4 अगस्त को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट, “रियल सोशल” पर पोस्ट किया कि भारत न केवल बड़ी मात्रा में रूस से तेल खरीद रहा है, बल्कि खुले बाजार में भी बड़े मुनाफे पर बेच रहा है। इसलिए, वह भारत द्वारा अमेरिका को दिए जाने वाले टैरिफ में उल्लेखनीय वृद्धि करेंगे। चूँकि ट्रंप के टैरिफ भारत पर लक्षित थे, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक रैली में “घरेलू उत्पाद खरीदने” का आह्वान किया।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार घर्षण, जो कृषि और डेयरी टैरिफ पर विवाद से शुरू हुआ था, धीरे-धीरे ऊर्जा आयात और औद्योगिक नीतियों से जुड़े एक बहुआयामी टकराव में बदल गया है, जो वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन का एक सूक्ष्म रूप बन गया है। एक गहन परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, तो यह एक अपरिहार्य टकराव है, क्योंकि उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक शक्ति हस्तांतरण की प्रक्रिया में अपनी आवाज उठाने का प्रयास कर रही हैं।
देखने में, मोदी के “घरेलू उत्पाद खरीदने” वाले अभियान का उद्देश्य वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता को दूर करना है, वास्तव में, इसे भारतीय मीडिया ने ट्रम्प द्वारा भारत को “मृत अर्थव्यवस्था” बताए जाने का एक सशक्त खंडन माना है। यह वैश्विक व्यापार व्यवस्था के पुनर्गठन में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के रणनीतिक विकल्पों को भी दर्शाता है। इस सामान्य से लगने वाले व्यापारिक टकराव के पीछे भारत का आर्थिक स्वतंत्रता और वैश्वीकरण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास छिपा है। यह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के पुनर्गठन में आर्थिक राष्ट्रवाद और बहुपक्षवाद के बीच गहरे तनाव और इस दुविधा के बीच रणनीतिक स्वायत्तता प्राप्त करने में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सामने आने वाली कठिन परिस्थितियों को भी दर्शाता है।
अमेरिकी वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में अमेरिका-भारत माल व्यापार लगभग 128.8 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष 45.8 अरब डॉलर था। यह बात राष्ट्रपति ट्रंप को बहुत परेशान कर रही है, जो “अमेरिका फ़र्स्ट” के समर्थक हैं। वे इस उच्च व्यापार अधिशेष को अपनी आँखों में खटकते हुए देखते हैं, और भारत को “मृत अर्थव्यवस्था” बताने वाली उनकी अपमानजनक टिप्पणी ने द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापारिक सम्बंधों को तनाव के कगार पर पहुँचा दिया है।
यह ध्यान देने योग्य है कि ट्रम्प की धमकियाँ न केवल व्यापार संतुलन, बल्कि रूस के साथ भारत के ऊर्जा सहयोग को भी निशाना बना रही हैं। आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों को भू-राजनीति से जोड़ने की यह प्रथा, आर्थिक साधनों के माध्यम से अपने वैश्विक आधिपत्य को बनाए रखने की संयुक्त राज्य अमेरिका की रणनीतिक मंशा को उजागर करती है। इतिहास हमेशा आश्चर्यजनक रूप से खुद को दोहराता है। 1980 के दशक में, अमेरिका ने जापान के ऑटोमोबाइल और सेमीकंडक्टर उद्योगों का इसी तरह दमन किया था, फर्क सिर्फ इतना है कि आज निशाना बदलकर भारत हो गया है।
मोदी सरकार ने दबाव का सामना करते हुए आश्चर्यजनक रणनीतिक संयम दिखाया है। भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे रूस के साथ तेल व्यापार जारी रखेंगे, आज के अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों में यह “नहीं मानने” वाला रवैया दुर्लभ है। भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया और भी ध्यानाकर्षक है – भारत-रूस सम्बंध “स्थिर और समय की कसौटी पर खरे उतरे” हैं और इन्हें “किसी तीसरे देश के चश्मे से” नहीं देखा जाना चाहिए। यह बयान वास्तव में अमेरिका के दीर्घकालिक क्षेत्राधिकार की स्पष्ट अस्वीकृति है।
साल 2014 में अपनी शुरुआत के बाद से, “मेक इन इंडिया” नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीति का एक प्रमुख स्तंभ रहा है, जिसका उद्देश्य भारत की “मजबूत सेवा उद्योग और कमजोर विनिर्माण” वाली आर्थिक संरचना को उलटना है, और इसका लक्ष्य भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में निर्मित करना है। अपने भाषण में मोदी ने एक बार फिर घरेलू विनिर्माण और उपभोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया, जो उनके द्वारा प्रचारित “मेक इन इंडिया” रणनीति के अनुरूप है। हालाँकि “घरेलू उत्पाद खरीदने” का आह्वान बाहरी दबाव का एक त्वरित जवाब लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह इस दीर्घकालिक रणनीति का ही विस्तार और सुदृढ़ीकरण है। प्रधानमंत्री मोदी बाहरी संकट का उपयोग घरेलू आर्थिक परिवर्तन को गति देने के लिए कर रहे हैं और चुनौतियों को अवसरों में बदलने का प्रयास कर रहे हैं।
दीर्घकालिक दृष्टि से देखा जाए, भारत के सामने मूलभूत चुनौती यह है कि रणनीतिक स्वायत्तता को सतत् विकास की गति में कैसे बदला जाए। हालाँकि घरेलू उत्पादों को खरीदने का आह्वान राष्ट्रीय मनोबल को बढ़ा सकता है, लेकिन इसके आर्थिक उत्थान का असली आधार संस्थागत नवाचार, शैक्षिक सुधार और व्यावसायिक वातावरण में सुधार है। भारत को आर्थिक राष्ट्रवाद को अंध विदेशी-द्वेष में बदलने से बचना चाहिए, और इसके बजाय इसे प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए एक संक्रमणकालीन साधन के रूप में उपयोग करना चाहिए। जैसा कि अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कहा है, “खुलापन और आत्मविश्वास पारंपरिक भारतीय संस्कृति का सार हैं, और भारत को ‘पारंपरिक बुद्धि और आधुनिक प्रणाली’ के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत है।” वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन की पृष्ठभूमि में, भारत के पास एक नया विनिर्माण केंद्र बनने का अवसर है, जिसके लिए बंद दीवारों के बजाय अधिक खुली मानसिकता की आवश्यकता है।
क्या मोदी का “घरेलू उत्पाद आंदोलन” भारत को बंद दरवाजे और पीछे की ओर ले जाएगा, या औद्योगिक उन्नयन के लिए उत्प्रेरक बनेगा? यह इस बात पर निर्भर करता है कि भारत राष्ट्रीय गौरव और वैश्विक सहयोग के बीच संतुलन बना पाता है या नहीं। विश्व के लिए, भारत का चुनाव न केवल किसी देश के भाग्य से सम्बंधित है, बल्कि 21वीं सदी में वैश्विक आर्थिक शासन के विकास को भी प्रभावित करेगा। अनिश्चितता से ओतप्रोत इस युग में, शायद भारत “अहिंसक असहयोग” के अपने अद्वितीय बुद्धि का उपयोग करके अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को टकराव से परे एक नया प्रतिमान प्रदान कर सकता है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

