Tariff Dominance : अमेरिका की डोनाल्ड ट्रम्प सरकार ने 2 अप्रैल को “पारस्परिक टैरिफ” नाम की एक नई नीति शुरू की, जिसके तहत चीनी सामानों पर 34% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया गया। ये टैरिफ एक अजीब-से फॉर्मूले “व्यापार घाटा ÷ अमेरिका को कुल निर्यात ÷ 2 = पारस्परिक टैरिफ” के आधार पर तय किए गए हैं। लेकिन ये नंबर-गेम ज्यादा दिन नहीं टिक सका। विश्व व्यापार संगठन के असली आंकड़े सामने आए तो अमेरिका का दावा हवा हो गया। अमेरिका कहता था कि चीन उसकी चीजों पर 67% टैरिफ लगाता है, पर सच ये है कि चीन का औसत टैरिफ बस 16-17% है। यानी अमेरिका का झूठ पकड़ा गया। सिर्फ चीन ही नहीं, अमेरिका ने यूरोपीय संघ पर 20%, भारत पर 26%, वियतनाम पर 46% और कंबोडिया पर 49% जैसे भारी-भरकम टैरिफ भी ठोक दिए।
इस नीति के ऐलान के अगले ही दिन, यानी 3 अप्रैल को न्यूयॉर्क शेयर बाजार में हाहाकार मच गया। इसे “ब्लैक थर्सडे” का नाम दिया गया। डॉव जोन्स 3.98%, एसएंडपी 500 4.84% और नैस्डैक 5.97% तक लुढ़क गया। विश्लेषकों का कहना है कि ये “पारस्परिक टैरिफ” अमेरिका की इकॉनमी, इंडस्ट्री और आम लोगों के लिए मुसीबत बन सकता है। कंपनियों का इनोवेशन रुक सकता है, उनकी ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस कमजोर हो सकती है और सबसे पहले तो अमेरिकी कंज्यूमर्स को जेब ढीली करनी पड़ेगी।
ट्रम्प की इस नीति की आलोचना भी फौरन शुरू हो गई। यूरोपीय संघ ने बोरबॉन व्हिस्की और कृषि उत्पादों पर जवाबी टैरिफ लगा दिए। ब्राजील ने “आर्थिक समतुल्यता अधिनियम” पास करके कानूनी कदम उठाया। कनाडा ने न्यूयॉर्क में बिजली काटकर फायदा उठाना शुरू कर दिया। ऑस्ट्रेलिया जैसे अमेरिका के पुराने दोस्त ने भी इसे “पार्टनरशिप की नींव तोड़ने वाला” कदम बताया। उधर, चीन ने ऐलान कर दिया कि 10 अप्रैल से अमेरिकी सामानों पर 34% अतिरिक्त टैरिफ लगेगा और कई अमेरिकी कंपनियों पर एक्सपोर्ट कंट्रोल भी थोपेगा। दुनिया भर की ये तीखी प्रतिक्रिया बताती है कि अमेरिका का दबदबा अब लोगों को पसंद नहीं आ रहा।
इस सबके बीच अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने प्रभावित देशों को धमकी दी कि जवाबी कार्रवाई मत करो, वरना हालात और खराब होगी। अमेरिका का कहना है कि टैरिफ एक “डील करने का तरीका” है, लेकिन साथ ही वो दूसरों को चेतावनी भी दे रहा है। ये सोच सीधे-सीधे व्यापार को “जीरो-सम गेम” मानती है, जिसमें एक की जीत दूसरे की हार हो। पर ऐसा दबंगई वाला रवैया न तो अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग की खस्ता हालत को सुधारेगा, न ही ग्लोबल ट्रेड में भरोसा बनाए रखेगा। और वक्त बताएगा कि टैरिफ की आग लगाने वाले खुद उसमें जलकर राख हो जाएंगे।
(साभार-चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

