Last Updated: September 26, 2026

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शीत्सांग का दौरा- शीत्सांग में हुए विकास और सौंदर्य को देखकर होता है आश्चर्य

May 24, 2026

शीत्सांग का दौरा- शीत्सांग में हुए विकास और सौंदर्य को देखकर होता है आश्चर्य

इंटरनेशनल डेस्क: चीन के दक्षिण पश्चिम में स्थित विश्व की छत और धरती का तीसरा ध्रुव कहे जाने वाले शीत्सांग का नाम सुनकर ही रोमांच पैदा होता है। बौद्ध धर्म का प्रमुख स्थल होने के साथ-साथ आध्यात्म और बौद्ध मठों व लामाओं की धरती के रूप में भी इसे जाना जाता है। कैलाश मानसरोवर और विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट भी शीत्सांग में है। शीत्सांग की औसत ऊंचाई 4 हज़ार मीटर से अधिक है। दुनिया भर के लिए रहस्यमयी और बाहरी लोगों की पहुंच से बहुत दूर शीत्सांग की सुंदरता अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। शीत्सांग आखिर कैसा है, वहां के लोगों का जीवन कैसा है, वहां की संस्कृति कैसी है, इस तरह के सवाल अक्सर मेरे मन में उठते थे।

वर्ष 2014 में शीत्सांग से सटे छिंगहाई प्रांत(तिब्बती बहुल) में 4780 मीटर की ऊंचाई तक जाने का मौका मिला था। पर शीत्सांग जाने के लिए मन आतुर था, चीन में कई वर्षों से रहते हुए भी ऐसा नहीं हो पाया था। और इस बार 4 जुलाई 2016 को जीवन का अविस्मरणीय अवसर आया, जब बीजिंग से विदेशियों के एक दल के साथ शीत्सांग के लिए रवाना हुआ। शीत्सांग जाने का मकसद था, वहां आयोजित होने वाले, “तिब्बत विकास मंच ” में शिरकत करना।

पेइचिंग से ल्हासा की दूरी(हवाई मार्ग) लगभग 2,200 किमी. है, सोमवार 4 जुलाई की सुबह 7.40 पर एयर चायना के एयरोप्लेन ने पेइचिंग एयरपोर्ट से ल्हासा के लिए उड़ान भर दी। दोपहर के वक्त हमारा प्लेन ल्हासा हवाई अड्डे पर उतरा। ल्हासा एयरपोर्ट पर उतरते ही हमें शीत्सांग में हो रहे विकास की झलक मिल गयी। पठार पर होने के बावजूद, एयरपोर्ट को सभी सुविधाओं से युक्त बनाया गया है।

बस में बैठते ही हमें पता लगा कि एयरपोर्ट से हमारे होटल की दूरी लगभग 60 किमी. है। पहली बार शीत्सांग पहुंचे विदेशियों के लिए एयरपोर्ट से शहर जाने वाली शानदार सड़क को देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। सड़क पर कहीं पर भी गड्डे नहीं थे और हमारी बस सरपट दौड़ रही थी। एयरपोर्ट से होटल तक की दूरी तय करने में बस ने महज 45 मिनट का समय लिया।

शीत्सांग पिछले कुछ वर्षों में कितना कुछ बदल गया है, यह मुझे हावर्ड यूनिवर्सटी के प्रोफेसर और शीत्सांग मामलों के जानकर लियोनार्ड वान डर क्वेजिप से मिलकर पता चला। वह कहते हैं कि जब साल 1982 में पहली बार शीत्सांग आए थे, तब हवाई अड्डे से ल्हासा शहर तक पहुंचने में करीब 6 घंटे लगते थे। सड़क पूरी तरह कच्ची, ऊबड़-खाबड़ और टूटी थी, एयरपोर्ट से शहर तक जाना किसी चुनौती से कम नहीं होता था। यह शीत्सांग में हुए जबरदस्त बदलाव की तस्वीर पेश करने का एक सटीक उदाहरण है।

