Last Updated: September 27, 2026

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चीन–भारत व्यापार क्यों पहुंचा रिकॉर्ड ऊंचाई पर

January 19, 2026

चीन–भारत व्यापार क्यों पहुंचा रिकॉर्ड ऊंचाई पर

चीनी केंद्रीय कस्टम्स प्राधिकरण द्वारा 18 जनवरी को जारी ताज़ा आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में चीन-भारत व्यापार की कुल राशि नई ऐतिहासिक ऊँचाई पर पहुँचकर 1 खरब 55 अरब 61 करोड़ 12 लाख 15 हज़ार अमेरिकी डॉलर हो गई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 12.4 प्रतिशत अधिक है। चीन का भारत को निर्यात 1 खरब 35 अरब 87 करोड़ 20 लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक रहा, जबकि भारत से आयात 19 अरब 74 करोड़ 91 लाख अमेरिकी डॉलर से ऊपर पहुँचा। ये आँकड़े क्रमशः पिछले वर्ष की तुलना में 12.8 प्रतिशत और 9.7 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि चीन-भारत व्यापार में आई यह तेज़ी मुख्यतः द्विपक्षीय संबंधों में आई सकारात्मक प्रगति और दोनों अर्थव्यवस्थाओं की विशाल परस्पर आर्थिक अनुपूरकता के कारण संभव हुई है।

वर्ष 2025 में चीन-भारत संबंधों में स्पष्ट सुधार देखा गया, जिसने द्विपक्षीय व्यापार के स्वस्थ विकास में विश्वास और स्थिरता प्रदान की। पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों पर उच्चस्तरीय संपर्क और संवाद अधिक घनिष्ठ हुआ, जिससे ठोस प्रगति दर्ज की गई। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने एक–दूसरे के देशों की यात्राएँ कीं। अगस्त महीने में सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधियों की 24वीं बैठक नई दिल्ली में आयोजित हुई, जिसके दौरान दस सूत्रीय समानताएँ तय की गईं। दोनों पक्षों ने मैत्रीपूर्ण परामर्श द्वारा संबंधित मुद्दों के समाधान पर बल दिया तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाने पर सहमति व्यक्त की। साथ ही, वर्ष 2005 में संपन्न राजनीतिक निर्देशात्मक सिद्धांत संधि के अनुरूप, दोनों देशों ने परस्पर स्वीकार्य सीमा समाधान की दिशा में प्रयास जारी रखने पर दोहराया। दोनों ने पाँच वर्षों से स्थगित सीमा व्यापार को पुनः खोलने पर सहमति जताई। 31 अगस्त को एससीओ थ्येनचिन शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति शी चिनफिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भेंट हुई, जिसमें दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों की प्रगति के लिए दिशानिर्देश तय किए।

पिछले वर्ष दोनो देशों के लोगों की आवाजाही के मार्ग भी अधिक सुगम हुए। चीन ने भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए कैलाश और मानसरोवर यात्रा पुनः आरंभ की, वहीं भारत ने चीनी पर्यटकों के लिए पर्यटन वीज़ा जारी करना बहाल किया। चीन की मुख्य भूमि और भारत के बीच सीधी विमान सेवाएँ भी फिर से शुरू की गईं। इन सभी कदमों ने दोनों देशों के आर्थिक एवं व्यापारिक समुदायों को अनुकूल वातावरण और स्थिर अपेक्षाएँ प्रदान कीं।

दोनों देशों की विशाल आर्थिक अनुपूरकता ने द्विपक्षीय व्यापार के विकास के लिए स्थायी आधार और अपार संभावनाएँ उत्पन्न की हैं। इसकी जड़ इस तथ्य में निहित है कि चीन और भारत वर्तमान में विकास के भिन्न-भिन्न चरणों से गुजर रहे हैं तथा वैश्विक उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में उनकी भिन्न भूमिकाएँ हैं। इसी भिन्नता के कारण वे एक-दूसरे के विकास में पूरक की भूमिका निभा सकते हैं। चीन अपने मज़बूत बुनियादी ढाँचे के कारण विश्व में अग्रणी है। यहाँ विश्व का सबसे बड़ा यातायात नेटवर्क, सबसे विशाल और व्यस्त लॉजिस्टिक्स प्रणाली, सबसे बड़ा साइबर अवसंरचना और सबसे विस्तृत ऊर्जा ढाँचा मौजूद है। चीन आज विश्व का सबसे बड़ा विनिर्माण देश है, जिसका विश्व औद्योगिक उत्पादन में लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। 200 से अधिक प्रमुख औद्योगिक उत्पादों के उत्पादन में वह विश्व में प्रथम स्थान पर है। वर्तमान में चीन विनिर्माण केंद्र से नव-सृजन केंद्र बनने की दिशा में तेज़ी से अग्रसर है। उसका उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादों का निर्यात अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है।

