Last Updated: October 8, 2026

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“खेलों की भागदौड़ से विरासत की शांति तक: ली और मियाओ संस्कृति में डूबा एक दिन

April 26, 2026

“खेलों की भागदौड़ से विरासत की शांति तक: ली और मियाओ संस्कृति में डूबा एक दिन

इंटरनेशनल डेस्क: सान्या 6th Asian Beach Games की भागदौड़ भरी सुबहों और देर रात तक रिपोर्ट फाइल करने के दबाव के बीच मेरी अस्त-व्यस्त होती दिनचर्या मुझसे थोड़ा ठहर जाने की मांग कर रही थी। लेकिन इंटरव्यूज़, लाइव कवरेज, रिपोर्ट फाइल करना-सब कुछ इतनी तेजी से चल रहा था कि खुद के लिए समय निकालना लगभग असंभव लगने लगा था।

लेकिन इसी व्यस्तता के बीच एक दिन मैंने खुद के लिए थोड़ा समय निकाला और निकल पड़ी बिंगलांग घाटी ली और मियाओ सांस्कृतिक पर्यटन क्षेत्र की ओर। मैंने तय किया कि इस शहर को केवल खेलों के ज़रिए नहीं, बल्कि उसकी आत्मा के ज़रिए भी महसूस किया जाए।

जैसे ही मैं सान्या की हलचल से दूर उस शांत, हरियाली से भरी घाटी में पहुंची, ऐसा लगा मानो समय धीमा पड़ गया हो। चारों तरफ फैले ऊंचे बिंगलांग (Betel Nut) के पेड़, पहाड़ियों के बीच से बहती ठंडी हवा, और प्रकृति की सादगी- ये सब मेरे भीतर के शोर को धीरे-धीरे शांत करने लगे।

यहां आकर महसूस हुआ कि चमक-दमक से दूर बसी इस दुनिया में लोग सादगी से जीते हैं, एक ऐसी दुनिया, जहां संस्कृति सिर्फ दिखाई नहीं देती, बल्कि महसूस होती है। जहां परंपराएं सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में सांस लेती हैं। ली जनजाति और मियाओ जनजाति के लोग अपने पारंपरिक वस्त्रों में, अपने संगीत और नृत्य के साथ जैसे अपनी कहानी खुद बयां कर रहे थे।

यहां ली जनजाति और मियाओ जनजाति की विरासत सिर्फ प्रदर्शित नहीं की जाती, बल्कि जी जाती है। और सबसे खास बात- इनकी कई परंपराएं चीन की “राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” में शामिल हैं, जिन्हें यहां बेहद सजीव रूप में संरक्षित किया गया है।

घाटी में चलते हुए मेरी नज़र सबसे पहले ली जनजाति की अद्भुत पारंपरिक बुनाई कला पर पड़ी- हाथ करघे पर बनते रंगीन वस्त्र, जिनमें हर पैटर्न एक कहानी कहता है। यह केवल कपड़ा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों का ताना-बाना है। इसी तरह उनकी कढ़ाई और सिलाई की बारीकियां इतनी सजीव थीं कि हर धागा जैसे संस्कृति को जोड़ता हुआ महसूस हो रहा था।

मियाओ जनजाति की ओर बढ़ते ही एक अलग ही रंग दिखाई देता है चमचमाते चांदी के आभूषण, जटिल कढ़ाई वाले परिधान, और हस्तनिर्मित पोशाकें, जो उनकी पहचान का अहम हिस्सा हैं। यहां की मियाओ कढ़ाई कला और चांदी शिल्प भी राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल हैं, जो उनकी रचनात्मकता और सौंदर्यबोध का प्रतीक हैं।

लेकिन यह अनुभव केवल दृश्य तक सीमित नहीं था- यह ध्वनियों से भी भरा हुआ था। घाटी में गूंजते पारंपरिक गीत और संगीत जैसे सीधे दिल को छू रहे थे। मैंने पहली बार उनके पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों को इतने करीब से महसूस किया- बांसुरी जैसी मधुर ध्वनि, ढोल की गूंज, और लोकगीतों की लय। मियाओ समुदाय का प्रसिद्ध लुशेंग (बांस का वाद्य यंत्र), जो उनके त्योहारों और नृत्यों का केंद्र होता है, उसकी धुनों में एक अनोखी जीवंतता थी।

जब स्थानीय कलाकार अपने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर रहे थे, तो लगा जैसे हर कदम, हर ताल, हर लय- एक विरासत को जीवित रखे हुए है। यह केवल प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती आ रही सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव था। एक पत्रकार के रूप में मैं यहां खिलाड़ियों की जीत और हार की कहानियां कवर करने आई थी, लेकिन इस घाटी ने मुझे जीवन की एक अलग ही कहानी सुनाई- संतुलन की, सुकून की, और उस जुड़ाव की जो इंसान को प्रकृति और अपनी जड़ों से जोड़ता है।

वापसी के रास्ते पर, जब मैं फिर से अपने कैमरे, माइक्रोफोन और नोटबुक की दुनिया में लौट रही थी, तो मन थोड़ा हल्का था, थोड़ा शांत। ऐसा लगा जैसे इस छोटी सी यात्रा ने मुझे फिर से ऊर्जा से भर दिया हो। बिंगलांग घाटी ली और मियाओ सांस्कृतिक पर्यटन क्षेत्र मेरे लिए सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं रहा- यह एक ऐसा ठहराव बन गया, जिसने सान्या की इस तेज़ रफ्तार यात्रा में मुझे खुद से मिलने का मौका दिया।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग,दिव्या पाण्डेय)

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