Site icon Dainik Savera Times

नए शीत्सांग की करवट: विकास और विरासत का संगम

चीन के शीत्सांग स्वायत्त प्रदेश  की सुबह का वह दृश्य आज भी मेरी आंखों में बसा है। शीत्सांग की राजधानी ल्हासा के नीले साफ़ आसमान के नीचे चमकती पोताला पैलेस की सफेद दीवारें, ठंडी हवा में फहराते प्रार्थना झंडे और दूर पहाड़ों पर फैलती सुनहरी धूप बहुत सुकून देती है। इसी धरती की शांतिपूर्ण आज़ादी के 75 साल पूरे हो रहे हैं। 23 मई, 1951 को वह 17 सूत्रीय समझौता हुआ था जिसे चीन पीसफुल लिबरेशन ऑफ शीत्सांग कहता है। आज यह एक पूरे युग की याद दिलाता है।

मैं पहली बार 2021 में शीत्सांग पहुंचा था। विमान ने जैसे ही इस प्रदेश की राजधानी ल्हासा की धरती को छुआ, मुझे महसूस हुआ कि मैं सिर्फ एक शहर में नहीं बल्कि एक पूरी सभ्यता के बीच उतर रहा हूं। एयरपोर्ट से शहर की ओर आती नई और चौड़ी सड़क पर चलते हुए एक तरफ बर्फ से ढके पहाड़ थे और दूसरी तरफ सूखी घाटियां थीं। बीच में तेज़ रफ्तार से भागती आधुनिक ज़िंदगी भी दिख रही थी। होटल पहुंचते-पहुंचते ऊंचाई की वजह से हल्का सिर चकराने लगा था, लेकिन मन के भीतर एक अजीब सी शांति भी थी।

ल्हासा की पुरानी गलियों और खासकर जोखांग मंदिर के आसपास के माहौल ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया। एक ओर घुटनों तक झुक कर दंडवत करती बुज़ुर्ग महिलाएं थीं जिनके हाथों में माला और होंठों पर मंत्र थे। दूसरी ओर हाथ में स्मार्टफोन लिए युवा थे जो सेल्फी लेते हुए उसी रास्ते पर चक्कर लगा रहे थे जिसे पुराने तीर्थयात्री नंगे पांव नापा करते थे। शाम को बर्खोर स्ट्रीट की भीड़ में चलते हुए मुझे लगा जैसे मैं किसी जीवित संग्रहालय में हूं जहां इतिहास और आधुनिक जीवन साथ-साथ सांस लेते हैं।

साल 2023 में जब मैं दोबारा ल्हासा लौटा तो शहर कुछ और बदला हुआ नज़र आया। एयरपोर्ट से शहर तक का रास्ता और भी व्यवस्थित हो गया था। शहर के भीतर बिजली से चलने वाली बसों की संख्या बढ़ चुकी थी। रात के समय रोशनी से सजा हुआ पुराना ल्हासा पर्यटकों के लिए एक सुंदर नज़ारे जैसा दिखता था। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि आज ल्हासा की कमाई का बड़ा हिस्सा पर्यटन और सेवा क्षेत्र से आता है। साल 2021 तक पर्यटन से होने वाली कमाई शहर की कुल कमाई का लगभग आधा हिस्सा मानी गई है। यह सिर्फ संख्या नहीं हैं बल्कि इस बात की तस्वीर है कि शीत्सांग की अर्थव्यवस्था में यात्रियों और तीर्थयात्रियों की क्या भूमिका बन चुकी है।

लेकिन शीत्सांग की असली कहानी सिर्फ राजधानी में नहीं बल्कि उसके दूरदराज इलाकों में भी छुपी है। ल्हासा के आसपास कई गांवों को गरीबी दूर करने के मॉडल के तौर पर विकसित किया गया है। तातोंग जैसे गांवों में पारंपरिक घरों को संवार कर वहां रुकने की जगह और सांस्कृतिक केंद्र बनाए गए हैं। इससे स्थानीय लोगों की कमाई और रोज़गार के नए रास्ते खुले हैं। जब मैं ऐसे ही एक गांव के आंगन में बैठकर तिब्बती नमकीन चाय पी रहा था, तो एक बुज़ुर्ग किसान ने मुझसे कहा कि पहले सर्दियों में बस ठंड और खाली समय होता था लेकिन अब मेहमान भी आते हैं और आमदनी भी होती है।

शीत्सांग की मेरी यादों का दूसरा बड़ा हिस्सा आली प्रिफ्रेक्चर है जिसे दुनिया की छत कहा जाता है। यह इलाका साढ़े 4 हज़ार मीटर की औसत ऊंचाई पर बसा है। यहां दूर तक फैले पठार, बर्फीली चोटियां और नीली झीलों के बीच घूमते जंगली याक प्रकृति का एक बड़ा मंच तैयार करते हैं। यहां की आबादी बहुत कम है और सन्नाटा इतना गहरा है कि कभी-कभी अपनी ही सांसों की आवाज़ भी तेज़ लगती है। उस सन्नाटे में भी मुझे डर नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक गहराई महसूस हुई। ऐसा लगता था जैसे प्रकृति खुद आपको धीरे बोलने और ध्यान से सुनने के लिए कह रही हो।

