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अमेरिकी अर्थव्यवस्था में गिरावट: उपभोक्ताओं का विश्वास कम, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर टैरिफ का दबाव

जून 2025 में अमेरिका में घरेलू आर्थिक विकास को लेकर उपभोक्ताओं की उम्मीदों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। कई प्रमुख आर्थिक संकेतक—जैसे उपभोक्ता विश्वास सूचकांक, खर्च करने की प्रवृत्ति, और बाजार की अस्थिरता—में गिरावट देखी गई है, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि अमेरिकी उपभोक्ता अब देश की आर्थिक दिशा को लेकर पहले से अधिक आशंकित हैं।

हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी उपभोक्ताओं की आर्थिक वृद्धि को लेकर आशंकाएं बढ़ी हैं। मुद्रास्फीति, ब्याज दरों में वृद्धि और रोजगार के बाजार में अनिश्चितता के कारण लोगों का विश्वास कम हुआ है। इसके अलावा, खुदरा बिक्री, औद्योगिक उत्पादन और आवास बाजार जैसे प्रमुख संकेतक भी कमजोर प्रदर्शन कर रहे हैं। University of Michigan द्वारा जारी उपभोक्ता भावना सर्वेक्षण के अनुसार, जून में उपभोक्ता विश्वास में लगातार दूसरे महीने गिरावट दर्ज की गई। लोग न केवल बढ़ती महंगाई से चिंतित हैं, बल्कि रोजगार की स्थिरता, ब्याज दरों और आवास लागत को लेकर भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इससे उपभोग पर असर पड़ा है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।

अमेरिकी मुद्रास्फीति पर नवीनतम रिपोर्ट अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत है कि टैरिफ से आम तौर पर आयातित उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ने लगी है, जबकि कार की कीमतों में गिरावट से समग्र मुद्रास्फीति नियंत्रण में रही है। इस महीने के अंत में होने वाली फेडरल रिजर्व के अधिकारियों की बैठक से पहले यह मुद्रास्फीति का आखिरी ब्यौरा है। नीति निर्माता अभी भी इस बात पर बंटे हुए हैं कि टैरिफ से कीमतों पर एकमुश्त असर पड़ेगा या मुद्रास्फीति का जोखिम स्थायी रहेगा।

 

आखिर है क्या टैरिफ…?

टैरिफ का कार्यान्वयन सरकारों के लिए उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक नीतिगत साधनों में से एक है, जिसके व्यवसायों, उपभोक्ताओं और व्यापक अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं। हालाँकि अक्सर घरेलू उद्योगों की रक्षा या व्यापार असंतुलन को दूर करने के इरादे से टैरिफ लागू किया जाता है, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर टैरिफ का प्रभाव पूरे आर्थिक तंत्र में जटिल प्रभाव पैदा करता है जिसका सावधानीपूर्वक विश्लेषण आवश्यक है।टैरिफ मूलतः आयातित वस्तुओं पर लगाए जाने वाले कर होते हैं, जिनका उद्देश्य विदेशी उत्पादों को घरेलू उत्पादों की तुलना में अधिक महंगा बनाना होता है। हालाँकि, ऐतिहासिक साक्ष्य लगातार दर्शाते हैं कि ये व्यापार प्रतिबंध शायद ही कभी अपने वादे के अनुसार दीर्घकालिक आर्थिक लाभ प्रदान करते हैं। जब टैरिफ लागू होते हैं, तो आमतौर पर कई तात्कालिक आर्थिक प्रभाव पड़ते हैं जैसे:

आयातित वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि, क्योंकि कर या तो आयातकों द्वारा वहन किया जाता है या उपभोक्ताओं पर डाला जाता है। बाज़ार में विकृतियाँ, क्योंकि क्रय निर्णय कृत्रिम मूल्य अंतरों से प्रभावित होते हैं। आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, क्योंकि व्यवसाय वैकल्पिक स्रोत खोजने के लिए संघर्ष करते हैं।

 

संरक्षित उद्योगों के लिए अस्थायी लाभ, लेकिन व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ती है। अमेरिकी टैरिफ परिदृश्य तेजी से विकसित हो रहा है, हाल के महीनों में महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं, जो कई उद्योगों और व्यापारिक साझेदारों को प्रभावित कर रहे हैं। भले ही ट्रंप के टैरिफ़ के सीमित प्रभाव ने कुछ विश्लेषकों को आश्चर्यचकित कर दिया हो, अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्थाएँ शायद तूफ़ान से पहले की शांति का अनुभव कर रही हैं।

जब अप्रैल में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दर्जनों देशों पर भारी “पारस्परिक” टैरिफ लगाने की घोषणा की, तो अर्थशास्त्रियों ने विनाशकारी आर्थिक नुकसान की चेतावनी जारी की। यहां तक कि जो देश समय पर समझौता करने में सक्षम हैं, उन्हें भी काफी अधिक शुल्क का सामना करना पड़ सकता है।

 

अमेरिकी टैरिफ नीति और वैश्विक प्रभाव

इसी दौरान, अमेरिका द्वारा चीन और कुछ अन्य देशों पर लगाए गए नए टैरिफ ने वैश्विक व्यापार पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। ये टैरिफ मुख्य रूप से तकनीक, हरित ऊर्जा उत्पादों, स्टील और सेमीकंडक्टर क्षेत्रों पर केंद्रित हैं। इस नीति का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना है, लेकिन इसके दुष्परिणाम विश्व स्तर पर सामने आने लगे हैं।

  1. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधा – अमेरिका के टैरिफ से उत्पादों की लागत बढ़ रही है, जिससे कई देशों की आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ रहा है। उत्पादन लागत में वृद्धि के कारण उपभोक्ताओं को महंगे उत्पाद मिल रहे हैं।
  2. विकासशील देशों पर असर – दक्षिण एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं, जो अमेरिकी मांग पर निर्भर हैं, अब टैरिफ के कारण निर्यात में गिरावट का सामना कर रही हैं।
  3. विश्व व्यापार संगठन (WTO) में चिंता – अमेरिका की एकतरफा टैरिफ नीति को लेकर कई देशों ने चिंता जताई है और WTO में इसकी समीक्षा की मांग की है, जिससे वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है।

 

जून 2025 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर उपभोक्ताओं की नकारात्मक भावना और अमेरिकी टैरिफ नीतियों की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार पड़ी है। एक ओर घरेलू स्तर पर मांग में गिरावट है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सहयोग भी प्रभावित हो रहा है। आने वाले महीनों में इन नीतियों का दीर्घकालिक असर और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएगा। इस स्थिति में वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए बहुपक्षीय संवाद और सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत और टैरिफ की नीतियाँ दोनों ही वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती हैं। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने अमेरिका और अन्य देशों से व्यापार युद्ध से बचने और सहयोग बढ़ाने का आग्रह किया है। आने वाले समय में इन आर्थिक हालातों पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक—देवेंद्र सिंह)

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