अगर आप आज किसी चीनी शहर की सड़क पर निकलें, चाहे बीजिंग की तेज़ रफ्तार हाईवे, शनचन की स्मार्ट लेन या शांगहाई के बिज़नेस ज़ोन में, तो एक बात तुरंत नज़र आती है: सड़कों पर दौड़ती इलेक्ट्रिक कारें। पेट्रोल और डीज़ल की गाड़ियाँ अब पीछे छूटती यादों जैसी लगती हैं। एक समय था जब चीन को “साइकिलों का देश” कहा जाता था, और आज वही देश दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन (EV) निर्माता और उपभोक्ता बन चुका है। यह सिर्फ गाड़ियों का बदलाव नहीं, बल्कि सोच और नीतियों के नए दौर की कहानी है।
चीन की EV यात्रा रातों-रात नहीं शुरू हुई। दो दशक पहले सरकार ने यह तय कर लिया था कि ऊर्जा के लिए तेल आयात पर निर्भर रहना सुरक्षित नहीं है। औद्योगिक विकास के साथ प्रदूषण और ईंधन संकट भी बढ़ रहा था। तब चीन ने दूरदर्शी फैसला लिया– “न्यू एनर्जी व्हीकल्स” को बढ़ावा देने का। इसमें इलेक्ट्रिक कारें, प्लग-इन हाइब्रिड और हाइड्रोजन फ्यूल सेल जैसी गाड़ियाँ शामिल थीं।
आज नतीजा सामने है। साल 2024 तक चीन में बिकने वाली हर तीन में से एक गाड़ी इलेक्ट्रिक है। दुनिया के कुल EV बाजार का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा चीन के पास है। साल 2023 में चीन ने अकेले 90 लाख से ज़्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बेचीं। और ये लहर सिर्फ कारों तक सीमित नहीं– बसें, टैक्सियाँ, डिलीवरी वैन और ट्रक तक अब इलेक्ट्रिक हो रहे हैं।
इस क्रांति की असली ताकत चीन की सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता है। चीन ने समझ लिया कि असली जंग गाड़ियों की नहीं, बैटरियों की है। यही वजह है कि CATL और BYD जैसी कंपनियाँ आज दुनिया की सबसे बड़ी बैटरी निर्माता हैं। CATL, जो टेस्ला से लेकर BMW तक को बैटरी देती है, ने ऐसी बैटरी बनाई है जो एक बार चार्ज में 1000 किलोमीटर तक चल सकती है– दिल्ली से मुंबई की दूरी, बिना रुके।
BYD की कहानी और भी दिलचस्प है। जिसने कभी बैटरी बनाना शुरू किया था, वही अब दुनिया में टेस्ला की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी बन चुकी है। साल 2024 में BYD ने वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बेचकर नया इतिहास रचा। उसके मॉडल– Seal, Dolphin और Atto 3, अब यूरोप, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका की सड़कों पर भी दिखाई दे रहे हैं।
चीन की सरकार ने इस बदलाव की जमीन तैयार की। शुरुआत में भारी सब्सिडी, टैक्स छूट और इंफ्रास्ट्रक्चर का समर्थन मिला। जब बाकी देश यह सोचने में उलझे थे कि “EVs भविष्य हैं या नहीं,” तब चीन चार्जिंग स्टेशनों का नेटवर्क बना रहा था। आज देश में 26 लाख से अधिक चार्जिंग पॉइंट हैं जो पूरी दुनिया के चार्जिंग नेटवर्क का आधा से ज्यादा हिस्सा है। अब तो छोटे कस्बों और गांवों में भी चार्जिंग स्टेशन दिखने लगे हैं।
चीन ने EV को सिर्फ गाड़ी नहीं, बल्कि “स्मार्ट टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म” के रूप में देखा। हर EV अब पहियों पर चलता कंप्यूटर है– AI ड्राइविंग सिस्टम, ओवर-द-एयर अपडेट्स और स्मार्ट कनेक्टिविटी के साथ। यही वजह है कि Xiaomi, Huawei और Baidu जैसी टेक कंपनियाँ भी इस इंडस्ट्री में उतर चुकी हैं। Xiaomi की SU7 कार ने लॉन्च के सिर्फ एक हफ्ते में 70,000 से ज़्यादा बुकिंग हासिल कीं।
इस उद्योग ने चीन के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को बदल दिया है। एक तरफ, EVs ने कार्बन उत्सर्जन घटाने में बड़ी भूमिका निभाई है। चीन ने साल 2030 तक “कार्बन पीक” और 2060 तक “कार्बन न्यूट्रल” बनने का लक्ष्य रखा है। दूसरी तरफ, EV सेक्टर ने लाखों नई नौकरियाँ पैदा की हैं, जैसे- बैटरी निर्माण, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, रिसाइक्लिंग और सर्विस सेक्टर में।
अब सवाल है क्या यह क्रांति टिकाऊ है?
संकेत तो हाँ कहते हैं। चीन अब घरेलू बाजार से आगे बढ़कर निर्यात पर ध्यान दे रहा है। साल 2024 में उसने 50 लाख से ज़्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ एक्सपोर्ट कीं और जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा वाहन निर्यातक बन गया। यूरोप में चीनी EVs की मांग तेजी से बढ़ रही है, हालांकि इससे यूरोपीय देशों में बेचैनी भी है। यूरोपीय संघ अब जांच कर रहा है कि कहीं चीन की सरकारी सब्सिडी उनके स्थानीय उद्योगों को तो नहीं डुबो देगी।
चीन की EV क्रांति एक बड़ा सबक देती है– भविष्य वही लिखता है जो उसकी कल्पना करने की हिम्मत रखता है। चीन ने दिखा दिया कि अगर सोच, तकनीक और नीति एक साथ चलें, तो पहिए ही नहीं, दिशा भी बदल जाती है। साइकिलों के देश से इलेक्ट्रिक गाड़ियों के देश बनने तक का यह सफर बताता है कि चीन अब सिर्फ दौड़ नहीं रहा, बल्कि दुनिया को नई राह दिखा रहा है।
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(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, बीजिंग)