कैलाश मानसरोवर की यात्रा मेरे लिए सिर्फ एक पत्रकार का दौरा नहीं बल्कि अंदर तक बदल देने वाला अनुभव था। कैलाश पर्वत को हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन जैसी कई परंपराओं में पवित्र माना जाता है। इसके दक्षिण में फैली मानसरोवर झील को बौद्ध ग्रंथों में दुनिया की नदियों की जननी कहा गया है। लगभग 4587 मीटर की ऊंचाई पर बर्फीली चोटियों की गोद में फैली यह मीठे पानी की झील ऐसी लगती है जैसे आसमान धरती पर झुक गया हो। किनारे पर परिक्रमा और मंत्र पढ़ते तीर्थयात्रियों के बीच मैं कई बार कैमरा नीचे रखकर बस चुपचाप बैठ गया। उस चुप्पी में मुझे लगा कि शीत्सांग की असली भाषा शब्द नहीं बल्कि वह खामोशी ही है।

साल 2021 और 2023 के बीच सबसे बड़ा बदलाव सड़कों और जुड़ाव का था। ल्हासा से शिगात्से होते हुए मानसरोवर और कैलाश तक जाने वाला लंबा रास्ता अब पक्की सड़कों से जुड़ गया है। अब छोटे वाहन भी वहां आसानी से चल सकते हैं। बेहतर सड़कों और यातायात ने न सिर्फ यात्रियों की संख्या बढ़ाई है बल्कि दूर बसे गांवों के लिए अस्पताल और स्कूल तक पहुंचना भी आसान बना दिया है। यह विकास कागज़ पर लिखी किसी नीति से ज़्यादा रोज़मर्रा की ज़िंदगी में महसूस होने वाला बदलाव है।

यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात एक ड्राइवर से हुई जिसने कहा कि पहले हफ्तों लगते थे लेकिन अब हम 15 या 16 दिन में ल्हासा से कैलाश मानसरोवर का पूरा चक्कर लगाकर वापस आ जाते हैं। अब पर्यटन ही हमारा मुख्य काम बन गया है। वहीं एक छोटे होटल के मालिक ने बताया कि सरकार की मदद और पर्यटकों की बढ़ती संख्या की वजह से उसने अपने मिट्टी के पुराने घर को सुधार कर एक गेस्टहाउस बना लिया है। अब वहां इंटरनेट और गर्म पानी जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। इन बातों में मुझे एक ही बात बार-बार सुनाई दी कि ज़िंदगी आसान हुई है पर हमारी संस्कृति भी बची रहनी चाहिए। यही वाक्य नए शीत्सांग की सबसे बड़ी चिंता और उम्मीद दोनों है।

अगर हम 75 साल पीछे जाकर 1951 के उस समय को देखें तो चीन के दस्तावेज़ बताते हैं कि उस समय का शीत्सांग एक पुरानी व्यवस्था में बंधा समाज था। आज के सरकारी कागज़ों में इस पूरे सफर को विकास और खुशहाली की कहानी के रूप में लिखा जाता है। ज़ाहिर है कि इस बात पर दुनिया भर में अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन वहां हुए ज़मीनी बदलाव जैसे सड़क, बिजली, स्कूल और अस्पताल को आप नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

मेरे लिए शीत्सांग एक आईना भी है और एक सवाल भी। आईना इसलिए क्योंकि वहां दिखता है कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता साथ कैसे चल सकते हैं जहां एक हाथ में प्रार्थना चक्र है तो दूसरे हाथ में स्मार्टफोन। सवाल इसलिए कि क्या तेज़ी से हो रहा विकास शीत्सांग की उस शांति और खास संस्कृति को बचा पाएगा जिसकी वजह से दुनिया भर के लोग यहां खिंचे चले आते हैं। ल्हासा की जगमगाती रातों और कैलाश मानसरोवर के शांत किनारों के बीच झूलती यही डोर नए शीत्सांग की असली कहानी है। 

शीत्सांग ने मुझे सिखाया कि विकास का मतलब सिर्फ सड़कें बनाना नहीं बल्कि उन लोगों की आंखों में चमक भी है जो पहली बार अपनी मेहनत से मिली नई ज़िंदगी का स्वाद चख रहे हैं। जब भी मैं शीत्सांग का नाम सुनता हूं तो मेरे मन में वही ठंडी हवा और हिमालय की मुस्कान तैर जाती है।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)

(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, पेइचिंग)

Exit mobile version