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भारतीय मीडिया की भ्रामक रिपोर्टिंग और चीन की शांति-सहयोग की अटूट आस्था

Indian Media's Misleading Reporting

Indian Media's Misleading Reporting

इंटरनेशनल डेस्क:  हाल के दिनों में कुछ भारतीय मीडिया संस्थानों द्वारा चीन-जापान संबंधों पर की गई रिपोर्टिंग ने गहरी चिंता उत्पन्न की है। इन रिपोर्टों में तथ्यों की उपेक्षा कर चीन की छवि को एक आक्रामक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो चीन की ऐतिहासिक और वैचारिक विरासत के एकदम विपरीत है। पाँच हज़ार वर्षों पुरानी चीनी सभ्यता में “शांति सर्वोच्च मूल्य” का दर्शन निहित है। चीन सदैव मानव जाति के साझा भविष्य के समुदाय की अवधारणा को बढ़ावा देता आया है और अपनी विदेश नीति में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांतों को मार्गदर्शक मानता है।

भारत और चीन दोनों ही उन प्राचीन राष्ट्रों में शामिल हैं जिन्होंने औपनिवेशिक शोषण और गुलामी की त्रासदियों का सामना किया। इस साझा इतिहास ने हमें यह सिखाया कि राष्ट्रीय संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और आत्मनिर्भरता किसी भी देश के लिए कितनी पवित्र होती हैं। चीन ने लम्बे संघर्ष और कष्ट के बाद अपने पुनरुत्थान का मार्ग स्वयं निर्मित किया है। भारत ने भी दासता की जंजीरों को तोड़कर स्वतंत्रता अर्जित की। यह समान अनुभव हमें एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और विकास की दिशा का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।

इसी संदर्भ में जापानी नेतृत्व द्वारा थाईवान से संबंधित हालिया वक्तव्य न केवल चिंताजनक है बल्कि अत्यंत निराशाजनक भी। यह स्‍पष्ट कर देना आवश्यक है कि थाईवान चीन का अभिन्न और अविभाज्य अंग है। यह मुद्दा चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के मूल में निहित है, जिस पर कोई समझौता या किसी भी प्रकार की रियायत असंभव है। जापानी नेता का वक्तव्य चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मात्र नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन भी है। ऐसे कदम दोनों देशों के संबंधों की राजनीतिक नींव को कमजोर करते हैं और एशियाई क्षेत्र की शांति व स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करते हैं।

इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता। 20वीं सदी के जापानी सैन्यवाद ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन और अन्य एशियाई देशों पर अमानवीय अत्याचार ढाए। नानचिंग नरसंहार जैसी क्रूरताओं ने चीनी जनता के हृदय में गहरे घाव छोड़े हैं। इन ऐतिहासिक अपराधों के लिए केवल कूटनीतिक बयानबाज़ी पर्याप्त नहीं; आवश्यक है ईमानदार पश्चाताप, सच्ची माफी और ठोस सुधारात्मक कार्रवाई। सच्चा मेल-मिलाप तभी संभव है जब अतीत की सच्चाई को स्वीकार करते हुए भविष्य में ऐसी भूलों की पुनरावृत्ति न होने का वचन दिया जाए।

चीन ने हमेशा यह प्रदर्शित किया है कि उसका विकास मार्ग शांतिपूर्ण है, परंतु अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और विकास हितों की रक्षा करने की उसकी क्षमता और इच्छाशक्ति भी उतनी ही दृढ़ है। चीन का राष्ट्रीय पुनरुत्थान शांति के सिद्धांतों पर आधारित रहा है और आगे भी यही उसका मार्ग रहेगा। चीन की सेनाएँ मूलतः रक्षात्मक स्वभाव की हैं। चीन किसी पर आक्रमण नहीं करता, परंतु यदि कोई देश उसकी संप्रभुता को चुनौती देता है, तो आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग करना उसका नैसर्गिक और वैध अधिकार है।

अंततः, चीन एशिया तथा विश्व में शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए एक रचनात्मक शक्ति के रूप में कार्यरत है। वह भारत सहित सभी पड़ोसी देशों से अपेक्षा रखता है कि वे आपसी सम्मान, समानता और पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों के आधार पर सहयोग की भावना से आगे बढ़ें। वहीं जापान से आशा की जाती है कि वह थाईवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर जिम्मेदार और विवेकपूर्ण रुख अपनाए, अपने ऐतिहासिक दायित्वों को स्वीकार करे, और चीन-जापान संबंधों को सही दिशा में ले जाने के लिए ठोस कदम उठाए। इतिहास का सामना कर, वर्तमान में जिम्मेदारी से कार्य करते हुए, और भविष्य की साझी समृद्धि के लिए मिलजुलकर प्रयास करने में ही हम एक बेहतर, शांतिपूर्ण और समरस विश्व का निर्माण कर सकते हैं।

(लेखक—रमेश शर्मा)

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