शांगहाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की हालिया बैठक में जिस तरह रूस, चीन और भारत एक साथ आए हैं, जिस तरह इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासन प्रमुखों ने आपसी रिश्तों को पारिभाषित किया है, वह एक तरह से अमेरिका को चुनौती है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से वैश्विक व्यवस्था एक तरह से अमेरिका और यूरोप केंद्रित रही है। आर्थिक तौर पर वैश्विक स्तर पर अमेरिका का वर्चस्व रहा । लेकिन एससीओ की हालिया बैठक ने इस शक्ति संतुलन को अमेरिका की बजाय एशिया और एक हद तक वैश्विक दक्षिण की ओर केंद्रित कर दिया है।
चूंकि यह सम्मेलन ट्रम्प द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत का दंडात्मक टैरिफ लगाए जाने और रूसी ऊर्जा निर्यात की खरीद के लिए देश की आलोचना किए जाने के कुछ ही दिनों बाद हुआ है। दुनिया की दो बड़ी जनसंख्या वाले देशों भारत और चीन का साथ आना मौजूदा वैश्विक शक्ति संतुलन को एक तरह से चुनौती है। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने शिखर सम्मेलन में कहा, “वैश्विक शासन एक नए चौराहे पर पहुंच गया है।”
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि एससीओ ना सिर्फ “वास्तविक बहुपक्षवाद” को पुनर्जीवित करेगा, बल्कि “यूरेशिया में स्थिरता और सुरक्षा की नई प्रणाली के गठन के लिए राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक आधार तैयार करेगा”।
एससीओ की स्थापना 2001 में हुई थी। तब से एक तरह से देखा जाए तो इस संगठन की भूमिका वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक हलके में प्रतीकात्मक ही रही है। लेकिन बीती बैठक के बाद एक तरह से वह अपनी ताकत को बढ़ाता नजर आ रहा है और प्रतीकात्मक भूमिका से बाहर निकलता दिख रहा है। जिस तरह चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने शिखर सम्मेलन में एससीओ समूह की बड़ी महत्वाकांक्षाओं को रेखांकित किया है, उससे एससीओ की बदलती सक्रिय भूमिका का ही अंदाजा मिलता है। शी चिनफिंग ने नये एससीओ विकास बैंक के निर्माण की अपील की है। इसके साथ ही उन्होंने एससीओ सदस्यों के लिए करीब 280 मिलियन डॉलर के अनुदान के साथ ही करीब 1.4 बिलियन डॉलर के कर्ज का ऐलान किया है। एक तरह से इसके जरिए एससीओ को आर्थिक महाकेंद्र बनाने की ही तैयारी कहा जा सकता है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)

