पिछले हफ्ते भारत ने लगभग पांच साल बाद चीनी नागरिकों को पर्यटक वीजा देने की घोषणा की। पेइचिंग स्थित भारतीय दूतावास ने चीनी सोशल मीडिया प्लेटफार्म वेइबो पर इस संबंध में जानकारी साझा की। भारतीय विशेषज्ञों के मुताबिक चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा की बहाली के साथ, भारतीय पर्यटन उद्योग पर्यटकों की बढ़ती संख्या का स्वागत करने के लिए उत्सुक है। जिससे भारत की आर्थिक वृद्धि में योगदान मिलने और दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत होने की उम्मीद है।
हालांकि संसद के मानसून सत्र के दौरान, कुछ भारतीय नेताओं ने इस विषय पर हंगामा करते हुए मांग की है कि भारत सरकार अगले दस वर्षों में चीनी उत्पादों को भारतीय बाजार में प्रवेश करने से पूरी तरह से रोकने के लिए एक योजना तैयार करे। इस तरह का तर्क और दावा हैरान करने वाला है।
हां, यह बात सही है कि भारत का विशाल घरेलू बाजार, सस्ते श्रम की आपूर्ति और स्थिर आर्थिक विकास से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आकर्षित होना स्वाभाविक है। लेकिन, हाल के वर्षों में भारत द्वारा लागू कुछ प्रतिबंधात्मक नीतियों ने, विशेष रूप से चीनी कंपनियों के लिए, एक बड़ी बाधा खड़ी कर दी है।
इसका परिणाम यह हुआ है कि चीनी कंपनियां भारत में निवेश को लेकर पुनर्विचार कर रही हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण चीन की प्रमुख इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी BYD की योजना है, जिसने 2023 में भारत में एक संयुक्त उद्यम के लिए 1 अरब डॉलर के निवेश का प्रस्ताव रखा था, लेकिन अब उसे स्थगित कर दिया है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के आंकड़े बताते हैं कि इन प्रतिबंधात्मक नीतियों के चलते, जो कुछ मामलों में अन्य देशों की विदेशी संस्थाओं पर भी लागू होती हैं। गौरतलब है कि भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) – जिसमें पुनर्निवेशित आय और इक्विटी प्रवाह शामिल हैं – वित्तीय वर्ष 2023-24 में घटकर 71 अरब डॉलर रह गया, जो 2018-19 के बाद से सबसे निचला स्तर है। इसने पिछले वर्ष भारत सरकार को रणनीतिक विदेशी निवेशकों को स्थानीय कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदने के लिए अधिक लचीलापन देने वाले विस्तारित उपायों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया था।
हालांकि, संबंधित कदम धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, भारत का विदेशी मुद्रा कानून कॉर्पोरेट वित्तपोषण में मेज़ानाइन इंस्ट्रूमेंट्स को मान्यता नहीं देता, जो वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से विलय और अधिग्रहण से जुड़े बड़े लेनदेन में, आम हैं। इसके अलावा, भारतीय प्राधिकरणों ने कुछ उद्योगों में विदेशी निवेश के लिए सख्त सीमा शेयर निर्धारित किए हैं, और भारत में निवेश के लिए लाइसेंस के आवेदन की प्रक्रिया अभी भी जटिल है।
इससे पता चलता है कि भारत को एक प्रमुख एफडीआई गंतव्य के रूप में देश की क्षमता को प्रभावी ढंग से उजागर करने के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में भारत में शुद्ध विदेशी प्रत्यक्ष निवेश गिरकर मात्र 35.3 करोड़ डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। जो मार्च 2021 को समाप्त वर्ष में दर्ज 43.9 अरब डॉलर से बहुत कम है। यह एक प्रमुख वजह हो सकती है जो देश के नीति निर्माताओं को भारत सरकार पर विदेशी निवेशकों, विशेष रूप से चीन से आने वालों पर संस्थागत प्रतिबंधों को खोलने के प्रयासों को तेज करने का आग्रह करने के लिए प्रेरित कर रहा है। गौरतलब है कि चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और उसका भारत में एफडीआई लंबे समय से अनुचित रूप से प्रतिबंधित रहा है।
इस बीच नीति आयोग ने उन नियमों में ढील देने का प्रस्ताव रखा है जो वास्तव में चीनी कंपनियों के निवेश के लिए अतिरिक्त जांच की आवश्यकता बनाते हैं। आयोग का सुझाव है कि चीनी कंपनियां बिना किसी अनुमति के भारतीय कंपनी में 24 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी ले सकें। वर्तमान में गृह और विदेश मंत्रालय दोनों से अनुमति की आवश्यकता होती है।
थिंक टैंक ने केंद्र सरकार को इस तथ्य पर गौर करने का आग्रह किया है कि चीनी निवेशकों के लिए अनुकूलित इस तरह के प्रतिबंधात्मक नियमों ने कुछ बड़े सौदों में देरी की है, जिससे भारत के हितों को नुकसान पहुंचा है। पिछले वर्ष सीमा विवाद को उचित ढंग से संभालने के समझौते के बाद से चीन और भारत के बीच संबंध एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़े हैं। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में पांच साल में अपनी पहली चीन यात्रा की, जिसके दौरान उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि दोनों देशों को एक-दूसरे के खिलाफ प्रतिबंधात्मक व्यापार उपाय लागू करने से बचना चाहिए।
भारत सरकार के पास चीनी निवेश पर अपने प्रतिबंधों में ढील न देने का कोई कारण नहीं है। चीन आशा करता है कि भारत चीन-भारत आर्थिक और व्यापारिक सहयोग की पारस्परिक रूप से लाभप्रद प्रकृति को पूरी तरह से समझेगा और चीनी कंपनियों के भारत में निवेश और संचालन के लिए एक निष्पक्ष, न्यायसंगत, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण व्यापारिक वातावरण प्रदान करेगा।
बता दें कि इस वर्ष चीन और भारत के बीच राजनयिक संबंध स्थापना की 75वीं वर्षगांठ है। चीन भारत के साथ मिलकर भविष्य की नई संभावनाओं को खोलने और चीन-भारत संबंधों के स्वस्थ एवं स्थिर विकास को बढ़ावा देने के लिए तैयार है। भारत और चीन अगर मिलकर काम करें, तो सिर्फ एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया में शांति और समृद्धि की राह आसान हो सकती है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) (लेखक- रमेश शर्मा)

