेज़ी से बढ़ा है। यह एक ऐसी उपलब्धि है जो किसी भी लिहाज़ से, बिल्कुल भी मामूली नहीं है।
अब जरा उस “ग्रीन ग्रेट वॉल” को समझते हैं, जिसकी चर्चा अक्सर होती है। जब हम “ग्रेट वॉल ऑफ चाइना” का नाम सुनते हैं, तो पत्थरों की एक विशाल दीवार आंखों के सामने खड़ी हो जाती है। हालांकि, यह नई दीवार उससे अलग है; यह पेड़ों, घास और मिट्टी से बनी है। इसे “थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट” के नाम से जाना जाता है। साल 1978 में शुरू की गई इस परियोजना का लक्ष्य साल 2050 तक इसे पूरा करना है। दूसरे शब्दों में, यह केवल एक अल्पकालिक अभियान नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जो कई पीढ़ियों तक चलने वाला है।
हाल के आंकड़ों के अनुसार, चीन ने लगभग 1,856 किलोमीटर लंबी एक रेत-नियंत्रण पट्टी स्थापित की है। यह पट्टी गोबी रेगिस्तान सहित तीन प्रमुख रेगिस्तानों के विस्तार को रोकने में मदद कर रही है। इस क्षेत्र में, तेज़ हवाएं मिट्टी को उड़ा ले जाती हैं, जिससे उपजाऊ ज़मीन बंजर हो जाती है। इस संदर्भ में, यह हरियाली एक ढाल का काम करती है।
यहां का सबसे अहम पहलू यह है कि यह पहल सिर्फ़ पेड़ लगाने तक ही सीमित नहीं थी। चीन ने स्थानीय जलवायु के हिसाब से पौधों की प्रजातियाँ चुनीं, जल प्रबंधन प्रणालियां विकसित कीं और सैटेलाइट मॉनिटरिंग का इस्तेमाल किया। दूसरे शब्दों में, यह पूरा प्रोजेक्ट अब एक ‘पारिस्थितिक इंजीनियरिंग मॉडल’ में बदल गया है। सीधे शब्दों में कहें तो, यह सिर्फ़ “जंगल उगाने” का काम नहीं है, बल्कि विज्ञान और योजना का एक मिला-जुला रूप है।
अगर नई पर्यावरण संहिता को देखें, तो उसका ढांचा चार मजबूत स्तंभों पर टिका है। पहला, प्रदूषण नियंत्रण। दूसरा, प्राकृतिक संसाधनों और जंगलों की सुरक्षा। तीसरा, हरित विकास को बढ़ावा। और चौथा, कम-कार्बन विकास की दिशा में कदम। दिलचस्प बात यह है कि इसमें “हरित और कम-कार्बन विकास” पर अलग से एक पूरा चैप्टर रखा गया है। इसका मतलब साफ़ है कि स्वच्छ ऊर्जा अब महज़ एक विकल्प नहीं, बल्कि एक ज़रूरत बन गई है।
चीन ने अपने लिए दो बड़े लक्ष्य भी तय किए हैं: साल 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को अपने चरम पर पहुंचाना और साल 2060 तक कार्बन न्यूट्रैलिटी हासिल करना। यह सुनने में भले ही एक लंबा सफ़र लगे, लेकिन असली बात तो दिशा तय करने में है और वह दिशा अब तय हो चुकी है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या यह मॉडल पूरी दुनिया के लिए काम करेगा? जवाब सीधा नहीं है। हर देश की अपनी जमीन, अपनी राजनीति और अपनी चुनौतियां होती हैं। लेकिन एक बात साफ दिखती है, जब नीति साफ हो और उसे लागू करने का इरादा मजबूत हो, तो बदलाव संभव है। चीन का अनुभव यही कहता है।
सच यह है कि अब वक्त भाषणों का नहीं रहा। जलवायु परिवर्तन किसी का इंतजार नहीं करता। रेगिस्तान फैलने से पहले सूचना नहीं देते। और प्रदूषण किसी सीमा रेखा को नहीं मानता। चीन की “ग्रीन ग्रेट वॉल” हमें एक सीधी बात समझाती है, प्रकृति से लड़ाई जीतने का दावा करना बेकार है। लेकिन उसके साथ संतुलन बनाना, यही असली समझदारी है।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, बीजिंग)