हाल ही में विभिन्न देशों के राजनेताओं और प्रसिद्ध विद्वानों ने चाइना मीडिया ग्रुप(सीएमजी) के पत्रकारों को दिये साक्षात्कारों में विश्व फ़ासीवाद-विरोधी युद्ध की विजय में चीन के ऐतिहासिक योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की, वैश्विक शासन के लिए चीन के शांतिपूर्ण विकास पथ के महत्व पर जोर दिया, और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से इतिहास से सीखने, एकजुट होने और सहयोग करने, तथा मानवता के लिए एक शांतिपूर्ण भविष्य की संयुक्त रूप से रक्षा करने का आह्वान किया।
श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री दिनेश गुणावर्धने ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध में विजय न केवल एक महान सैन्य विजय थी, बल्कि “फ़ासीवाद के विरुद्ध मानवता की लड़ाई और आधिपत्य के विनाश में एक मील का पत्थर” भी थी। 1951 के सैन फ्रांसिस्को शांति सम्मेलन में, श्रीलंका ने चीन के फ़ासीवाद-विरोधी रुख का दृढ़ता से समर्थन किया। यह ऐतिहासिक निर्णय दर्शाता है कि “एकता हमेशा शांति को बढ़ाने और संघर्ष को समाप्त करने के लिए सबसे शक्तिशाली बल रही है।”
फिलीपीन एशियाई शताब्दी सामरिक अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष हरमन तिउ लॉरेल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जापानी आक्रमण विरोधी युद्ध के दौरान चीन और फिलीपींस की नियति आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। चीनी प्रवासियों द्वारा गठित जापानी-विरोधी गुरिल्ला बलों ने जापानी आक्रमणकारियों का विरोध करने के लिए फिलीपीन के सैनिकों और लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी।
म्यांमार के विदेश मंत्रालय के सामरिक और अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में वरिष्ठ शोध अध्येता डॉ. नाइंग स्वे ऊ ने कहा कि युद्ध का स्मरण करना न केवल पीड़ा को याद करने के बारे में है, बल्कि स्वतंत्रता और विकास के लिए मानव जाति द्वारा किए गए निरंतर प्रयासों और बलिदानों पर विचार करने के बारे में भी है, ताकि संयुक्त रूप से शांति का मार्ग खोला जा सके।
चीन में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत, मोइन उल हक ने कहा कि चीन ने ऐतिहासिक आघात को शांति घोषणा में बदल दिया है, तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए “इतिहास से सीखने और भविष्य की ओर देखने” का उदाहरण स्थापित किया है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