भारत इस समय बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचे का निर्माण कर रहा है और उसका औद्योगीकरण प्रारंभिक चरण में है। भारत के विनिर्माण क्षेत्र का जीडीपी में योगदान लगभग 14.3 प्रतिशत है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक माल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2 प्रतिशत के आसपास है। चीन से भारत को किए जाने वाले निर्यात में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, यांत्रिक एवं मशीनरी उपकरण और रासायनिक उत्पाद शीर्ष पर हैं- ये उच्च-प्रौद्योगिकी और उच्च-मूल्यवर्धित वस्तुएँ हैं। इसके विपरीत, भारत से चीन को होने वाले निर्यात में लौह अयस्क और अन्य धातु पदार्थ, कृषि उत्पाद, कच्चे रासायनिक पदार्थ तथा कपास सहित वस्त्र उत्पाद प्रमुख हैं, जो मुख्यतः कच्चे और प्राथमिक उत्पाद हैं।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा केवल इसलिए नहीं है कि चीन कोई व्यापारिक रणनीति अपनाता है, बल्कि इसका मूल कारण दोनों देशों के आर्थिक ढाँचों और विकास स्तरों में भिन्नता है। भारतीय बाज़ार में किफ़ायती और उपयोगी चीनी उत्पादों की बड़ी माँग है। वास्तव में, भारत द्वारा चीन से आयातित अधिकांश वस्तुएँ ऐसे ‘इंटरमीडिएट प्रोडक्ट्स’ और ‘कैपिटल गुड्स’ हैं, जो भारत की औद्योगिक और निर्माण प्रक्रिया के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने भी कहा है कि अधिकांश आयात कच्चे माल, अर्ध-तैयार उत्पादों और पूंजीगत वस्तुओं के रूप में होते हैं, जो भारत में तैयार माल बनाने और पुनः निर्यात करने में उपयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, भारत अब विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादक देश है, किंतु मोबाइल उपकरणों के अधिकांश पुर्ज़े चीन से आते हैं। इसी प्रकार, भारतीय दवा उद्योग, जो “मेक इन इंडिया” अभियान का एक प्रमुख स्तंभ है, अपने सक्रिय औषध अवयवों (Active Pharmaceutical Ingredients – API) के लगभग 68 से 85 प्रतिशत भाग के लिए चीन पर निर्भर है। केवल एरिथ्रोमाइसिन जैसे एंटीबायोटिक्स में ही चीन से 90 प्रतिशत तक API की आपूर्ति होती है। उल्लेखनीय बात है कि भारतीय निर्यात पर चीन का रूख हमेशा बहुत स्पष्ट है यानी चीन अधिक श्रेष्ठ भारतीय वस्तुओं के प्रवेश का स्वागत करता है।

इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तनाव बढ़ गया। अमेरिकी सरकार ने भारत पर उच्च टैरिफ लगाए और विभिन्न मुद्दों पर दबाव बनाने का प्रयास किया। इसके परिणामस्वरूप अनेक भारतीय व्यवसायियों ने चीन का रुख किया। उदाहरण स्वरूप, भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी ने पिछले वर्ष कम से कम दो बार चीन की यात्रा की और अपने चीनी समकक्षों के साथ बैटरी तथा हरित ऊर्जा उत्पादों पर सहयोग संबंधी वार्ता की।

वर्ष 2026 चीन की 15वीं पंचवर्षीय योजना का पहला वर्ष है। चीन इस अवधि में गुणवत्ता-आधारित विकास के माध्यम से आधुनिकीकरण को बढ़ावा देगा और उच्च-स्तरीय खुलेपन की नीति को आगे बढ़ाते हुए भारत सहित विभिन्न देशों को अधिक सहयोग के अवसर प्रदान करेगा। इस नई दिशा के अनुरूप यह पूरी संभावना है कि वर्ष 2026 में भी चीन-भारत व्यापार वृद्धि की अपनी गति बनाए रखेगा।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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