ल्हासा शहर को देखकर बिल्कुल भी नहीं लगता कि हम चीन के दक्षिण पश्चिम में सुदूर पठार पर आ गए हैं। यहां ऊंची-ऊंची इमारतें, मॉल, होटल, शॉपिंग सेंटर, पेट्रोल पंप के साथ-साथ अच्छी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है। बेहतरीन सड़कें और आधुनिक सुविधाओं से लैस स्कूल और विश्वविद्यालय देखकर बाहरी लोगों की शीत्सांग के प्रति सोच बदलने लगी है। 1959 से पहले शीत्सांग में एक भी आधुनिक स्कूल नहीं था। अब 1500 से अधिक स्कूल हैं। ऐसा नहीं है कि शीत्सांग में सब आधुनिक हो चुका है, परंपरागत भवन, तिब्बती शैली के मंदिर, मठ और बाज़ार भी हैं। अब भी तमाम लोग तिब्बती वेश-भूषा में ही नजर आते हैं। जो इस बात का उदाहरण कहे जा सकते हैं कि सरकार ने आधुनिकता पर जोर देने के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति को भी बराबर महत्व दिया है।

बौद्ध धर्म को शीत्सांग में बड़ा सम्मान हासिल है। लोग भारतीय बौद्ध भिक्षुओं के शीत्सांग पहुंचने और उनके ज्ञान की चर्चा करते हैं। शीत्सांग के मठों में जाकर अहसास होता है, कि भारत से किस तरह बौद्ध धर्म का पड़ोसी मुल्कों में प्रसार हुआ। यहां के मठों में अवलोकितेश्वर, शाक्य मुनि आदि की बड़ी-बड़ी मूर्तियां सैंकड़ों वर्षों से सुरक्षित हैं।

ल्हासा से सौ किमी. से अधिक दूर लोका प्रिफेक्चर में सातवीं से नवीं शताब्दी के बीच निर्मित साम्ये मठ है, जो शीत्सांग में बौद्ध धर्म के आगमन की कहानी पेश करता है। यह शीत्सांग का पहला मठ माना जाता है। मठ में प्राचीन मंदिरों और अवशेषों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया है। ल्हासा के केंद्र में स्थित प्राचीन जोखांग मठ है, जो तिब्बती, भारतीय और नेपाली पुरातात्विक डिजाइन में निर्मित है। वहां दूर-दूर से आए श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। मठ में बौद्ध भिक्षुओं के अलावा आम लोगों की बहुत भीड़ रहती है। जोखांग मठ से सटी हुई है बार्खोर स्ट्रीट, वहां कई तरह के स्थानीय उत्पाद मिलते हैं, साथ ही भारतीय और नेपाली वस्तुएं, जिनमें परिधान के अलावा, धूप, अगरबत्ती आदि शामिल हैं।

इसके साथ ही ल्हासा में स्थित और विश्व प्रसिद्ध पोताला महल के आसपास 11 बजे भी चहल-पहल रहती है, यह शीत्सांग के आधुनिक होने का एक और नमूना है। लाल पहाड़ी पर स्थित उक्त महल का विशाल ढांचा स्तब्ध कर देने वाला है, जो विशेष तिब्बती स्टाइल में बना है, अब तक पूरी तरह सुरक्षित है। 1994 में इसे वर्ल्ड कल्चरल हैरिटेज साइट घोषित किया गया। पूर्व से पश्चिम में 400 मीटर और उत्तर से दक्षिण में 350 मीटर तक फैले महल में एक हज़ार कमरे हैं।

ल्हासा से दक्षिण में स्थित 170 किमी. दूर शान नान कस्बा है। रास्ते में ल्हासा नदी और विशाल यारलोंग जांगपो नदी(शीत्सांग की सबसे बड़ी नदी ) भी पड़ती है। नदी की विशालता के अलावा जिस चीज़ ने हमारा सबसे अधिक ध्यान खींचा, वह था नदी के किनारों पर किया गया वृक्षारोपण, जहां नजर दौड़ायी जाय,वहां पानी के साथ-साथ पौधे लगाए गए थे। पूछने पर पता चला कि पठारीय इलाके में नदी में पानी कम हो जाने पर तेज हवा रेत को उड़ा ले जाती है, जिससे आसपास के गांवों में धूल का गुबार उठता रहता है। इससे निजात पाने के लिए यह तरीका अपनाया गया है। यह वही नदी है जो, भारत के असम में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र और बांग्लादेश में जमुना नदी कहलाती है। रास्ते में छोटे-छोटे गांव भी दिखे, लोगों द्वारा पाले गए याक, भेड़ व अन्य जानवर भी। इसके अलावा हम शीत्सांग के पहले डेमोक्रेटिक रिफ़ार्म विलेज गए। वहां पर मौजूद चीजें 1959 के पहले की शीत्सांग की याद दिला रही थी। बताते हैं कि भूदास व्यवस्था के दौरान जमींदार आम लोगों को दास बनाकर जंजीरों में बांध कर रखते थे। वह जगह अब भी छोटे से म्यूजियम के तौर पर संरक्षित है। स्थानीय अधिकारी 28 मार्च 1959 को शीत्सांग के इतिहास की एक नयी शुरुआत मानते हैं। जिसके बाद लाखों लोग सामंती दास व्यवस्था की जकड़नों से बाहर निकले।

