
जब मैंने भारत से चीन आने का निर्णय लिया, तो मन में उत्साह और आशंका दोनों ही थे। एक ओर यह खुशी थी कि मुझे पेकिंग यूनिवर्सिटी जैसी विश्वप्रसिद्ध संस्था में हिंदी अध्यापिका बनने का अवसर मिला, वहीं दूसरी ओर यह चिंता भी थी कि एक नए देश, नई भाषा और नई संस्कृति के बीच खुद को कैसे ढालूँगी। पेकिंग यूनिवर्सिटी में हिंदी अध्यापिका के रूप में मेरा चयन और यहां तक पहुंचने की राह आसान नहीं थी। पर हर कठिनाई ने मुझे कुछ नया सिखाया, और हर नयी सीख मुझे एक बेहतर शिक्षक और एक संवेदशील इंसान बनाती गयी।
जब पेकिंग यूनिवर्सिटी ने मुझे हिंदी विभाग में अध्यापिका बनने का अवसर दिया, तो लगा मानो सपना सच हो रहा हो, क्योंकि मुझे न सिर्फ विश्व के उत्कृष्ट संस्थानों में से एक में हिंदी पढ़ाने का अवसर मिला बल्कि हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए एक मजबूत मंच भी मिला। चीन आने के शुरुआती दिन मेरे लिए रोमांचक भी रहे और चुनौतीपूर्ण भी। भाषा की बाधा सबसे बड़ी थी, क्योंकि मुझे चीनी भाषा में केवल कुछ बुनियादी शब्द ही आते थे। शुरूआती दिनों में मुझमें थोड़ा डर भी था कि क्या मैं चीन की शिक्षण पद्धति में ढल पाऊंगी? क्या मेरे चीनी छात्र मेरी पाठन शैली को समझ पाएंगे? पर उसी डर ने मुझे और मजबूत किया। मैंने फैसला किया: अगर मौका है, तो उसे पूरी ईमानदारी और लगन के साथ स्वीकार करूँ।
पेकिंग विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाने का मेरा पहला दिन उत्साह और जिज्ञासा से भरा था क्योंकि उस दिन मुझे और मेरी मातृभाषा हिंदी को एक नए पन्ने पर उतारना था। मैंने ऐसी पाठ्यक्रम संरचना बनाई चीनी छात्रों को आसानी से समझ आ सके। यूनिवर्सिटी के छात्र न सिर्फ हिंदी सीखने में गहरी रुचि रखते हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और इतिहास के प्रति भी बेहद उत्सुक रहते हैं। जब मैं उन्हें हिंदी भाषा की कोई विशेषता बताती हूं या हिंदी फिल्म के किसी गीत का अर्थ समझाती हूँ, तो उनकी आँखों में चमक देखना मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव होता है। मैंने छात्रों से कहा: “हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, यह एक रंगमंच है जिसमें आपका दिल और दिमाग दोनों भाग लेते हैं।”
यहाँ काम करते हुए मुझे यह महसूस हुआ कि शिक्षा सिर्फ भाषा सिखाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह दो संस्कृतियों के बीच पुल का काम करती है। मेरे लिए यह गर्व की बात है कि मैं भारत और चीन के बीच संवाद की इस कड़ी को मजबूत बनाने में अपनी छोटी सी भूमिका निभा रही हूँ।
पेशेवर जीवन के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी समृद्ध करने वाले रहे। बीजिंग के मनोरम दृश्य, यहाँ के पारंपरिक बाज़ार, और स्थानीय व्यंजन, हर चीज़ ने मुझे एक नए रंग में रंग दिया। भले ही कभी-कभी घर की याद सताती है, लेकिन छात्रों की मुस्कान और उनके सीखने का उत्साह मुझे यह अहसास कराता है कि मैंने सही निर्णय लिया।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो चीन आने का मेरा निर्णय सिर्फ एक नौकरी का अवसर नहीं था, बल्कि जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने का अनुभव भी था। यहाँ का हर दिन मुझे सिखाता है कि दुनिया चाहे कितनी भी अलग क्यों न हो, सीखने और साझा करने की भावना हमें एक-दूसरे के करीब लाती है।
भविष्य के लिए मेरी योजना है कि मैं शिक्षण सामग्री को डिजिटलीकृत करूँ, हिंदी-चीन दो-तरफ़ा भाषा-परियोजनाओं को बढ़ावा दूँ, और भारतीय साहित्य तथा कला को चीन के विद्यार्थियों के और करीब लाऊँ। क्योंकि मेरे अनुभव की वह कमान जो कभी डगमग थी, अब एक मजबूत धारा बन चुकी है।
मैं मानती हूँ कि चीन में नौकरी के साथ आना एक बड़ा अवसर है, पर यह अवसर केवल पेशे का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पहचान और मानव-सम्पर्क का भी है। मैंने पाया कि एक भारतीय शिक्षक के रूप में पाठशाला सिर्फ भाषा सिखाने की जगह बनकर नहीं रहती, वह एक ऐसी जगह है जहाँ एक विविध दुनिया के छात्र एक साथ बैठकर एक साझा भाषा में सोच और समझ विकसित करते हैं, और इस साझा भाषा का नाम है- हिंदी।
(शैलजा तिवारी – चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
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