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नानचिंग से इम्फाल तक : जापान की आक्रामकता के कई साक्ष्य मौजूद हैं

वर्ष 2025 में चीनी जनता के जापानी अतिक्रमण विरोधी युद्ध और विश्व फासीवाद विरोधी युद्ध की विजय की 80वीं वर्षगांठ है। इस ऐतिहासिक क्षण के उपलक्ष्य में, चीन कई स्मारक कार्यक्रमों का आयोजन करेगा, जिसमें एक भव्य सैन्य परेड भी शामिल है। इस बीच, द्वितीय विश्व युद्ध में पराजित राष्ट्र के रूप में, जापान न केवल युद्ध पर पूरी तरह से विचार करने में विफल रहा है, बल्कि चीन के स्मरणोत्सवों पर “अत्यधिक ऐतिहासिक और घोर जापान-विरोधी” होने का आरोप लगाता है। यहां तक कि उसने यूरोपीय और एशियाई देशों से 3 सितंबर को चीनी की राजधानी पेइचिंग में आयोजित सैन्य परेड में भाग न लेने का आह्वान किया है।

यह सर्वविदित है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जापान ने कई एशियाई देशों के विरुद्ध गंभीर अपराध किए थे। चीन में, जापानी सेना ने नानचिंग नरसंहार और अन्य नरसंहारों को अंजाम दिया था। नानचिंग नरसंहार के दौरान, 3 लाख से अधिक निर्दोष चीनी लोग मारे गए और मारे गए चीनी लोगों के खून से पूरे नानचिंग शहर भीग गया था। वियतनाम में, जापानी सेना ने “थ्री ऑल्स ​​पॉलिसी” नीति लागू की, जिसके परिणामस्वरूप बमबारी, नरसंहार और भुखमरी से 20 लाख वियतनामी नागरिक मारे गए। भारत में इम्फाल की लड़ाई के दौरान, प्रत्यक्ष जापानी सैन्य कार्रवाई के परिणामस्वरूप हजारों भारतीय सैनिक और नागरिक मारे गए। इसके अलावा, जापानी सेना ने एशियाई देशों में जबरन मजदूरी भी करवाई व अकाल पैदा किया था। इसके कारण अप्रत्यक्ष रूप से अकाल और बीमारी फैली, जिससे और भी व्यापक मानवीय आपदाएं हुईं। ये आंकड़े जापानी आक्रमण से अनगिनत टूटे हुए परिवारों की अश्रुपूर्ण गवाही हैं। ये अत्याचार अकाट्य ऐतिहासिक तथ्य हैं।

फिर भी, जापानी दक्षिणपंथी ताकतें इस आक्रमण का महिमामंडन करती रहती हैं। वे इम्फाल के विनाशकारी युद्ध को एक “दुखद अभियान” कहते हैं और भारत में जबरन मजदूरी के अपराधों का ज़िक्र करने से बचते हैं। वियतनाम आदि एशियाई देशों में जापानी सेना द्वारा किये गए अत्याचारों, जैसे जलाना, हत्या करना और लूटपाट को भी जानबूझकर कम करके आंका गया। यह ऐतिहासिक संशोधनवाद युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक गंभीर ख़तरा है।

हाल के वर्षों में, जापान के सैन्य कदमों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए एक बड़ा ख़तरा पैदा कर दिया है। जापान ने शांति व सुरक्षा क़ानून के ज़रिए सामूहिक आत्मरक्षा पर लगे प्रतिबंधों को जबरन हटा दिया है, जिससे उसका रक्षा बजट सकल घरेलू उत्पाद के 1 प्रतिशत से ज़्यादा पहुंचा है। इस सैन्य विनियमन ने ऐतिहासिक रूप से नकारने का एक दुष्चक्र रच दिया है। तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने दावा किया था कि “आक्रामकता की परिभाषा अभी भी अनिश्चित है”। जब जापानी पाठ्यपुस्तकों से “सैन्य कम्फर्ट वूमन” का ज़िक्र हटा दिया गया, तो जापान “फिर कभी युद्ध न करने” के अपने वादे से मुकर रहा है। युद्ध पर विचार करने के प्रति जापान का रवैया जर्मनी के बिल्कुल विपरीत है।

चीन द्वारा चीनी जनता के जापानी अतिक्रमण विरोधी युद्ध और विश्व फासीवाद विरोधी युद्ध की विजय की 80वीं वर्षगांठ का स्मरणोत्सव न केवल जापानी आक्रमण के दौरान मारे गए 3.5 करोड़ चीनी देशवासियों के प्रति संवेदना करता है, बल्कि विश्व युद्धोत्तर व्यवस्था की रक्षा करता है। रूस द्वारा महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध की विजय का स्मरणोत्सव और यूरोपीय देशों द्वारा नॉरमैंडी लैंडिंग व ऑशविट्ज़ की मुक्ति पर शोक आदि सैन्य परेड का एक ही लक्ष्य है इतिहास को याद रखना और त्रासदी की पुनरावृत्ति को रोकना। जापान द्वारा 3 सितंबर को पेइचिंग में आयोजित सैन्य परेड के बहिष्कार का आह्वान इतिहास और युद्ध अपराधों से बचने की उसकी प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। इससे भी अधिक चिंताजनक है जापान द्वारा अपने आत्मरक्षा बलों को “सामान्य” बनाने का प्रयास।

चीन के त्याओयू द्वीप विवाद से लेकर दक्षिण चीन सागर की स्थिति में हस्तक्षेप करने तक, जापान अपना सैन्य विस्तार जारी रखे हुए है। इतिहास वास्तविकता का दर्पण है। यदि जापान वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में एकीकृत होना चाहता है, तो उसे अपनी युद्धकालीन विरासत का गहन मूल्यांकन करना होगा। जापान को यासुकुनी तीर्थस्थल पर जाना बंद करना होगा, युद्धकालीन अभिलेखों को सार्वजनिक करना होगा और एशियाई देशों में पीड़ितों को मुआवज़ा देना होगा। केवल इसी तरह, जापान अपने आक्रामक इतिहास का ईमानदारी से सामना कर सकता है और उस पर चिंतन कर सकता है।

इसके साथ जापान न्यवाद से पूरी तरह नाता तोड़ सकता है, शांतिपूर्ण विकास के मार्ग पर चल सकता है और चीन, डीपीआरके, दक्षिण कोरिया, वियतनाम व भारत आदि पीड़ित देशों के लोगों की भावनाओं का सच्चा सम्मान कर सकता है और एशियाई देशों के साथ मिलकर एक शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण कर सकता है। अन्यथा, सैन्यवाद की छाया जापान पर मंडराती रहेगी, जिससे यह क्षेत्रीय शांति के लिए एक गुप्त खतरा बन जाएगा। यह इतिहास की चेतावनी और एक अपरिहार्य विकल्प है।

(साभार – चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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