हाल ही में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में महासभा की 80वीं उच्च-स्तरीय बैठक हुई, जिसने संयुक्त राष्ट्र के भविष्य पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है। चिंताएं “वित्त पोषण की कमी के कारण इसकी कार्य करने की क्षमता सीमित होना” से लेकर “मात्र सजावट के रूप में इसकी भूमिका” और “इसकी महत्वपूर्ण और अपूरणीय भूमिका के लिए अटूट समर्थन” तक फैली हुई हैं। आज के अशांत समय में, संयुक्त राष्ट्र वैश्विक शासन की आधारशिला क्यों बना हुआ है? इसका जवाब इसके 80 साल के इतिहास और वर्तमान समय के लिए इसके मिशन में निहित हैः स्थिति जितनी अधिक चुनौतीपूर्ण होगी, हमें संयुक्त राष्ट्र को केंद्र में रखते हुए बहुपक्षवाद के आदर्शों को उतना ही अधिक मज़बूत करना होगा।
संयुक्त राष्ट्र का मूल्य मानवता की शांति और विकास की साझी खोज में निहित है। अस्सी साल पहले, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने दो विश्व युद्धों के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की थी और इसके चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के माध्यम से वैश्विक शासन के लिए मूलभूत ढाँचा स्थापित किया था। संयुक्त राष्ट्र को केंद्र में रखने वाली यह अंतर्राष्ट्रीय कानून पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था ही है, जिसने मानवता को व्यापक शांति प्राप्त करने और अभूतपूर्व विकास एवं समृद्धि की ओर अग्रसर होने में सक्षम बनाया है। इस वर्ष की संयुक्त राष्ट्र महासभा में, 80% से अधिक सदस्य देशों ने फ़िलिस्तीन राज्य को मान्यता दी, जो अंतर्राष्ट्रीय सहमति बनाने और संप्रभु समानता के सिद्धांत को बनाए रखने की संयुक्त राष्ट्र की क्षमता का एक ज्वलंत उदाहरण है।
संयुक्त राष्ट्र का अधिकार वर्तमान में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। दुनिया उथल-पुथल और परिवर्तन के एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ एकतरफावाद और शीत युद्ध की मानसिकता फिर से उभर रही है। कुछ देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं, बकाया राशि का भुगतान नहीं कर रहे हैं और बहुपक्षीय नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। इससे संयुक्त राष्ट्र के लिए वित्तीय संकट पैदा हो गया है और संशयवाद बढ़ गया है। हालाँकि, इन समस्याओं का मूल कारण स्वयं संयुक्त राष्ट्र की विफलता नहीं, बल्कि कुछ ताकतों द्वारा बहुपक्षवाद के साथ विश्वासघात है। शासन के दो दर्शनों के बीच टकराव स्पष्ट है: संप्रभु समानता और व्यापक परामर्श, संयुक्त योगदान और साझे लाभों पर आधारित बहुपक्षीय सहयोग, बनाम शक्ति और जंगल के कानून में अंध विश्वास का एकतरफा तर्क। पहला सही रास्ता है जो समय के रुझानों के अनुरूप है और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की मूल आकांक्षा को मूर्त रूप देता है।
वैश्विक चुनौतियों का सामना करते हुए, संयुक्त राष्ट्र के आदर्शों को कायम रखने के लिए कार्रवाई के माध्यम से और भी अधिक समर्थन की आवश्यकता है। एक संस्थापक सदस्य के रूप में, चीन हमेशा संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों का कट्टर समर्थक रहा है। शांगहाई सहयोग संगठन के थियानचिन शिखर सम्मेलन में वैश्विक शासन पहल का प्रस्ताव रखने, वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार की रूपरेखा तैयार करने, जलवायु शिखर सम्मेलन में राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों के एक नए दौर की घोषणा करने, वैश्विक विकास पहल पर उच्च-स्तरीय बैठक की मेज़बानी करने, सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा के त्वरित कार्यान्वयन का आह्वान करने, संयुक्त राष्ट्र सुधार के लिए “पाँच-सूत्री प्रस्ताव” प्रस्तुत करने और चीन-संयुक्त राष्ट्र वैश्विक दक्षिण-दक्षिण विकास सहायता तंत्र की स्थापना की घोषणा करने तक… चीन के ठोस कार्यों से यह स्पष्ट होता है कि संयुक्त राष्ट्र के आदर्शों को कायम रखने के लिए इसकी मूल भूमिका की रक्षा करना और समय के साथ इसकी प्रगति को बढ़ावा देना, दोनों आवश्यक हैं।
आज, एकतरफावाद के उदय और वैश्विक मुद्दों के आपस में उलझने के बीच, संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर सवाल उठाने के बजाय, हमें इस सबसे सार्वभौमिक अंतरराष्ट्रीय संगठन को शांति और विकास के अपने मिशन को बेहतर ढंग से पूरा करने में सक्षम बनाने के लिए आम सहमति बनानी चाहिए और सुधारों को मज़बूत करना चाहिए। जैसा कि इस संयुक्त राष्ट्र महासभा का विषय, “एक साथ: शांति, विकास और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के 80 वर्ष, अतीत पर निर्माण और एक नया अध्याय गढ़ना,” दर्शाता है, केवल संयुक्त राष्ट्र के आदर्शों को कायम रखकर ही हम चुनौतियों के बीच मानवता के लिए एक साझे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

