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क्या अमेरिकी टैरिफ धौंस के सामने सिर झुकाएगा भारत?

July 7, 2025

क्या अमेरिकी टैरिफ धौंस के सामने सिर झुकाएगा भारत?

9 जुलाई से पहले एक अंतरिम ट्रेड डील करने के लिए भारतीय वरिष्ठ व्यापार टीम ने फिलहाल वाशिंटन में अमेरिकी समकक्ष के साथ सात दिन की सघन वार्ता की, लेकिन अंत में डील पर सहमति नहीं बनायी जा सकी। भारतीय टीम पिछले हफ्ते स्वदेश लौटी। स्थानीय विश्लेषकों के विचार में भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता अब गतिरोध में पड़ी है, दोनों पक्षों के व्यापार संघर्ष के तीव्र होने की संभावना है।

ध्यान रहे 2 अप्रैल को अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 26 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का फैसला सुनाया। बाद में उसे 90 दिन तक निलंबित किया गया। भारत अमेरिका के साथ एक अंतरिम डील कर ऊंचे टैरिफ से बचना चाहता है। पहले दोनों देशों के नेता इस डील पर आशावादी थे। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि भारत के साथ एक बड़ा और अच्छा समझौता होने वाला है। लेकिन जब वार्ता व्यावहारिक दौर में दाखिल हुई, तो बड़ा मतभेद नजर आया।

कृषि और डेयरी उत्पाद भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में एक कुंजीभूत मतभेद है। भारत विश्व में सब से महत्वपूर्ण कृषि और डेयरी बाजार है। भारतीय सरकार उन दोनों सेक्टरों के प्रति सख्त संरक्षणवादी नीति अपनाती है। अमेरिका वार्ता में भारत से कृषि और डेयरी बाजार खोलने की जबरदस्त मांग कर रहा है ताकि अमेरिकी उत्पाद भारत के विशाल बाजार में अपनी जगह बना सकें। भारत इसे अस्वीकार करता है। भारत के विचार में ये दोनों सेक्टर भारत के लिए अत्यंत अहम और संवेदनशील है, जो रेड लाइन हैं। भारत के कृषि और डेयरी सेक्टर में अमेरिका को छूट देने की बहुत कम गुंजाइश है।        

भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश में 60 करोड़ लोगों का जीवनयापन कृषि पर निर्भर है। कृषि 40 प्रतिशत से अधिक रोजगार प्रदान करती है और 8 करोड़ लोग डेयरी सेक्टर से जुड़े हुए हैं। भारतीय कृषि में मध्यम व छोटे किसान मुख्य स्थान पर है। उनके उत्पादन का पैमाना छोटा है, तकनीकी स्तर ऊँचा नहीं है और लागत ज्यादा है। उधर अमेरिकी किसानों के उत्पादन का विशाल पैमाना है, उच्च स्तरीय प्रौद्योगिकी है और लागत काफी कम है। भारतीय किसानों में अमेरिकी किसानों से प्रतिस्पर्द्धा करने की क्षमता नहीं है। अगर भारत अमेरिका के लिए अपना कृषि और डेयरी बाजार खोलेगा, तो गंभीर घरेलू राजनीतिक सवाल छिड़ेगा। 

इसके अलावा भारतीय बाजार में अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों की  पहुंच में कानूनी बाधा भी मौजूद है। भारत में वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें उगाना और बेचना निषेध है, जबकि अमेरिका में मकई, सोयाबीन समेत अधिकांश कृषि उत्पाद जीएम सम्बंधित है। डेयरी की बात करें, तो भारत में कुछ नियम बेहद साफ हैं जैसे डेयरी के आयातित उत्पातित उत्पाद उन पशुओं के होने चाहिए जो ऐसे चारा खाते हों, जिसमें मांस, खून आदि चीजें न हों। ऐसे नियम  सांस्कृतिक परंपरा और धार्मिक भावना से जुड़े हैं। भारत में करीब 40 प्रतिशत लोग शाकाहारी है, जिसका अनुपात विश्व में सब से अधिक है। अमेरिकी डेयरी उत्पादों का भारतीय नियमों से मेल खाना मुश्किल है।

कृषि व डेयरी को छोड़कर अमेरिका ऑटोमाबाइल, खासकर इलेक्टिक वाहन, वाइंस व पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर भी टैरिफ घटाना चाहता है। भारत टेक्सटाइल, रत्न, कपड़े, लेज़र वस्तुओं जैसे श्रम सघन सेक्टरों में अधिक टैरिफ छूट प्रात करना चाहता है।  

वाशिंटन में वार्ता विफल होने के बाद भारतीय वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सप्ताहांत में मीडिया को बताया कि भारत डेडलाइन के तहत वार्ता नहीं करता, बल्कि पारस्परिक लाभ और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। भारत को पक्का विश्वास है। भारत शक्ति के साथ वार्ता में भाग लेता है और किसी भी देश के साथ स्पर्द्धा करने की क्षमता रखता है। भारत के मुक्त व्यापार समझौते राष्ट्रीय हितों का बलिदान कभी भी नहीं करेंगे। उनके बयान से जाहिर है कि अमेरिका के प्रति भारत के रुख में कुछ बदलाव आया है। पहले भारत ने अमेरिका के ऊंचे टैरिफ से बचने के लिए छोटी रियायत की पहल कर अच्छा भाव दिखाने की कोशिश की। अब भारत के कठोर रुख की शुरूआत दिखायी दे रही है। 

बयानबाजी करने के साथ भारत ने जवाबी प्रहार के लिए ठोस कार्रवाई भी शुरू की है। भारत ने विश्व व्यापार संगठन को सूचना दी है कि वह कुछ अमेरिकी वस्तुओं पर बदला लेने के लिए टैरिफ लगाएगा। यह अमेरिका द्वारा भारत से आयायित गाड़ी व पुर्जों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का जवाब है। भारत ने सूचना में कहा कि अमेरिकी टैरिफ वृद्धि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के विरुद्ध है और द्विपक्षीय व्यापार पर भारी प्रभाव डालती है।

लोकमत के विचार में भारत अमेरिका व्यापार वार्ता गतिरोध में पड़ी है, पर वार्ता का द्वार बंद नहीं है। भारत के लिए महज़ पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है। वह बहुपक्षवाद पर कायम रहकर संघर्ष करने से ही अपने हितों की अच्छी सुरक्षा कर सकेंगे। वार्ता के परिणाम से दोनों देशों के समग्र सम्बंध और वैश्विक भू-राजनीतिक व आर्थिक परिस्थिति पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। इसके भावी विकास पर नज़र रखने की ज़रूरत है।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) 

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