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ब्रिक्स और एससीओ की मूलभूत विशेषता है गैर-पश्चिमी होना

CHINA, TIANJIN - JULY 15, 2025: Director of the SCO Executive Committee of the Regional Anti-Terrorist Structure Ularbek Sharsheev, Uzbekistan’s Mnister of Foreign Affairs Baxtiyor Saidov, Kyrgyzstan's Minister of Foreign Affairs Jeenbek Kulubayev, Foreign Minister of India Subrahmanyam Jaishankar, Kazakhstan's Foreign Minister Murat Nurtleu, Russia's Foreign Minister Sergei Lavrov, China's Foreign Minister Wang Yi, Pakistan's Foreign Minister Mohammad Ishaq Dar, Belarus' Foreign Minister Maxim Ryzhenkov, Iran's Foreign Minister Abbas Araghchi, Tajikistan's Foreign Minister Sirojiddin Muhriddin, Shanghai Cooperation Organisation Secretary General Nurlan Yermekbayev (L-R) pose for a group photo before the 2025 meeting of the Council of Foreign Ministers of the Shanghai Cooperation Organization (SCO). Russian Foreign Ministry/TASS

ब्रिक्स और एससीओ (शांगहाई सहयोग संगठन) हाल के वर्षों में विश्व मंच पर उभरी सबसे शक्तिशाली ताकतें हैं। ब्रिक्स और एससीओ के सदस्यों की संयुक्त जनसंख्या, क्षेत्रफल और आर्थिक ताकत पश्चिमी देशों से अधिक है। यह कहा जा सकता है कि किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे का समाधान ब्रिक्स और एससीओ के बिना सही मायने में नहीं किया जा सकता। उधर, ब्रिक्स और एससीओ की मूलभूत विशेषता यह है कि उनके सभी सदस्य पश्चिम से अलग हैं, तथा अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सहयोग के मुद्दों पर उनकी पश्चिम से स्वतंत्र अपनी मांगें हैं।

सभी ब्रिक्स सदस्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं। ब्रिक्स सहयोग तंत्र का मूल उद्देश्य बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को बनाए रखने की वकालत करना, संरक्षणवाद का विरोध करना, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में सुधार को बढ़ावा देना और वैश्विक दक्षिण देशों की आवाज को बढ़ाना है। इसी विचार में चीन ने बेल्ट एंड रोड पहल जैसी पहलों के माध्यम से ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में अन्य ब्रिक्स सदस्यों के साथ व्यावहारिक सहयोग किया है, विकासशील देशों के हरित परिवर्तन का समर्थन किया है, और खुलेपन, समावेशिता, सहयोग और उभय-जीत के परिणामों की ब्रिक्स भावना के अनुसार सदस्य देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया है। एससीओ की मूल अवधारणा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून के सार्वभौमिक रूप से मान्यता प्राप्त मानदंडों का पालन करना, विश्व शांति और सुरक्षा के रखरखाव का समर्थन करना तथा अच्छे पड़ोसी और मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करना था। एससीओ चार्टर और एससीओ सदस्य देशों के बीच दीर्घकालिक अच्छे पड़ोसी, मैत्री और सहयोग पर संधि “शांगहाई भावना” का पालन करती है, जिसमें “आपसी विश्वास, पारस्परिक लाभ, समानता, परामर्श, विविध सभ्यताओं के प्रति सम्मान और आम विकास की खोज” इसकी मूल सामग्री है, जो सभी सदस्य देशों के लोगों के लिए एक स्थायी शांतिपूर्ण वातावरण का निर्माण करती है।

ब्रिक्स और एससीओ दोनों ही जी7, जी20 सहित पश्चिम के प्रभुत्व वाले अन्य संगठनों से मौलिक रूप से भिन्न हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र ने विश्व शांति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन, संयुक्त राष्ट्र के मंच पर सब कुछ नियंत्रित न कर सकने के कारण अमेरिका और पश्चिम ने दूसरे कई अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक, आर्थिक और वित्तीय संस्थाओं की स्थापना की है। उधर, विकासशील देशों ने दीर्घकालिक प्रयासों के माध्यम से राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी ताकत में अभूतपूर्व वृद्धि की है। वे इस बात से संतुष्ट नहीं हैं कि पश्चिम ही सब कुछ का प्रतिनिधित्व करता है। इसी परिप्रेक्ष्य में ब्रिक्स और एससीओ सदस्य अंततः एक साथ आ गए। गैर-पश्चिमी होना ब्रिक्स और एससीओ की मूलभूत विशेषता है। सभी ब्रिक्स और एससीओ सदस्य देश, चाहे उनकी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था, जनसंख्या का आकार, भौगोलिक स्थिति और आर्थिक विकास का स्तर कुछ भी हो, निर्णय लेने में समान अधिकार का आनंद लेते हैं। वे संयुक्त रूप से अच्छे पड़ोसी, मैत्रीपूर्ण और सहयोगी संबंध विकसित करते हैं, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और व्यापार, ऊर्जा, परिवहन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सूचना, पर्यावरण संरक्षण, मानविकी आदि जैसे साझा हित के सभी क्षेत्रों में सहयोग करते हैं और शांतिपूर्ण तरीकों से अपने मतभेदों को सुलझाते हैं। और वे गुटनिरपेक्षता, अन्य देशों और क्षेत्रों को निशाना न बनाने तथा बाहरी दुनिया के प्रति खुलेपन के सिद्धांतों का भी पालन करते हैं।

वर्तमान में, ब्रिक्स सहयोग तंत्र धीरे-धीरे 11 सदस्य देशों और 10 साझेदार देशों की शामिली हो चुकी है। ब्रिक्स की भावना सहयोग पर जोर देती है, दूसरे देशों को बंदिश और बहिष्कार का विरोध करती है, तथा वैश्विक शासन को अधिक न्यायसंगत और समावेशी दिशा में विकसित करने को बढ़ावा देती है, तथा पारस्परिक लाभ और जीत-जीत परिणाम प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। ये सिद्धांत कुछ पश्चिमी देशों के दबंग रवैये के बिल्कुल विपरीत हैं, जो अक्सर प्रतिबंध, नाकेबंदी और यहां तक कि सैन्य हमलों का सहारा लेते हैं। चीन ने लगातार ब्रिक्स तथा एससीओ का व्यावहारिक सहयोग के माध्यम से मजबूत समर्थन प्रदान किया है। चीन ब्रिक्स और एससीओ मंचों के माध्यम से वैश्विक शासन को अधिक न्यायसंगत, उचित, कुशल और व्यवस्थित दिशा में बढ़ावा देना जारी रखेगा, और दूसरे सदस्यों के साथ-साथ एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए मिलकर काम करेगा।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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