दिसंबर 2025 में पेरिस एग्रीमेंट को ठीक 10 साल पूरे हो गए। 12 दिसंबर 2015 को पेरिस के COP21 समिट में 195 देशों ने मिलकर ये समझौता साइन किया था। ये क्लाइमेट चेंज से लड़ने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी एकजुटता थी। सबने वादा किया कि ग्लोबल वॉर्मिंग को इंडस्ट्रियल दौर से पहले के मुकाबले 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखेंगे और पूरी कोशिश करेंगे कि 1।5 डिग्री तक ही सीमित रहे। ये अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की शानदार मिसाल थी। पहली बार दुनिया ने एक साथ कदम उठाने का फैसला किया। आज 10 साल बाद हम देखते हैं कि क्या हुआ और क्या बाकी है?
पेरिस एग्रीमेंट ने क्या किया?
इस एग्रीमेंट ने ग्लोबल क्लाइमेट एक्शन को जबरदस्त बूस्ट अप दिया। पहले देश अलग-अलग चलते थे अब हर देश अपने NDCs (Nationally Determined Contributions) सबमिट करता है यानी बताता है कि वो उत्सर्जन कैसे कम करेगा। हर 5 साल में ये प्लान अपडेट होते हैं। 2025 में तीसरा राउंड आया और कई देशों ने पहले से बेहतर टारगेट रखे।रिन्यूएबल एनर्जी में बूम आया। सोलर और विंड पावर अब दुनिया की सबसे सस्ती बिजली बन गई है। इलेक्ट्रिक गाड़ियां, ग्रीन टेक्नोलॉजी में पैसा बह रहा है। कार्बन मार्केट शुरू हुए, एडाप्टेशन प्लान बने। लॉस एंड डैमेज फंड बना जिससे गरीब देशों को क्लाइमेट डिजास्टर की भरपाई में मदद मिलेगी। क्लाइमेट फाइनेंस पर बातें आगे बढ़ीं। कुल मिलाकर पेरिस एग्रीमेंट ने क्लाइमेट को दुनिया के एजेंडे पर चिपका कर रखा। बिना इसके शायद इतना एक्शन ही न होता।
लेकिन इंप्लीमेंटेशन में कहां फंस गए?
अब असली बात इंप्लीमेंटेशन में हम बहुत पीछे हैं। 10 साल में प्रोग्रेस हुई, लेकिन जितनी स्पीड चाहिए थी उतनी नहीं आई। ग्लोबल वॉर्मिंग और एक्सट्रीम मौसम की मुसीबतें अभी भी भयानक हैं। 2024 रिकॉर्ड तोड़ सबसे गर्म साल था।2025 भी टॉप थ्री में है। कुछ महीनों में टेम्परेचर पहले से 1।5 डिग्री ऊपर जा चुका। कार्बन उत्सर्जन अभी भी बढ़ रहा है। मौजूदा NDCs से भी वॉर्मिंग 2।4 से 2।6 डिग्री तक जा सकती है जो बहुत खतरनाक है।हीटवेव, बाढ़, तूफान, जंगल की आग जैसे एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स बढ़ गए। 2025 में अमेरिका में 14 अरब डॉलर से ज्यादा के नुकसान वाले डिजास्टर हुए। हरीकेन मेलिसा ने कैरिबियन को तबाह किया। स्पेन-पुर्तगाल में जंगल की आग रिकॉर्ड ब्रेकिंग थी। भारत, चीन, यूरोप सब जगह बाढ़ और सूखा। गरीब देश सबसे ज्यादा मारे जा रहे हैं लेकिन उन्हें फाइनेंस और सपोर्ट कम मिल रहा है।
ग्लोबल क्लाइमेट गवर्नेंस का बदलता नक्शा
अब दुनिया का क्लाइमेट गवर्नेंस लैंडस्केप पूरी तरह बदल रहा है। अमेरिका की क्लाइमेट पॉलिसी में बड़ा रिग्रेशन आया है। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने 2025 में पेरिस एग्रीमेंट से दूसरी बार बाहर निकल लिया। क्लाइमेट रूल्स रोल बैक कर दिए।कोयला-तेल को बूस्ट दिया।रिन्यूएबल्स की सब्सिडी काटी। अमेरिका अकेला देश है जो बाहर निकला। COP30 में भी उसने नेगेटिव रोल प्ले किया। इससे ग्लोबल कोऑपरेशन को झटका लगा। दूसरी तरफ चीन और यूरोप ग्लोबल क्लाइमेट एक्शन के लीडर बनकर उभरे हैं। चीन रिन्यूएबल्स में दुनिया का बॉस है। सोलर पैनल, विंड टर्बाइन, EV बैटरी का 70-80% प्रोडक्शन उसके पास है। 2025 में भी चीन की क्लीन एनर्जी ग्रोथ तेज रही। यूरोप ग्रीन डील पर पूरा फोकस्ड रहा।दोनों ने जॉइंट स्टेटमेंट्स निकाले।एनर्जी ट्रांजिशन, मीथेन कंट्रोल, कार्बन मार्केट पर कोऑपरेशन बढ़ाया। EU-चाइना हाई लेवल मीटिंग्स हुईं। इनकी लीडरशिप से ग्लोबल ग्रीन ट्रांजिशन को मजबूती मिल रही है।
आगे की राह: क्या उम्मीद बाकी है?
10 साल में पेरिस एग्रीमेंट ने उम्मीद की किरण दिखाई। रिन्यूएबल्स सस्ती हुईं।टेक्नोलॉजी आगे बढ़ी। जागरूकता बढ़ी लेकिन गैप बहुत बड़ा है। 1।5 डिग्री टारगेट के लिए 2030 तक उत्सर्जन 55% कम करना पड़ेगा,लेकिन मौजूदा प्लान से मुश्किल लग रहा है। एडाप्टेशन, फाइनेंस, जस्ट ट्रांजिशन पर और तेज काम चाहिए। COP30 में थोड़ी प्रोग्रेस हुई,लेकिन फॉसिल फ्यूल फेज आउट पर अभी भी ब्लॉकेज है।आने वाले समय में चीन और यूरोप की लीडरशिप और मजबूत होगी।अमेरिका की गैरमौजूदगी में विलिंग देशों के गठबंधन आगे बढ़ेंगे। प्राइवेट सेक्टर, शहरों का एक्शन बढ़ेगा, लेकिन सब देशों को मिलकर महत्वाकांक्षा बढ़ानी पड़ेगी। NDCs को और सख्त करना होगा।फाइनेंस का फ्लो बढ़ाना होगा।
निष्कर्ष: अब जागने का वक्त
ये 10 साल एक तरफ उम्मीद हैं दूसरी तरफ चेतावनी। अगर अब नहीं चेते तो मुसीबतें और बढ़ेंगी। चीन और यूरोप जैसे लीडर्स से उम्मीद है कि दुनिया को सही रास्ते पर रखेंगे। हम सब को भी अपना हिस्सा डालना है बिजली बचाओ, जागरूकता फैलाओ। क्लाइमेट एक्शन कल के लिए नहीं, आज के लिए जरूरी है। पेरिस एग्रीमेंट की आत्मा को जिंदा रखना होगा।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— डी के)

