इंटरनेशनल डेस्क: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के पीछे छिपे तकनीकी पहलुओं ने दुनिया भर में नई बहस खड़ी कर दी है। बता दें कि ब्रिटेन के एक विस्तृत रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इज़राइल की खुफिया एजेंसियों ने कई वर्षों से तेहरान के डिजिटल नेटवर्क और ट्रैफिक कैमरा सिस्टम में गुप्त रूप से सेंध लगाई थी।
ट्रैफिक कैमरों से नेटवर्क तक- एक लंबी निगरानी योजना
रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान के लगभग सभी ट्रैफिक कैमरे इज़राइली खुफिया नेटवर्क के नियंत्रण में रहे यह कदम सिर्फ कुछ महीने नहीं बल्कि कई सालों तक जारी रहा। इन कैमरों की फुटेज को एन्क्रिप्ट करके विशेष सर्वरों पर भेजा जाता रहा, जिससे खामेनेई और उनके सुरक्षा दस्ते की हर गतिविधि का पैटर्न बनता रहा।
सिर्फ कैमरे ही नहीं, इजरायल ने मोबाइल फोन नेटवर्क और अन्य डिजिटल संचार प्रणालियों तक भी पहुंच बनाई, जिस से सटीक लोकेशन, रूट और सुरक्षा विवरण जैसे डेटा जुटाए गए। इन सूचनाओं ने संयुक्त रूप से अमेरिका और इज़राइल को हमले की सटीक टाइमिंग और लक्ष्य निर्धारण में मदद की।
डिजिटल बुद्धिमत्ता का गहरा प्रभाव
विश्लेषकों का कहना है कि यह पूरी योजना रोबोटिक निगरानी, एआई आधारित पैटर्न पहचान और मानव खुफिया स्रोतों के संयोजन पर आधारित थी। लंबे समय तक इकट्ठा किए गए डेटा ने खुफिया एजेंसियों को किसी भी असामान्य गतिविधि के संकेत को पहचानने की क्षमता दी, जिससे वे प्रमुख फैसले के क्षण को भांप सके।
नेतन्याहू ने दी प्रतिक्रिया
इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हाल ही में फॉक्स न्यूज़ को दिए साक्षात्कार में ईरान पर हुए हमले को जायज़ ठहराया। उन्होंने कहा कि ईरान का इस्लामी शासन अमेरिका को नष्ट करने पर तुला हुआ है। नेतन्याहू ने कहा,
“ईरान 47 वर्षों से ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहा है। उन्होंने हमारे दूतावासों पर हमले किए, हमारे नेताओं की हत्या की कोशिश की और दुनिया भर में आतंक फैलाया।”
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अमेरिका की नज़र
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने फॉक्स न्यूज़ को बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चाहते थे कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। इसके लिए उन्होंने ईरानी शासन की मानसिकता में बदलाव लाने की आवश्यकता महसूस की और सुरक्षा के मद्देनज़र कार्रवाई का निर्णय लिया।