दो दशक पहले, चीन ने तेजी से सस्ती वस्तुएं बनाने और निर्यात करने की अपनी क्षमता से दुनिया को चौंका दिया था। इसका सबसे ज्यादा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था ही नहीं, उसकी राजनीति पर भी पड़ा था। लेकिन चीन की यह तेजी अब इंडोनेशिया से लेकर जर्मनी और ब्राजील होते हुए तकरीबन पूरी दुनिया को दिख रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने जो टैरिफ युद्ध शुरू किया है, उसका एक मात्र उद्देश्य चीन जैसे देशों को दबाव में लाना है। इसके बावजूद चीनी कारखानों में बने खिलौने, कार और जूते दूसरे देशों को इतनी तेजी से निर्यात हो रहे हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति बदल रही है। इस साल अब तक वैश्विक कारोबार में चीन की हिस्सेदारी के चलते चीन का व्यापार अधिशेष लगभग 500 बिलियन डॉलर हो गया है, जो पिछले साल की तुलना में 40 प्रतिशत से ज्यादा है। इसका असर यह हो रहा है कि चीन की आर्थिकी तेजी से आगे बढ़ रही है और वैश्विक बाजार में चीन के सामान तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं।
कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि अमेरिका चाहे जितना भी टैरिफ लगा ले, दुनियाभर में निर्यात के लिए चीन के पास ढेरों चीजें हैं। इस वजह से चीन के निर्यात को रोक पाना लगभग असंभव है। चीन कई वर्षों से अपने विनिर्माण क्षेत्र में निवेश कर रहा है। इसकी वजह से उसकी घरेलू मांग की तुलना में कहीं ज्यादा चीजें चीन में बन रही हैं। इसकी वजह से हर तरह के सामानों के लिए चीन की वैश्विक बाजार हिस्सेदारी में तेजी से बढ़ी है। ट्रंप की नई टैरिफ नीति के बावजूद इसमें तेजी रहेगी, क्योंकि पेइचिंग अपनी निर्यातोन्मुख नीतियों को बदलने की सोच भी नहीं रहा। दक्षिण पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका और यूरोप में अपने सामान के प्रवाह को मोड़कर, चीन ने पहले ही संयुक्त राज्य अमेरिका से मांग में गिरावट के आर्थिक प्रभाव को कम कर दिया है। ट्रम्प उन्हीं देशों पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं, जिनके बाजार चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं। इनमें वियतनाम, कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं।
इस बीच कुछ दूसरे देश भी कुछ चीनी सामानों को संयुक्त राज्य अमेरिका में निर्यात करने की कोशिशों में हैं। अगर वे टैरिफ को कम करने की बातचीत को सफल नहीं बना सकते तो दक्षिण पूर्व एशिया और अन्य जगहों पर गंभीर अमेरिकी टैरिफ का सामना करने वाले देशों को संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसे चीन को ध्यान में रखना होगा। चीन ने 2015 में ही घरेलू औद्योगिक नीति शुरू कर दी थी, जिसे मेड इन चाइना 2025 के नाम से जाना जाता है, जिसका उद्देश्य उच्च-कुशल, अधिक मूल्यवान सामान जैसे परिष्कृत कंप्यूटर चिप्स और इलेक्ट्रिक वाहन आदि बनाना है। इसके कारण संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप ने इलेक्ट्रिक कारों, सौर पैनलों और अन्य उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ा दिया।
बहरहाल सोमवार 17 जून को चीन में आए आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि बढ़ती बाहरी अनिश्चितताओं के बावजूद मजबूत वृहद आर्थिक नीतियों के चलते मई महीने में चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार की प्रवृत्ति जारी रही। राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, चीन का मूल्य-वर्धित औद्योगिक उत्पादन – विनिर्माण, खनन और उपयोगिता क्षेत्रों में गतिविधि में अप्रैल में 6.1 प्रतिशत की वृद्धि के बाद मई में 5.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखी। चीन में खुदरा बिक्री और उपभोक्ता खर्च के चलते अर्थव्यवस्था में मई में सालाना के हिसाब से 6.4 प्रतिशत और अप्रैल में 5.1 प्रतिशत की बढ़त देखी गई। जाहिर है कि निर्यात और घरेलू दोनों ही मोर्चे पर चीन की आर्थिकी को टैरिफ नीतियों का खास असर पड़ता नहीं दिख रहा है। चीन में इसके साथ ही, बुनियादी ढांचे, संपत्ति, मशीनरी और उपकरण सहित वस्तुओं पर खर्च में पिछले साल की तुलना में जनवरी-मई की अवधि के दौरान 3.7 प्रतिशत बढ़ी, जबकि इसके पहले के चार महीनों में, यह बढ़त 4 प्रतिशत रही। राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के सर्वेक्षण के अनुसार चीन में शहरी बेरोजगारी दर अप्रैल के 5.1 प्रतिशत की तुलना में मई में 5 प्रतिशत रहना भी बताता है कि चीन में आर्थिक बढोतरी बनी हुई है। चीन की अर्थव्यवस्था की मई में जारी स्थिर वृद्धि की वजह उसकी मजबूत और लचीली आर्थिक नीतियों को माना जा रहा है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— उमेश चतुर्वेदी)

