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‘जिमनिख’ बैठक में हिस्सा लेने के लिए साइप्रस पहुंचे एस जयशंकर, जानें किन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा

S. Jaishankar

S. Jaishankar

नेशनल डेस्क: भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर बुधवार को साइप्रस पहुंचे हैं, जहां वह यूरोपीय संघ (EU) के विदेश मंत्रियों की अहम अनौपचारिक बैठक ‘जिमनिख’ में हिस्सा लेंगे। इस बैठक को वैश्विक राजनीति और सुरक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। दुनिया इस समय कई बड़े संकटों से गुजर रही है, इसलिए इस बैठक पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी हुई है।

दरअसल, पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ रहे तनाव, ऊर्जा संकट और वैश्विक व्यापार से जुड़ी चुनौतियों ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में भारत की भागीदारी को भी काफी अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बैठक में भारत और यूरोप के बीच रणनीतिक सहयोग को लेकर भी महत्वपूर्ण चर्चा हो सकती है।

क्या है जिमनिख बैठक?

यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की इस अनौपचारिक बैठक को ‘जिमनिख’ कहा जाता है। इसमें यूरोप के देशों के विदेश मंत्री और कुछ साझेदार देश वैश्विक मुद्दों पर खुलकर चर्चा करते हैं। बैठक में सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संकट, आर्थिक चुनौतियां और रणनीतिक साझेदारी जैसे विषय शामिल रहते हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोशल मीडिया के जरिए जानकारी दी कि वह इस बैठक में भाग लेने के लिए साइप्रस पहुंचे हैं। उन्होंने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख और साइप्रस सरकार को निमंत्रण के लिए धन्यवाद भी दिया।

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किन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा?

जानकारों के मुताबिक, इस बैठक में पश्चिम एशिया संकट सबसे बड़ा मुद्दा रह सकता है। इसके अलावा ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और यूरोप के सामने खड़ी आर्थिक चुनौतियों पर भी चर्चा होने की संभावना है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से यूरोप लगातार आर्थिक और सुरक्षा दबाव का सामना कर रहा है। वहीं होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल सप्लाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। ऐसे में भारत और यूरोपीय संघ के बीच सहयोग को बेहद जरूरी माना जा रहा है।

क्यों अहम भारत की भूमिका?

भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक मंचों पर उसकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। यूरोप भी भारत को एक अहम रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता जैसे मुद्दों पर भारत और यूरोप के बीच सहयोग आने वाले समय में और बढ़ सकता है। जयशंकर की यह यात्रा इसी दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत और साइप्रस के संबंध

साइप्रस लंबे समय से भारत का करीबी सहयोगी देश रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और कूटनीतिक रिश्ते अच्छे रहे हैं। साइप्रस यूरोपीय संघ का सदस्य भी है, इसलिए भारत के लिए उसका रणनीतिक महत्व और बढ़ जाता है। माना जा रहा है कि इस यात्रा से भारत और साइप्रस के संबंधों को नई मजबूती मिल सकती है।

पश्चिम एशिया संकट का असर

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है। तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव हो रहा है और समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरा बढ़ा है। इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसी वजह से इस बैठक में ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा होने की उम्मीद है। भारत भी पहले कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन चिंताओं को उठा चुका है।

क्या मजबूत होंगे भारत-यूरोप संबंध?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक भारत और यूरोपीय संघ के रिश्तों को नई दिशा दे सकती है। दोनों पक्ष व्यापार, रक्षा, जलवायु परिवर्तन और नई तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। दुनिया इस समय बड़े भू-राजनीतिक बदलावों के दौर से गुजर रही है। ऐसे में जयशंकर की यह यात्रा और जिमनिख बैठक भविष्य की वैश्विक रणनीति के लिहाज से काफी अहम मानी जा रही है। यह बैठक केवल यूरोप तक सीमित नहीं मानी जाती। यहां होने वाली चर्चाओं का असर वैश्विक राजनीति, सुरक्षा और आर्थिक नीतियों पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि साइप्रस में हो रही इस बड़ी रणनीतिक बैठक पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

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