इंटरनेशनल डेस्क : पिछले 40 सालों में चीन ने जिस तरह अपने गांवों को स्मार्ट शहरों में बदला है, वो किसी चमत्कार से कम नहीं है। ये कहानी सिर्फ़ इमारतें खड़ी करने या सड़कें चौड़ी करने की नहीं, बल्कि एक पूरे देश की सोच, नीति और मेहनत की है, जिसने ग्रामीण इलाकों को तकनीक और तरक्की का केंद्र बना दिया। आइए, इस सफ़र को समझते हैं कि कैसे चीन ने ये कमाल किया और इसके पीछे क्या-क्या हुआ।
सबसे पहले बात करते हैं 1970 के दशक के अंत की, जब तंग श्याओपिंग ने चीन की बागडोर संभाली। उस वक्त चीन की अर्थव्यवस्था ज्यादातर खेती पर टिकी थी। गांवों में लोग साधारण ज़िंदगी जीते थे, बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी कई जगहों पर नहीं थीं। तंग ने देखा कि अगर चीन को दुनिया में आगे बढ़ना है, तो उसे अपनी अर्थव्यवस्था को खोलना होगा। यहीं से शुरू हुआ " सुधार और खुलेपन " का दौर। तंग ने खास आर्थिक क्षेत्र (स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन्स) बनाए, जैसे शनचन, जो उस वक्त एक छोटा सा मछुआरों का गांव था। आज शनचन को देखकर कोई नहीं कह सकता कि ये कभी एक साधारण गांव था। गगनचुंबी इमारतें, टेक्नोलॉजी हब, और दुनिया के सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक— ये सब उस नीति का नतीजा है, जिसने गांवों को शहरों में बदलने की नींव रखी।
लेकिन ये बदलाव सिर्फ़ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा। चीन ने अपने ग्रामीण इलाकों को स्मार्ट बनाने के लिए एक सुनियोजित रणनीति अपनाई। सरकार ने बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश किया। सड़कें, रेलवे, और हाई-स्पीड इंटरनेट जैसी सुविधाएं गांवों तक पहुंचाई गईं। उदाहरण के लिए, आज चीन के 98 प्रतिशत से ज्यादा गांवों में ब्रॉडबैंड इंटरनेट है। ये कोई छोटी बात नहीं है। इंटरनेट ने न सिर्फ़ लोगों को दुनिया से जोड़ा, बल्कि ऑनलाइन कारोबार और डिजिटल सेवाओं का रास्ता भी खोला। गांवों में लोग अब ई-कॉमर्स के ज़रिए अपने उत्पाद, जैसे फल, सब्जियां, या हस्तशिल्प, सीधे शहरों और विदेशों में बेच सकते हैं। अलीबाबा जैसे प्लेटफॉर्म ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बूस्ट दिया, जिससे लाखों लोग गरीबी से बाहर निकले।
चीन की स्मार्ट सिटी परियोजनाएं इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। 2010 के दशक से चीन ने सैकड़ों स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स शुरू किए। इन शहरों में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हर स्तर पर किया गया। मिसाल के तौर पर, बीजिंग, नानचिंग जैसे शहरों में स्मार्ट कार्ड सिस्टम लागू किया गया, जो एक ही कार्ड से बस, ट्रेन, बिजली बिल, और सामाजिक सुरक्षा सेवाओं को जोड़ता है। यही नहीं, कई शहरों में स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम हैं, जो रियल-टाइम डेटा के ज़रिए जाम को कम करते हैं। स्मार्ट शहरों में सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक बसें, और जीपीएस से लैस सार्वजनिक परिवहन आम बात हो गई है। ये सब सुनियोजित नीतियों का नतीजा है, जिसमें सरकार, निजी कंपनियां, और स्थानीय लोग एक साथ मिलकर काम करते हैं।
लेकिन ये बदलाव बिना चुनौतियों के नहीं आया। गांवों से शहरों में लोगों का पलायन बढ़ा, जिससे शहरीकरण की रफ्तार तो बढ़ी, लेकिन गांवों में मज़दूरों की कमी हो गई। साथ ही, बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों ने पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाया। फिर भी, चीन ने इन समस्याओं से निपटने के लिए कदम उठाए। उदाहरण के लिए, हरित ऊर्जा और स्मार्ट रीसाइक्लिंग सिस्टम को बढ़ावा दिया गया। शिनच्यांग जैसे इलाकों में स्मार्ट सिटी परियोजनाएं न सिर्फ़ सुविधाएं देती हैं, बल्कि सुरक्षा और निगरानी के लिए भी तकनीक का इस्तेमाल करती हैं, जैसे आकस्मिक बटन, जो हर घर को पुलिस स्टेशन से जोड़ते हैं। चीन की इस कामयाबी का एक बड़ा कारण उसकी सरकार की दीर्घकालिक सोच है। जहां कई देशों में नीतियां हर पांच साल में बदल जाती हैं, वहीं चीन ने 20-30 साल की योजनाएं बनाईं।
इन योजनाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, और तकनीकी ट्रेनिंग पर भी ज़ोर दिया गया। गांवों में स्कूल और अस्पताल बनाए गए, ताकि लोग शहरों में पलायन करने के बजाय अपने इलाकों में ही बेहतर ज़िंदगी जी सकें। आज चीन की शहरी आबादी 70 करोड़ से ज्यादा है, और 2030 तक इसके एक अरब तक पहुंचने की उम्मीद है। ये आंकड़ा बताता है कि चीन ने न सिर्फ़ गांवों को शहरों में बदला, बल्कि लोगों की सोच और ज़िंदगी को भी आधुनिक बनाया। चीन की इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि तरक्की के लिए विज़न, मेहनत, और तकनीक का सही इस्तेमाल ज़रूरी है। आज शनचन जैसे शहर दुनिया के इनोवेशन हब हैं, जहां स्टार्टअप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और बायोटेक का बोलबाला है। ये सब उस छोटे से गांव से शुरू हुआ, जो कभी मछुआरों का ठिकाना था।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप (CGTN हिन्दी), बीजिंग)

