इंटरनेशनल डेस्क: क्या आपने कभी सोचा है कि अगर एशिया की दो सबसे बड़ी ताक़तें, भारत और चीन एक साथ कदम बढ़ाएं तो दुनिया का भविष्य किस तरह बदल सकता है? हाल ही में उत्तरी चीन के थ्येनचिन शहर में आयोजित शांगहाई सहयोग संगठन (एससीओ) सम्मेलन ने इस सवाल को फिर से जीवित कर दिया।
इस मंच पर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात ने न केवल राजनीतिक हलचलों को नया आयाम दिया, बल्कि दोनों सभ्यताओं के रिश्तों को भी नई दिशा दी। ख़ास बात यह थी कि यह प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा सात साल बाद हुई, और यह मुलाक़ात उस वर्ष हुई जब दोनों देशों के राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ भी मनाई जा रही है।
दो सभ्यताओं का पुराना रिश्ता
भारत और चीन की दोस्ती कोई आज की कहानी नहीं है, यह हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक डोर से बंधी हुई है। चीन के यात्री चांग छियन की पश्चिम की यात्राएं हों या प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग का भारत आना, दोनों सभ्यताओं ने एक-दूसरे से ज्ञान, धर्म और संस्कृति का आदान-प्रदान किया। रेशम मार्ग ने न केवल व्यापार को पंख दिए, बल्कि आपसी विश्वास की नींव भी रखी।
चीन से भारत में रेशम, काग़ज़, चीनी मिट्टी और चाय आईं, वहीं भारतीय संगीत, गणित और दर्शन ने चीन को प्रभावित किया। यही कारण है कि आज भी ‘ड्रैगन और हाथी’ का मेल दुनिया के लिए प्रेरणा का प्रतीक है।
विकास की दौड़ में साझेदार
आज चीन और भारत दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश हैं, जिनकी कुल आबादी लगभग 280 करोड़ है। दोनों विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे को सहारा दे सकती हैं। आँकड़े बताते हैं कि साल 2024 में भारत-चीन व्यापार 139 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है। जहाँ चीन मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स में मजबूत है, वहीं भारत आईटी, सॉफ्टवेयर और बायोफार्मा का केंद्र है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के पूर्व की ओर खिसकते संतुलन को देखते हुए, इन दोनों देशों का साथ आना स्वाभाविक और आवश्यक लगता है।
साझा चुनौतियाँ और पुराने अनुभव
इतिहास गवाह है कि भारत और चीन ने उपनिवेशवाद और बाहरी दबावों का मिलकर सामना किया। 1954 में पं. जवाहरलाल नेहरू और चो एनलाई द्वारा पंचशील सिद्धांतों को अपनाना अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक ऐतिहासिक पहल थी। आज भी वही भावना ज़िंदा है, लेकिन इस बीच नए अवरोध खड़े हुए हैं- संरक्षणवाद, एकतरफ़ा फैसले और वैश्विक बाज़ार में असंतुलन। हाल ही में अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक का शुल्क लगाना इसका उदाहरण है। यह कदम न केवल भारत-चीन जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है, बल्कि भारत की विकास दर को भी लगभग 0.8 प्रतिशत तक घटाने की आशंका पैदा करता है।
ग्लोबल साउथ की आवाज़
भारत और चीन केवल पड़ोसी ही नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज़ भी हैं। ब्रिक्स, एससीओ और जी20 जैसे मंचों पर उनकी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है, जहाँ वे बहुपक्षवाद, साझेदारी और संतुलित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की दिशा में नेतृत्व कर सकते हैं। विकासशील देशों के हितों की रक्षा करना और असमानताओं को कम करना इनके साझा एजेंडे का अहम हिस्सा है।
विवादों से संवाद की ओर अगस्त 2025 की थ्येनचिन मुलाक़ात में यह साफ़ दिखा कि दोनों देश पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर नए अवसरों की तलाश कर रहे हैं। सीमा विवाद, सैनिक तनाव और हिमालयी झड़पों जैसी चुनौतियाँ अब संवाद और विश्वास की ओर बढ़ रही हैं। यह मुलाक़ात सिर्फ़ औपचारिक नहीं थी, बल्कि इसमें भविष्य की सकारात्मक दिशा की झलक भी थी। भारत-चीन के बीच दोबारा उड़ानें शुरू होना, तीर्थयात्राओं का रास्ता खुलना और वीज़ा नियमों का आसान होना इसी बदलाव का हिस्सा हैं। ये कदम आम नागरिकों को जोड़ने वाले पुल साबित होंगे।
साझेदारी का नया सपना
प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुलाक़ात में साफ़ कहा कि भारत और चीन को बड़े उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा, ताकि दुनिया के सामने शांति, स्थिरता और विकास की मिसाल पेश की जा सके। राष्ट्रपति शी ने भी इस विचार को आगे बढ़ाते हुए कहा, “हम एक-दूसरे के लिए अवसर हैं, खतरा नहीं।” उनका “ड्रैगन-हाथी टैंगो” वाला रूपक इस नए रिश्ते का प्रतीक बन गया है।
जब सपना हक़ीक़त बने
हिमालय दोनों देशों को भौगोलिक रूप से अलग करता है, लेकिन असली दीवारें मन में खड़ी होती हैं। अगर चीन और भारत विश्वास, ईमानदारी और सहयोग के साथ आगे बढ़ें, तो यह सिर्फ़ उनकी सभ्यताओं का संवाद नहीं होगा, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक नई उम्मीद होगी। जब ड्रैगन और हाथी साथ कदम बढ़ाते हैं, तो यह संकेत मिलता है कि विविध रास्ते भी एक साझा मंज़िल की ओर ले जा सकते हैं।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, बीजिंग)
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