इंटरनेशनल डेस्क: जब भी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, दुनिया भर के बाजारों की धड़कन तेज हो जाती है। टीवी चैनलों पर “युद्ध का खतरा”, “तेल की कीमतों में उछाल” और “वैश्विक आपूर्ति में झटका” जैसे शब्द अचानक आम हो जाते हैं। सवाल उठता है, आखिर दो देशों के बीच टकराव से पूरी दुनिया क्यों घबरा जाती है? इसका सीधा जवाब हमें हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य तक ले जाता है। यह वही जगह है, जहां से गुजरने वाली हर जहाज की चाल पर दुनिया की अर्थव्यवस्था टिकी होती है।
दरअसल, अमेरिका-ईरान के रिश्ते लंबे समय से उतार चढ़ाव से भरे रहे हैं। कभी प्रतिबंध, कभी सैन्य चेतावनी, कभी समुद्री झड़पें। और हर बार जब यह तनाव बढ़ता है, सबसे पहले नजरें हॉर्मुज़ पर टिक जाती हैं, क्योंकि यही वह बिंदु है जहां से हालात बिगड़े तो असर सीधा तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर पड़ता है।
हाल ही में, ईरान में बढ़ता युद्ध होर्मुज़ जलडमरूमध्य से टैंकरों की आवाजाही को पूरी तरह से ठप कर चुका है, और तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं; यह इस बात को उजागर करता है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में यह संकरा जलमार्ग कितनी अहम भूमिका निभाता है।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के नक्शे पर एक पतली सी रेखा है, लेकिन इसकी अहमियत बहुत गहरी है। इसके उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) स्थित हैं। यह रास्ता अपने प्रवेश और निकास बिंदुओं पर लगभग 50 किलोमीटर चौड़ा है, जबकि सबसे संकरे हिस्से में इसकी चौड़ाई करीब 33 किलोमीटर रह जाती है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और खाड़ी देशों से निकलने वाला भारी मात्रा में तेल और गैस इसी रास्ते से होकर दुनिया तक पहुंचता है।
दुनिया आज भले ही नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रही हो, लेकिन सच्चाई यह है कि तेल और गैस अब भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। बड़े बड़े उद्योग, परिवहन व्यवस्था, हवाई यात्रा, यहां तक कि रोजमर्रा की कई चीजें इसी ऊर्जा पर निर्भर हैं। इसलिए हॉर्मुज़ सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि ग्लोबल एनर्जी जीवनरेखा है। यहां शांति रही तो सब कुछ सामान्य, और जरा सी अस्थिरता आई तो पूरा सिस्टम हिल जाता है।
व्यापार के नजरिए से देखें तो हॉर्मुज़ एक व्यस्त हाईवे की तरह है। हर दिन सैकड़ों जहाज यहां से गुजरते हैं। अगर यह रास्ता बंद हो जाए या असुरक्षित हो जाए, तो जहाजों को लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। इसका मतलब है ज्यादा समय, ज्यादा ईंधन और ज्यादा लागत। और आखिर में यह बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं तक पहुंचती है। यानी आपकी रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं, सिर्फ इसलिए कि कहीं दूर समुद्र में तनाव है।
इस जलडमरूमध्य की कहानी केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, इसमें राजनीति और रणनीति भी बराबर शामिल हैं। ईरान के लिए यह जलडमरूमध्य एक अहम हथियार जैसा है। इसके ज़रिए वह अमेरिका और उसके साथियों पर दबाव बना सकता है। वजह साफ है, अगर यहां रास्ता बंद हुआ या आवाजाही में बड़ी रुकावट आई, तो दुनिया भर के तेल बाज़ार में भारी उथल-पुथल मच सकती है, जैसी स्थिति 1970 के दशक के तेल संकट में देखी गई थी।
दूसरी ओर, अमेरिका और उसकी नौसेना चाहते हैं कि यह समुद्री रास्ता हर हाल में खुला रहे, इसलिए वे यहां लगातार मौजूद रहते हैं। लेकिन जब हालात सीधे युद्ध तक पहुंच जाते हैं, तो पुराने नियम काम नहीं करते। ऐसे समय में हर देश सबसे पहले अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देता है।
इसी वजह से मौजूदा अमेरिका-ईरान टकराव को कई विशेषज्ञ सिर्फ एक क्षेत्रीय लड़ाई नहीं मानते। उनका मानना है कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है, ख़ासकर तेल की कीमतों से लेकर महंगाई, ब्याज दरों के फैसलों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की स्थिरता तक।
देखा जाए तो हॉर्मुज़ की ताकत उसकी चौड़ाई में नहीं, बल्कि उसकी पकड़ में है। यह एक ऐसा चोकपॉइंट है, जहां से गुजरने वाली हर बूंद तेल की कीमत तय करती है कि दुनिया में महंगाई कितनी होगी, व्यापार कितना सहज रहेगा और अर्थव्यवस्था कितनी स्थिर होगी। इसलिए जब भी अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी बढ़ती है, असली चिंता केवल युद्ध की नहीं होती, बल्कि उस पतले से समुद्री रास्ते की होती है, जो पूरी दुनिया की आर्थिक सांसों को नियंत्रित करता है।
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, बीजिंग)

