
इंटेरमनेशनल डेस्क: हर साल जैसे ही नवंबर की ठंडी हवाएं दिल्ली की गलियों में दस्तक देती हैं, हवा में कुछ और भी घुल जाता है- धुआं और धूल। वह धुंध जो कभी रोमांटिक लगती थी, अब बेचैनी का कारण बन गई है। सुबह उठते ही खिड़की के बाहर जो दिखता है, वह कुहासा नहीं, बल्कि जहरीली हवा की एक मोटी परत होती है, जो पराली, गाड़ियों के धुएं, और निर्माण की धूल का एक जानलेवा कॉकटेल है। सड़कों पर धुएं की चादर, मास्क में लिपटे चेहरे और घरों में बंद खिड़कियां, यह नज़ारा अब इतना आम हो गया है कि एक लाचारी का एहसास होने लगता है।
हर साल हम यही सोचते हैं और यही सवाल पूछते हैं कि ऐसा हर साल क्यों होता है? आखिर दिल्ली की सर्दियां कब तक हमारे फेफड़ों की दुश्मन बनी रहेंगी? क्या यह दिल्ली की स्थायी नियति है, या इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता है?
इन सवालों के बीच, एक शहर की कहानी उम्मीद की किरण बनकर सामने आती है- बीजिंग। एक ऐसा शहर जिसे कभी “धुएं का शहर” कहा जाता था, उसने अपनी हवा की गुणवत्ता को इस कदर बदल दिया है कि आज वह दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है।
आज जब हम दिल्ली के 400-500 के AQI (एयर क्वालिटी इंडेक्स) को देखकर घबरा जाते हैं, तो यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि बीजिंग इससे भी बदतर हालात से गुज़रा है। साल 2013 में, बीजिंग दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक था, जहां का AQI अक्सर 500 के पार चला जाता था। हालात इतने खराब थे कि आसमान हमेशा धुंधला रहता था और सूरज महीनों तक गायब रहता था।
यह जानना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी को दूर करता है कि हमारी स्थिति “ठीक नहीं हो सकती”। बीजिंग का अनुभव यह साबित करता है कि प्रदूषण कितना भी गंभीर क्यों न हो, एक दृढ़ संकल्प के साथ एक नाटकीय बदलाव संभव है। अगर बीजिंग कर सकता है, तो कोई कारण नहीं है कि दिल्ली नहीं कर सकती।
बीजिंग की सफलता का राज़ कुछ बिखरी हुई नीतियों में नहीं, बल्कि एक व्यापक और आक्रामक रणनीति में छिपा है। जब चीन ने अपनी हवा को साफ करने का फैसला किया, तो उसने इसे सिर्फ एक सरकारी योजना के रूप में नहीं देखा; उसने प्रदूषण के खिलाफ एक असली “युद्ध” छेड़ दिया। यह एक बहु-आयामी हमला था जिसने प्रदूषण के हर स्रोत को निशाना बनाया।
बीजिंग ने अपने हवा और माहौल को सुधारने के लिए कुछ बड़े और असरदार फैसले लिए। सबसे पहले, शहर ने भारी उद्योगों को भीड़भाड़ वाले इलाकों से हटाकर दूर भेजा, ताकि धुएं और प्रदूषण का बोझ कम हो सके। इसके साथ ही कोयले पर निर्भरता को तेज़ी से घटाया गया और गैस, सौर ऊर्जा और पवन जैसी साफ-सुथरी ऊर्जा को अपनाया गया। पुराने समय की धुआं उगलने वाली गाड़ियों को सड़कों से विदा कर दिया गया और शहर की ज्यादातर बसों और टैक्सियों को इलेक्ट्रिक कर दिया गया, जिससे हवा थोड़ी हल्की महसूस होने लगी।
यातायात के मोर्चे पर भी शहर ने कसर नहीं छोड़ी। मेट्रो नेटवर्क को तेजी से फैलाया गया ताकि लोग बिना निजी गाड़ियों के भी आराम से आगे बढ़ सकें। साइकिल चलाने वालों के लिए अलग लेन बनाई गईं, जो न सिर्फ सुरक्षित हैं बल्कि लोगों को यह याद भी दिलाती हैं कि कभी-कभी पैडल मारना भी शहर और सेहत, दोनों के लिए अच्छा होता है। हालांकि दिल्ली में नीतियों या योजनाओं की कोई कमी नहीं है। हर साल हम ऑड-ईवन, निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध, और सड़कों पर पानी के छिड़काव जैसे उपायों को देखते हैं। लेकिन जैसा कि हम सब जानते हैं, समस्या यह है कि “नीतियां बनती हैं पर टिकती नहीं, नियम आते हैं पर लागू होते नहीं।”
यहीं पर बीजिंग का दृष्टिकोण दिल्ली से अलग हो जाता है। बीजिंग की सफलता का असली ‘सीक्रेट’ सिर्फ योजना बनाना नहीं था, बल्कि उसे लागू करने में दिखाई गई अडिग सख्ती थी। चीन ने जो किया, उसे एक शब्द में कहा जा सकता है- “सख्ती”।
इस सख्ती का असर साफ दिखा, क्योंकि शहर ने नियमों को कागज़ पर नहीं, जमीन पर लागू किया। हर फैक्ट्री और हर निर्माण स्थल पर रियल-टाइम प्रदूषण मॉनिटरिंग सिस्टम लगा दिया गया, ताकि धुआं या धूल हवा में जाते ही पकड़ में आ जाए। जो भी व्यक्ति या कंपनी इन नियमों को हल्के में लेती दिखी, उस पर भारी जुर्माना ठोक दिया जाता था। सबसे अहम बात यह रही कि इन नियमों को लागू करने में किसी तरह का राजनीतिक दबाव या समझौता नहीं होने दिया गया। शहर ने साफ संदेश दिया कि हवा की सेहत के मामले में ढिलाई की कोई गुंजाइश नहीं है।
सिर्फ 10 वर्षों में, बीजिंग की हवा पूरी तरह बदल गई है। आज वहां का औसत AQI 70 से 90 के बीच रहता है, जिसे “बेहतर” श्रेणी में माना जाता है। जिस बीजिंग में कभी सूरज देखना मुश्किल था, आज वहां नीला आसमान एक आम बात हो गई है। यह बदलाव सिर्फ सरकारी आंकड़ों में नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन में महसूस किया जा सकता है।
तो सवाल फिर वहीं आकर रुकता है कि क्या दिल्ली वह हासिल कर सकती है जो बीजिंग ने कर दिखाया? जवाब है, हां। लेकिन शर्त यह है कि हमें बातों से ज्यादा करके दिखाना होगा। यह बदलाव सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह एक सामूहिक प्रयास की मांग करता है। सरकार को बीजिंग की तरह नियमों को सख्ती से लागू करना होगा, बिना किसी राजनीतिक दबाव के।
वहीं, नागरिकों के रूप में हमारी भी भूमिका है। हर साल हवा के ज़हर पर सिर्फ सोशल मीडिया पर शिकायत करने से कुछ नहीं बदलेगा। बदलाव सड़क पर दिखना चाहिए। “सर्दियों में लकड़ियां जलाकर हाथ सेंकना” या “पटाखे फोड़ना” जैसी आदतें हमें ही भुगतनी पड़ती हैं। बदलाव तब आएगा जब हम कार छोड़कर पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेंगे, और जब हम दूसरों से ज्यादा खुद पर नियम लागू करेंगे।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप (CGTN हिन्दी), बीजिंग)
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