Site icon Dainik Savera Times

उम्मीदों के रथ पर सवार मोदी की चीन यात्रा

31 अगस्त से एक सितंबर के बीच चीन के थ्येनचिन शहर में होने जा रहे शांगहाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की शिखर बैठक को लेकर ना सिर्फ भारत में उत्सुकता है, बल्कि चीन में भी इसे लेकर उत्साहजनक स्थिति देखने को मिल रही है। इस मौके पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच वर्षों के लंबे अंतराल के बाद होने जा रही चीन की यात्रा। मोदी एससीओ की शिखर बैठक में भाग लेने के लिए जा रहे हैं। 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की ओर से जारी वैश्विक टैरिफ युद्ध के बीच मोदी की चीन यात्रा के मायने निकाले जाने स्वाभाविक है। इसकी वजह यह है कि इस बैठक के दौरान एशिया की दो ताकतों की शिखर हस्तियां मिलेंगी। शिखर हस्तियां मिलेंगी तो बात भी होगी और बात होगी तो संवाद की राह निकलेगी और संवाद होगा तो वैश्विक राजनीति में कुछ न कुछ नया जरूर होगा। मोदी की चीन यात्रा को पिछले साल अक्टूबर में रूस के कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से हुई मुलाकात का विस्तार माना जा रहा है। 

इसे संयोग कहें या कुछ और कि जिस दिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर पचास प्रतिशत तक टैरिफ थोपने की कोशिश की, ठीक उसी दिन यानी आठ अगस्त को मोदी की चीन यात्रा का आधिकारिक ऐलान हुआ। हालांकि राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि ट्रंप के ऐलान के ठीक वक्त मोदी की चीन यात्रा की घोषणा एक तरह से अमेरिका को चेतावनी है।

भारत और चीन के आपसी रिश्तों को लेकर चाहे जो भी बातें होती रही हों, लेकिन यह तय है कि फिलहाल दोनों देशों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिका की ओर से लगातार थोपा जाना आयात शुल्क है। जो दोनों देशों की आर्थिकी को चोट पहुंचा सकता है। अमेरिका एक तरह से टैरिफ के जरिए वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बना रहा है। भले ही अमेरिका ने किसी खुले युद्ध का ऐलान नहीं किया है, लेकिन उसका टैरिफ थोपना एक तरह से आर्थिक युद्ध ही है। भारत और चीन द्वारा रूस से खनिज तेल की खरीद अमेरिका को पसंद नहीं आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपनी कोशिशें नाकाम होने से भी एक तरह से हताशा में हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध रोक पाने में उनकी नाकामी ने उन्हें लगता है कि हताशा से भर दिया है। इसीलिए वे दबाव बनाने के लिए दुनिया के उन देशों पर टैरिफ थोपकर दबाव में लाना चाहते हैं, जिन्होंने अब तक अमेरिकी दबाव को स्वीकार नहीं किया है। ब्राजील, भारत और चीन इसके सबसे ज्यादा शिकार हैं। यहां याद करना जरूरी है कि ये तीनों ही देश रूस के साथ ब्रिक्स से महत्वपूर्ण भागीदार हैं। अमेरिका को ब्रिक्स की बढ़ती ताकत भी नहीं सुहा रही है। उसे लगता है कि ब्रिक्स और एससीओ जैसे संगठनों की ताकत बढ़ने से वैश्विक स्तर पर उसका प्रभाव घट सकता है। इसलिए भी वह इन देशों पर दबाव बना रहा है।

बतौर प्रधानमंत्री मोदी का चीन का यह छठवां दौरा है। साल 2014 में भारत की सत्ता संभालने के बाद से वे 2015, 2016, 2017, 2018 में दो बार चीन का दौरा कर चुके है। भारत-चीन के दोनों राष्ट्राध्यक्षों की आखिरी मुलाकात अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हुई थी। ट्रेड वार और टैरिफ विवाद के बीच भारत की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करने और वैश्विक मंच पर भारत की आवाज को बुलंद करने का सुनहरा अवसर मोदी की इस यात्रा के जरिए मिल सकता है। 

मोदी के चीन दौरे पर भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा और आर्थिक सहयोग के मुद्दे पर चर्चा के आसार हैं। पिछले महीने भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपनी चीन यात्रा के दौरान पेइचिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी से कई आर्थिक मुद्दों पर चर्चा की थी। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा आर्थिक सहयोग को और मजबूत कर सकती है। 

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)

ये भी पढ़ें : Anti Corruption Bureau की बड़ी कार्रवाई: 40 हजार की रिश्वत लेते पकड़ा गया सब-इंस्पेक्टर 

Exit mobile version