दुनिया इन दिनों बहुत बदल गई है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से दुनिया पर टैरिफ युद्ध थोपा जा रहा है तो दूसरी तरफ रूस और यूक्रेन का युद्ध अंतहीन लग रहा है। ऐसे माहौल में एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अपने कुछ मतभेदों को भुलाकर साथ आना जरूरी है। शांगहाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत और चीन का नजदीक आना इसी वैश्विक जरूरत का नतीजा माना जा सकता है। हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन का दौरा किया।
एससीओ के गठन के वक्त तय हुआ था कि सदस्य देश आतंकवाद का खुलकर और मिलकर मुकाबला करेंगे। इसे छोड़ दें तो यूरोपीय संघ और अमेरिकी दबावों के बावजूद सदस्य देशों के बीच आपसी कारोबार बढ़ाने, जनसहयोग को आगे लाने और वैश्विक मसलों का मिलकर मुकाबला करने की तत्परता और सजगता दिख रही है।
आर्थिक दुनिया में भले ही अमेरिकी मुद्रा डॉलर का दबदबा हो, लेकिन यह भी सच है कि ब्रिटिश मुद्रा पाउंड और यूरोपीय संघ की साझा मुद्रा यूरो के बीच आपसी जंग भी जारी है। इसी माहौल में ब्रिक्स देशों ने डॉलर की बजाय आपसी मुद्रा में कारोबार को लेकर सहमति दिखाई। इससे डॉलर के विमुद्रीकरण का दबाव भी दिख रहा है।
वैश्विक कारोबारी संकट को देखते हुए चीन और भारत के बीच सकारात्मक रिश्ते बनना रणनीतिक तौर पर सही ही माना जाना चाहिए। शायद चीन और भारत का नेतृत्व इसे समझ भी रहा है। यही वजह है कि इसे लेकर दोनों देश कारोबारी सहयोगी के तौर पर उभरने और आगे बढ़ने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
भारत और चीन के राजनयिक संबंधों का यह 75वां साल है। इस संदर्भ में दोनों देशों ने पूरे साल के लिए अपने-अपने यहां कार्यक्रम भी बना रखे हैं। अगले महीने एससीओ देशों की शिखर बैठक होनी है। जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के भी शामिल होने की उम्मीद है। इसलिए भारत-चीन के रिश्तों के मौजूदा रसायन में आ रहे बदलाव को देखना और समझना होगा।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)

