भारत और चीन के इतिहास में कुछ समानताएं जुड़ी हैं। इसे संयोग ही कहेंगे कि भारत को अंग्रेजी राज से आजादी साल 1947 में मिली और चीन में 1949 में साम्यवादी क्रांति हुई। भारत पहला गैर समाजवादी देश रहा, जिसने साम्यवादी चीन को राजनयिक मान्यता दी। दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते 1950 में बने, जिसने पचहत्तर साल की यात्रा पूरी कर ली है। दोनों देशों के बीच जब राजनयिक संबंध बने तो उसकी बुनियाद में अहम शर्त थी, एशिया के बीच आपसी एकजुटता। बेशक यह आदर्शवादी विचार बाद के दौर में कायम नहीं रह सका। लेकिन जब यह संबंध बना तो चीन और भारत के बीच आदर्शवादी विचार तो हावी थे, लेकिन दोनों देशों के बीच सीमाओं को लेकर कुछ खींचतान भी रही, रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी रही। लेकिन आज यह संबंध इन सबके बावजूद दोनों देशों के बीच रिश्तों का नाजुक संतुलन बनाए रखने की कोशिश बन गई है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच का राजनयिक संबंध आपसी सहयोग, एक-दूसरे की आर्थिक निर्भरता और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने को लेकर साझा जिम्मेदारी बनाए रखने को लेकर प्रतिबद्धता पर केंद्रित हो गया है।
इसमें दो राय नहीं है कि चीन की गुरू भूमि माने जाने वाले भारत की विदेश नीति को आज सबसे ज्यादा चीन प्रभावित कर रहा है तो एशियाई मामलों में चीन की विदेश नीति के पीछे कहीं न कहीं भारत भी जिम्मेदार कारक बन खड़ा हुआ है। दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तें जिस मुकाम पर हैं, उनमें एक बात स्पष्ट है कि आर्थिक पलड़ा चीन की ओर झुका हुआ है। हाल के दिनों में भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई बातचीत के बाद दोनों देश और करीब आएं हैं। अमेरिकी टैरिफ युदध के दौर में दोनों देशों ने समझा है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है।
राजनयिक रिश्तों की पचहत्तरवीं सालगिरह के मौके पर दोनों देशों की आपसी समझ भी बढ़ती नजर आ रही है। इसका उदाहरण है, भारत द्वारा चीन के महत्वपूर्ण शहर शंघाई में अपना नया और अत्याधुनिक वाणिज्य दूतावास शुरू करना। करीब 1,436.63 वर्गमीटर में बना भारतीय वाणिज्य दूतावास पूर्वी चीन में भारतीय समुदाय को जहां सहूलितयें मुहैया कराएगा, वहीं कारोबार और पर्यटन के लिए भारत आने वाले चीन के नागरिकों के लिए भी मददगार साबित होगा। इसकी वजह से दोनों देशों के बीच के व्यापारिक रिश्ते और मजबूत होंगे। इस नए कॉन्सुलेट में वीजा, व्यापार और सांस्कृतिक सेवाओं को एक जगह उपलब्ध कराने की भारत की तैयारी है और माना जा रहा है कि इससे भारत-चीन के बीच संपर्क भी बढ़ेगा। भारत की ओर से यह बदलाव 32 साल बाद हुआ है। बत्तीस साल से जहां वाणिज्य दूतावास चल रहा था, उसे अब नए और पहले की तुलना में कहीं ज्यादा भव्य स्थान पर शिफ्ट किया है। शंघाई का यह दूतावास चीन के पूर्वी हिस्से के यीवू, हांगझोउ, निंगबो, सूझोउ और नानजिंग जैसे बड़े बिजनेस सेंटरों में कारोबाररत भारतीय व्यापारियों के लिए मददगार होगा। यह वाणिज्य दूतावास चीन के चांगनिंग जिले के मशहूर डॉवनिंग सेंटर में बनाया गया है। यह दूतावास पुराने वाणिज्य दूतावास के भवन से दोगुना बड़ा है। इस दूतावास ने आठ दिसंबर से कामकाज शुरू भी कर दिया है। कह सकते हैं कि इस बहाने भारत ने चीन में सक्रिय भारतीय कारोबारियों को जहां राजनयिक संबंधों के पचहत्तर साल के मौके पर उपहार दिया है, वहीं चीन की ओर एक और कदम बढ़ाया है।
भारत और चीन के बीच संबंध तो तब से ही हैं, जब से दोनों देश हकीकत बने हैं। क्योंकि दोनों की सीमाएं मिलतीत हैं। लेकिन दोनों के बीच के संबंधों के ऐतिहासिक लिखित साक्ष्य करीब दो हजार साल से मिलते हैं। सिल्क रूट को लेकर चीन प्रचीन काल से ही प्रसिद्ध है। दोनों देशों के राजनयिक संबंधों की कहानी के बारे में कह सकते हैं कि उसी प्राचीन रिश्ते का नया रूप है। इस नए रूप को दोनों देशों को सजाना है, ताकि सीमा के दोनों ओर के लोगों को और नजदीक लाया जा सके, एशिया की एकता की अवधारणा को गहराई तक बढ़ाया जा सके और दोनों ओर की जनता की सहूलियतों को बढ़ाकर उन्हें और ज्यादा खुशहाल बनाया जा सके।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)