इंटरनेशनल डेस्क: 2025 वह वर्ष है जब भारत और चीन की राजनयिक सम्बन्धों की 75वीं वर्षगाँठ है। इस अवसर को दोनों देशों ने औपचारिक रूप में सम्मानित किया। चीनी दूतावास ने नई दिल्ली में समारोह आयोजित किया, जिसमें भारतीय सरकार, राजनयिक समुदाय, उद्यमी, मीडिया, छात्र आदि शामिल हुए। चीन की ओर से यह स्पष्ट संदेश गया कि वह “ड्रैगन और एलिफ़ैंट (ड्रैगन-हाथी)” यानी चीन और भारत को एक साथ विकास और सद्भाव के पथ पर आगे बढ़ने वाला समझता है। भारतीय प्रतिनिधियों ने भी इस मौके को एक “नई शुरुआत”के रूप में देखा।
यानी, 75 साल पूरे होने पर, द्विपक्षीय रिश्तों में “पुनर्स्थापना” का प्रतीकात्मक अवसर बना जो सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं रहा, बल्कि व्यावहारिक कदमों के साथ जुड़ा रहा। आइये जानें कि कैसे भारत–चीन संबंधों की बेहतरीन पृष्ठभूमि लिखी जा रही है
हवाई कनेक्टिविटी, लोगों और यात्राओं की बहाली
जनवरी 2025 में, दोनों देशों के विदेश सचिव / उप–विदेश मंत्री स्तर की बातचीत हुई, जिसमें कई अहम सहमतियाँ बनीं। इनमें शामिल रहा “नागरिकों के बीच संपर्क और मीडिया / पत्रकारों / विचार-मंच के बीच आदान-प्रदान” विशेष रूप से, अक्टूबर 2025 में लगभग पाँच साल के अंतराल के बाद, भारत-चीन के बीच सीधी हवाई उड़ानें फिर से शुरू हुईं। पहली उड़ान 26 अक्टूबर 2025 को कोलकाता–क्वांगचो के लिए शुरू हुई।
इसके साथ ही, धार्मिक / तीर्थ यात्राओं जैसे कि कैलाश–मानसरोवर यात्रा के पुनरारंभ की सहमति बनी है जो लोगों के बीच संपर्क, सांस्कृतिक और धार्मिक आदान-प्रदान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसका सीधा मतलब सिर्फ आर्थिक या वाणिज्यिक नहीं, बल्कि लोगों के बीच संपर्क और सामंजस्य बढ़ाने की दिशा है।
राजनयिक संवाद, भरोसे की बहाली और रणनीतिक सामंजस्य
इसी तरह जनवरी 2025 में हुई संवाद में, दोनों देशों ने निर्णय लिया कि वे कई बहुपक्षीय और क्षेत्रीय मंचों पर साथ काम करेंगे, जैसे कि शांगहाई सहयोग संगठन (SCO), जहां चीन भूतल अध्यक्ष है। भारत ने वहाँ सक्रिय भागीदारी देने की सहमति दी। साथ ही, दोनों पक्षों ने यह तय किया कि वे मीडिया, थिंक-टैंक, ट्रैक II संवाद, सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान-प्रदान बढ़ाएँगे ताकि सिर्फ राजनयिक या सैन्य स्तर तक सीमित न रहकर, सामाजिक और बौद्धिक संपर्क भी मजबूत हों। 2025 में राजनयिक संवाद, विश्वास-निर्माण और पॉलिसी-निर्धारण में एक नई ऊर्जा आई है।
आर्थिक और व्यापारिक परिदृश्य, सुधार के संकेत, लेकिन संरचनात्मक असंतुलन
2024–25 में, द्विपक्षीय व्यापार लगभग 127.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, लेकिन इसी के साथ भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया, लगभग 99.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर। दरअसल यह घाटा मुख्यतः इसलिए है क्योंकि भारत की अधिकतर आयातित वस्तुएँ औसत या उच्च तकनीक, मध्यवर्ती वस्तुएँ, और पूंजीगत वस्तुएँ हैं जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, औषधीय API, मशीनरी, रिन्यूएबल-एनर्जी कंपोनेंट्स आदि। खासकर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रिन्यूएबल-एनर्जी सप्लाई चेन, सोलर सेल और इसी तरह की चीज़ों में भारत बहुत निर्भर है।
हालांकि, इस निर्भरता के बावजूद, 2025 में बेहतर राजनयिक संबंधों और हवाई-कनेक्टिविटी पुनर्स्थापना की वजह से व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और निवेश की सहूलियत बढ़ सकती है। कुछ संकेत दिखे भी। आर्थिक दृष्टिकोण से, कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक यह मानते हैं कि वैश्विक कंपनियाँ अब “चीन + 1” मॉडल (जहाँ चीन के साथ भारत भी हो) को प्राथमिकता दे रही हैं जिससे भारत के औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्र को दीर्घकालिक अवसर मिल सकते हैं।
फिर भी, जैसा कि एक लेख में कहा गया है, भारत को सिर्फ “असेंबली”तक सीमित नहीं रहकर “वैल्यु-एडिशन”की दिशा में आगे बढ़ना होगा, वरना चीन की विनिर्माण और प्रौद्योगिक क्षमता को पीछे छोड़ना आसान नहीं होगा। तो 2025 में, आर्थिक दृष्टिकोण थोड़ा मिश्रित है: एक ओर राजनयिक और कनेक्टिविटी सुधार हुए हैं; दूसरी ओर संरचनात्मक असंतुलन और निर्भरता बनी हुई है।
2025 के घटनाकालीन परिप्रेक्ष्य में आर्थिक विश्लेषण और वैश्विक संदर्भ
इस दौर में, जब विश्व अर्थव्यवस्थाएँ पुनर्गठन की ओर बढ़ रही हैं, भारत और चीन का रिश्ता सिर्फ द्विपक्षीय मसला नहीं बल्कि वैश्विक सप्लाई-चैन, भू-आर्थिक और भू-रणनीतिक बदलावों का हिस्सा बन गया है। 2025 की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और व्यापार संस्थान (जैसे HSBC) मानते हैं कि भारत इस नया सप्लाई-चेन पुनर्संतुलन का “बड़ा विजेता” हो सकता है।
दूसरी तरफ, चीन अपनी नीतियों को और बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसी बदलाव के बीच, भारत को अब यह चुनना है कि क्या वह चीन-निर्भरता को कम करेगा, या चीन-भारत सहयोग का ऐसा नया मॉडल बनाएगा, जहाँ भारत स्वयं विनिर्माण और मूल्य संवर्धन में मजबूत हो।
कई विशेषज्ञ मानते हैं भारत को रणनीतिक आत्मनिर्भरता की दिशा में काम करना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि 2025 में भारत-चीन रिश्ते सिर्फ राजनयिक या कूटनीतिक पुनर्स्थापना नहीं, बल्कि आर्थिक पुनर्संरचना का भी हिस्सा हो सकते हैं अगर दोनों देश, भारत विशेष रूप से सामरिक समझदारी और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाए।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) (लेखक: नीरज बाली)