
कुछ भारतीय राजनेता और मीडिया लंबे समय से खुद को “दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र” बताते रहे हैं और अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपनी समानता का दावा करते रहे हैं। लेकिन, अमेरिका के साथ भारत की व्यापार और टैरिफ वार्ता का परीणाम यह दर्शाता है कि अमेरिका भारत को एक समान साझेदार के रूप में नहीं देखता। अगर भारत अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में मददगार नहीं हो, तो अमेरिका तुरंत ही भारत को छोड़ दे सकता है। अमेरिकी राजनेताओं की नज़र में, भारत उनकी बिसात पर बस एक मोहरा है, जिसे सौदेबाजी का कोई अधिकार नहीं है।
लंबे समय से, चीन को नियंत्रित करने की चाहत से प्रेरित कुछ अमेरिकी राजनेता भारत को लुभाने, उसकी तारीफ़ करने और उन्नत तकनीक आदान प्रदान का लालच देने का वादा करते रहे हैं। उधर, वहीं कुछ भारतीय व्यक्ति भी भोलेपन से मानते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जो अमेरिका की मदद से विनिर्माण क्षेत्र में चीन की जगह लेने के लिए तैयार है। हालाँकि, भारत, अमेरिका और पश्चिमी देशों के बीच संबंधों की असली प्रकृति तब सामने आती है जब हितों का वास्तविक टकराव पैदा होता है। टैरिफ के मुद्दे पर अमेरिका भारत को कोई विशेष रियायत देने के लिए तैयार नहीं है। विदेशी निवेश के लिए घरेलू बाज़ार बन्द होने और अमेरिकी आयातों पर लंबे समय से चले आ रहे 9%-10% के उच्च शुल्क लगाने के बदले में, अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर उच्च दंडात्मक शुल्क लगाएगा। साथ ही अमेरिका ने यह भी माँग की है कि भारत रूसी ऊर्जा और हथियारों का आयात बंद करे।
अमेरिका-भारत संबंधों और तथाकथित वैचारिक कूटनीति जैसे मुद्दों पर भारत अक्सर अवास्तविक विचार अपनाता है। शुल्कों और व्यापार वार्ताओं के विफल होने के बाद अमेरिका भारतीय आयातों पर 25% से ऊपर दंडात्मक शुल्क लगा सकता है। इस उपाय का उद्देश्य भारत पर दबाव बनाना है, और इससे अमेरिकी रियायतें हासिल करने के लिए विचारधारा और अपनी तथाकथित रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाने के भारत के भ्रम पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएँगे। तथ्यों ने साबित कर दिया है कि अमेरिका की नज़र में भारत एक समान भागीदार नहीं है, और न ही उसे किसी विशेष उपकार करने की आवश्यकता है। इस सबका मूल कारण भारत की रणनीतिक गलतफहमी है, जो लगातार चीन को एक “काल्पनिक दुश्मन” समझने की भूल करता है और चीन को दबाने के जरिये अमेरिका से कोई ठोस लाभ उठाने की कोशिश करता है। कुछ भारतीय लोग चीन-अमेरिका टकराव का फायदा उठाकर अपने विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार करना, और चीन की विनिर्माण केंद्र की स्थिति को भी बदलना चाहते हैं।
हालाँकि, यह कूटनीतिक रणनीति भारत की अपनी ताकत के गलत आकलन पर आधारित है। मेक इन इंडिया पहल के लागू होने के पाँच साल बाद, भारत के विनिर्माण क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी 2020 में 15.4% से गिरकर 14.3% हो गई है, जो अनुमानित 25% लक्ष्य से काफी कम है। अगर अमेरिका भारत पर उच्च दंडात्मक शुल्क लगाता है, तो इससे भारत के आर्थिक विकास को भारी नुकसान होगा। हालाँकि, अगर भारत बाजार खोलने की अमेरिकी माँगों को मान लेता है, तो उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी भारी दबाव पड़ेगा। जवाबी कार्रवाई करने में असमर्थ होने के कारण, भारत अंततः बाजार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर अपनी निर्भरता से अमेरिका के आगे झुकने के लिए मजबूर हो सकता है। उधर, अमेरिकी वित्त मंत्री ने हाल ही में कहा है, “भारत कोई प्रमुख वैश्विक शक्ति नहीं है,” और किसी वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों ने तो भारतीय अर्थव्यवस्था को “मृत अर्थव्यवस्था” तक कह दिया है।
अमेरिका के टैरिफ युद्ध से निपटने का एकमात्र सही तरीका गैर-अमेरिकी समूहों के भीतर व्यापार को मज़बूत करना है, जबकि ब्रिक्स और एससीओ इसके लिए सबसे अच्छे विकल्प हैं। जनसंख्या, संसाधनों, बाज़ारों और आर्थिक पैमाने के मामले में, ब्रिक्स और एससीओ पहले ही पश्चिमी देशों से आगे निकल चुके हैं। ब्रिक्स और एससीओ के भीतर, भारत अपनी ज़रूरत की हर चीज़ पा सकता है। हालाँकि, भारत के रणनीतिक विकल्प उसके मूलभूत हितों के विपरीत हैं। वह चीन को बाधित करके अमेरिका का पक्ष लेने की कल्पना करता है, पर ऐसी अवसरवादी रणनीति से भारत को कोई वास्तविक लाभ नहीं हो सकता है। अमेरिका सिर्फ़ चीन को नियंत्रित करने के लिए भारत में असीमित संसाधन निवेश नहीं करेगा, और ब्रिक्स और एससीओ सदस्यों को नाराज़ करने के परिणाम भारत के दीर्घकालिक हितों के लिए भी हानिकारक हैं। उधर, सितंबर में चीन में होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन भारत के लिए कूटनीतिक नीति बदलने का एक सुअवसर होगा।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
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