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जापानी सैन्यवाद को दोबारा आने की कभी इजाज़त न दी जाये

इंटरनेशनल डेस्क: इस नवंबर से, थाईवान के मुद्दे पर जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची की हालिया भड़काऊ टिप्पणियों पर चीन ने कड़ा पलटवार किया है। चीनी उप विदेश मंत्री द्वारा चीन में जापानी राजदूत को औपचारिक विरोध के लिए तलब किए जाने से लेकर चीनी नागरिकों को जापान न जाने की सलाह देने और चीन-जापान संयुक्त जनमत सर्वेक्षण और “पेइचिंग-टोक्यो मंच” को टालने तक, चीन का रुख बहुत साफ़ है: थाईवान का मुद्दा रेड लाइन के अंदर एक रेड लाइन है। यह मत कहिए कि आपको चेतावनी नहीं दी गई थी!

साने ताकाइची के उकसावे ने मुख्य हितों को छुआ, और जापान ने पहले ही इसकी असली कीमत चुका दी है। चीन जापान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और उसकी गलत बातों की वजह से टोक्यो शेयर बाज़ार में लगातार गिरावट आई है, और कई चीन-जापान व्यापार गतिविधियों को रद्द या स्थगित किया गया है। नोमुरा के शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अगर चीनी पर्यटकों की संख्या में काफी कमी आती है, तो जापान का आर्थिक नुकसान 22 खरब जापानी येन तक पहुंच जाएगा। घरेलू जनमत ने भी इन बातों की आलोचना करना जारी रखा है, और इन्हें वापस लेने की मांग की है।

इस साल चीन में जापानी आक्रमण विरोधी युद्ध की जीत की 80वीं सालगिरह है। ताकाशी के बयान और कार्यवाइयां सीधे तौर पर जीत के नतीजों को नकारती हैं और युद्ध के बाद की व्यवस्था को चुनौती देते हैं। जापानी शांति संविधान की नंबर 9 धारा को हटाने, आत्म-रक्षा बल को “राष्ट्रीय रक्षा सेना” में बदलने को बढ़ावा देने, परमाणु पनडुब्बी बनाना, हथियारों के निर्यात में ढील देना, और यहां तक कि यासुकुनी मंदिर के बार-बार जाने और “कम्फर्ट वुमन” जैसे युद्ध के इतिहास तथ्यों को नकारने की उनकी वकालत, ऐतिहासिक संशोधनवाद की तरफ़ एक साफ़ झुकाव दिखाता है और सैन्यवाद के फिर से उभरने का साफ़ सबूत है।

कई खतरनाक कदमों की पड़ोसी देशों ने बहुत आलोचना की है। रूस ने इसके ऐतिहासिक संशोधनवाद की आलोचना की। दक्षिण कोरिया ने जापान के साथ संयुक्त अभ्यास को रोका। और डीपीआरके ने इसके “युद्ध जैसे स्वभाव” को दिखाने के लिए इसकी निंदा की। जापान पूर्वी एशिया में शांति के लिए खतरे का स्रोत बन गया है।

दुनिया भर में देखें तो, कई जगहें युद्ध और उथल-पुथल में फंसी हुई हैं, जिससे पूर्वी एशिया में लंबे समय की शांति और भी कीमती हो गई है। सत्ता में कोई भी हो, जापान को अपने वादों का सम्मान करना चाहिए और शांतिपूर्ण विकास का रास्ता अपनाना चाहिए। चीन सैन्यवाद के किसी भी फिर से आने का कड़ा विरोध करेगा और दूसरे विश्व युद्ध की उपलब्धियों और युद्ध के बाद के अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को मज़बूती से बनाए रखेगा। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भी यह पक्का करने के लिए हाथ मिलाना चाहिए कि ऐतिहासिक दुखद घटनाएं दोबारा न हों!

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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