दुनिया में जारी तमाम युद्धों के बावजूद सॉफ्ट पावर के जरिए दुनिया को जीतने और उस पर अपना दबदबा कायम करने का दौर बढ़ा है। संस्कृति, सिनेमा और खेलों में उत्कृष्टता सॉफ्ट पावर की सबसे बड़ी प्रतिनिधि हैं। यही वजह है कि दुनिया के तमाम ताकतवर देश अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को दुनिया के सामने लाकर, बेहतर सिनेमा बनाकर और खेलों में पदक जीतकर अपनी इस ताकत का लोहा मनवा रहे हैं। कहना न होगा कि इसी वजह से चीन के लिए ओलंपिक में दबदबा कायम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता जा रहा है, जितना उसके लिए आर्थिक महाशक्ति के रूप में लगातार आगे बढ़ना है। मौजूदा आर्थिक व्यवस्था के लिहाज से चीन दुनिया की दूसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति है। लेकिन बीते पेरिस ओलंपिक की पदक तालिका में दूसरे नंबर पर रह कर वह खेलों की दुनिया की दूसरी बड़ी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है।
चीन के एथलीटों के बढ़ते दबदबे के चलते ओलंपिक पदक तालिका में लगातार पहले नंबर पर रहने वाले अमेरिका की चिंताएं बढ़ रही हैं। सॉफ्ट पावर के महत्वपूर्ण प्रतीक होने की वजह से ओलंपिक ऐसा मंच बन गया है, जहां राष्ट्रीय गौरव, वैश्विक पहचान और महत्वाकांक्षाओं की कड़ी प्रतिद्वंदिवता देखने को मिल रही है। चीन ने जिस तरह का दबदबा कायम किया है, उससे दुनिया को एक संदेश गया है कि वह सॉफ्ट पावर के रूप में दुनिया की बड़ी ताकत बन चुका है। यहां बताने की जरूरत नहीं है कि दशकों से, संयुक्त राज्य अमेरिका ओलंपिक पदक सूची में हावी रहा है। कह सकते हैं कि उसका यह हावी रूप उसकी आर्थिक ताकत, तकनीकी कौशल और सॉफ्ट पावर के वैश्विक प्रभाव का प्रतिबिंब रहा है। अमेरिकी एथलीटों का लगातार स्वर्ण पदक जीतना न केवल उनकी व्यक्तिगत उत्कृष्टता का प्रमाण है, बल्कि वैश्विक मंच पर अमेरिकी राष्ट्र की व्यापक आकांक्षाओं का भी प्रतीक है। कुछ उसी अंदाज में हाल के वर्षों में चीन भी उभरा और अमेरिका को चुनौती दे रहा है। पेरिस ओलंपिक में चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका सर्वाधिक स्वर्ण पदकों के मामले में बराबरी पर रहे, तथा दोनों देशों ने 40-40 स्वर्ण पदक जीते।
चीन की यह ताकत कैसे बढ़ी है। दरअसल देश के कठोर खेल कार्यक्रम और शीर्ष स्तर के एथलीट तैयार करने के लिए राज्य प्रायोजित प्रयास ओलंपिक मंच पर हावी होने की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा से प्रेरित हैं। जिमनास्टिक से लेकर भारोत्तोलन, गोताखोरी से लेकर टेबल टेनिस तक, चीन के एथलीट एक कठोर प्रणाली का उत्पाद हैं, जो खिलाड़ियों की मेहनत, राज्य के सहयोगी रूख के साथ ही कई बार संयोग पर भी कभी-कभी निर्भर करता है। चीन ने आर्थिक सुधारों के साथ ही लगातार खेलों में निवेश करना शुरू किया। ओलंपिक के अमेरिकी दबदबे में चीन का सेंध लगाना कोई सामान्य घटना या संयोग नहीं कहा जा सकता। बल्कि चीन का वह प्रयास है, जिसे उसने खेलों को अपनी राष्ट्रीय शक्ति प्रदर्शित करने के जरिए के रूप में लिया। लिहाजा उसने पिछली सदी के अस्सी के दशक में ही खेलों पर निवेश शुरू किया। चीन की सरकार ने ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन करने को अपना लक्ष्य बना लिया। इसके लिए उसने सारे जतन शुरू किए, खिलाड़ियों के चयन, उन्हें मांजने, उनके प्रशिक्षण, उनके स्वास्थ्य पर बेहतरीन निवेश किया। जिसका नतीजा सामने है। अब चीन ओलंपिक में दूसरे नंबर पर है। चीन ने खेलों के जरिए अपने वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने का जो लक्ष्य निर्धारित किया, दरअसल वह चीन को वैश्विक राजनीति में अगुआ के रूप में स्थापित करने या फिर उसे ताकतवर बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है। इसका असर चीन के वैश्विक प्रभाव के रूप में दिखने लगा है। ऐसे में चीन के लोगों का गर्वबोध भी बढ़ना स्वाभाविक है।
2008 में पेइचिंग में आयोजित ओलंपिक के जरिए चीन ने अपनी ताकत को और स्थापित किया। चीन ने इस आयोजन को चीनी आधुनिकता, आर्थिक ताकत और अपनी सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने के मंच के रूप में लिया। बहरहाल चीन में हर जीत को, हर एक स्वर्ण पदक को न केवल खिलाड़ी की उपलब्धि के रूप में स्वीकार किया जाता है, बल्कि उसके जरिए चीन की राष्ट्रीय शक्ति को भी प्रदर्शित किया जाता है। शायद यही वजह है कि चीन के खिलाड़ियों का वैश्विक दबदबा लगातार बढ़ रहा है।
(लेखक—उमेश चतुर्वेदी)

