Last Updated: September 27, 2026

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चीन-अफ्रीका संघ के संबंधों में बढ़ती गहराई

January 31, 2026

चीन-अफ्रीका संघ के संबंधों में बढ़ती गहराई

कह सकते हैं कि उन्नीसवीं सदी तक पूरी दुनिया का ध्यान एशिया की ओर था। एशिया की समृद्धि पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही थी। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध को दुनिया ने एशिया के विकास की सदी के रूप में स्वीकार किया। अब दुनिया का ध्यान तीन अरब लोगों की माटी अफ्रीकी महाद्वीप की ओर है। अफ्रीकी महाद्वीप के देशों का अपना संघ है, जिसे अफ्रीका संघ के रूप में जाना जाता है। अफ्रीकी महासंघ की ओर चीन का हाथ बढ़ाना एक तरह से दुनिया की आधी से अधिक आबादी का हाथ मिलाना है। दुनिया की आबादी करीब आठ अरब है। जिसमें से अफ्रीकी महाद्वीप की आबादी करीब तीन अरब है, जबकि चीन की उससे आधी से कम यानी डेढ़ अरब से कम। इस लिहाज से देखें तो चीन और अफ्रीका का साथ आना दुनिया की करीब आधी आबादी का साथ आना है। 

चीन और अफ्रीका संघ ने साल 2026 को चीन-अफ्रीका जन-आदान-प्रदान वर्ष घोषित किया है। जिसका शुभारंभ नौ जनवरी को हो चुका है। इसे दोनों ही पक्ष अपने 70 साल की राजनयिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव मान रहे हैं। इस वर्ष का उद्देश्य चीन और अफ्रीकी महाद्वीप के नागरिकों के बीच गहन बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक तालमेल को बढ़ावा देना और इस तरह पारंपरिक संबंधों से अलग नई गर्मजोशी के साथ रिश्ते को बढ़ाना है।

साल 2026 के चीन-अफ्रीका जन-आदान-प्रदान वर्ष कार्यक्रम के तहत चीन जहां अफ्रीकी देशों के छात्रों और शोधार्थियों के लिए जहां छात्रवृत्ति कोटा बढ़ा रहा है, वहीं अफ्रीकी देशों के अध्ययनकर्ताओं को भी चीन बुलाने की तैयारी में है। इसके साथ ही दोनों देश एक-दूसरे के सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर आपसी आदान-प्रदान को बढ़ाने जा रहे हैं।  चीन के हर हिस्से में पूरे साल कहीं न कहीं व्यापार मेले लगते रहते हैं। उननमें भाग लेने के लिए पूरी दुनिया से लोग आते हैं। 

अफ्रीकी संघ के प्रमुख ताये अत्स्के-सेलासी का मानना है कि इससे दोनों पक्षों के बीच सांस्कृतिक बढ़ावा मिलेगा। अफ्रीका के एक विद्वान रहे हैं उबंटू, जिनकी सोच अफ्रीकी मानव-केंद्रित वैश्विक दृष्टिकोण से युक्त है। उबंटू की वैचारिकी सामाजिक सद्भाव और सहानुभूति वाली रही है, कुछ ऐसी ही सोच चीन के दार्शनिक कन्फ्यूशियस की भी रही है। इन अर्थों में देखें तो चीन-अफ्रीका के बीच जन आदान-प्रदान का कार्यक्रम दोनों ही देशों के सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को एक मंच पर लाकर वैश्विक स्तर पर सामंजस्य को बढ़ावा देने की तैयारी है। 

चीन-अफ्रीका जन आदान-प्रदान कार्यक्रम के चलते दोनों भूभागों के बीच अगले दशक तक उच्च स्तरीय प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण को जहां बढ़ावा मिलना है, वहीं विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने की तैयारी है। अफ्रीकी संघ और चीन के बीच बढ़ते संबंधों के चलते अफ्रीकी संघ को उम्मीद है कि चीन अफ्रीका महाद्वीप की हरित, खनिज रणनीति और तकनीकी स्वायत्तता की दिशा को बढ़ावा देगा। इस एजेंडे को कामयाबी तभी मिलेगी, जब दोनों भूभागों के बीच आदान-प्रदान जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा मिलेगा। अफ्रीकी संघ को सबसे ज्यादा बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और सामाजिक क्षेत्र में सुधार की है। इसके लिए उसे बाहरी सहयोग चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि चीन की ओर से उसे ऐसे सहयोग खूब मिलेगें। चीन-अफ्रीका जन आदान-प्रदान वर्ष का एक मकसद यह भी है कि दुनिया की करीब तीन अरब की आबादी की भी आवाज वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुनी जाय। 

अफ्रीका के पास खुली जमीन बहुत है, हरियाली है, प्राकृतिक संपदा है। लेकिन यूरोप, अमेरिका और एशिया की तुलना में वहां गरीबी अभी ज्यादा है। चीन-अफ्रीका जन आदान-प्रदान वर्ष जैसे कार्यक्रमों से उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसे प्रयास अफ्रीका को विकसित बनाने में मददगार तो होंगे ही, अफ्रीका को गरीबी से मुक्त भी करेंगे, वहां के हर नागरिक के भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और कपड़े की चिंता भी करेंगे।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)  (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)

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