यहां बता दें कि छिंगहाई- शीत्सांग पठार पर ऑक्सीजन की कमी होती है और अधिकांश क्षेत्रों में कड़ाके की सर्दी भी पड़ती है। कृषि योग्य भूमि की कमी के चलते लोगों की आजीविका मुख्य तौर पर पशुपालन और डेयरी उत्पादों से जुड़ी हुई है। पशुओं में भेड़, बकरी, याक, घोड़े और ऊंट आदि शामिल होते हैं। हालांकि गेहूं, जौ, कुटू आदि के साथ फल और सब्जियों का भी उत्पादन होता है।

लोग सब्जियों की बजाय पशुओं और उनके मांस को भोजन के तौर पर ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इतनी ऊंचाई पर सब्ज़ियां और फल उगाना मुश्किल होता है। हमने देखा कि ऊंचे पठारों पर नर्सरी के रूप में सब्जियां, फल और फूल लगाए गए थे। जो पूरी तरह आर्गेनिक थे। इससे न केवल लोगों को साग-सब्जी व फल उपलब्ध होते हैं, बल्कि किसानों की आय भी बढ़ रही है।शीत्सांग में पांच हवाई अड्डों के अलावा चौड़ी-चौड़ी सड़कें और शानदार रेल नेटवर्क मौजूद है। इन दिनों विभिन्न शहरों को आपस में जोड़ने के लिए रेल लाइन का निर्माण जोरों पर है।

जुलाई 2006 में शीत्सांग को चीन के अन्य प्रांतों से जोड़ने वाली रेल लाइन का जिक्र किए बिना शीत्सांग की चर्चा अधूरी रहेगी। रेल ने शीत्सांग के विकास में अहम भूमिका निभाई है। विश्व के सबसे ऊंचे पठार से गुजरने वाली ट्रेन से शीत्सांग जाने वालों की संख्या हर साल 15 फीसदी की दर से बढ़ रही है। छिंगहाई प्रांत की राजधानी शीनिंग से ल्हासा तक की दूरी 1956 किमी. है। शीत्सांग सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में करीब 31.09 मिलयन पर्यटक शीत्सांग गए। जिनमें से अधिकतर लोगों ने छिंगहाई- शीत्सांग रेलमार्ग से यात्रा की। रेल और हवाई यात्रा सुगम होने से पर्यटन की स्थिति अच्छी हो चुकी है। शीत्सांग की जीडीपी, 2024 तक 277 अरब युआन पहुंच चुकी है। जबकि 2005 में जीडीपी महज लगभग 24 अरब युआन के आसपास थी। शीत्सांग में मोबाइल और इंटरनेट की पहुंच भी तेजी से बढ़ रही है। वहां मोबाइल इंटरनेट यूजर्स की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है।

शीत्सांग में मुझे लगभग 6 दिन रहने का अवसर मिला, इस दौरान जो भी देखा, वह प्रभावित करने वाला था। यह कहने में संकोच नहीं है कि चीन ने शीत्सांग ने ऐसा काम कर दिखाया है, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। आधुनिकता के साथ-साथ स्थानीय परंपरा और संस्कृति के संरक्षण पर भी जोर दिया जा रहा है। चीन ने दूसरे प्रांतों की तरह शीत्सांग के महत्व को समझा और विकास और आधुनिकता की दौड़ में आगे की कतार पर खड़ा कर दिया है।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)(लेखक—अनिल पांडेय)

लेखक चाइना मीडिया ग्रुप में वरिष्ठ पत्रकार हैं, पिछले कई वर्षों से चीन में हैं।

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