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क्या विकसित भारत का लक्ष्य वर्ष 2047 में पूरा हो पाएगा ?

August 18, 2025

क्या विकसित भारत का लक्ष्य वर्ष 2047 में पूरा हो पाएगा ?

79वें स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर अपना सबसे लंबा भाषण दिया, जो 103 मिनट का था। इस भाषण में मोदी ने विकसित भारत 2047 से केंद्रित होकर अपने विजन का ठोस व्याख्यान किया, जो विकसित भारत के असली अर्थ और भारत का भावी रास्ता जानने के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित देश के बारे में एक मानक मापदंड मौजूद नहीं है। कुछ संस्थाएं एक देश के विकास स्तर का मूल्यांकन करते समय अकसर उस देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी, आद्योगीकरण के स्तर, वैज्ञानिक व सामाजिक स्तर समेत विभिन्न पहलुओं का ख्याल रखती हैं। आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि एक विकसित देश में प्रति व्यक्ति जीडीपी 20 हजार अमेरिकी डॉलर से अधिक होती है और मानव विकास सूचकांक (एजडीआई) 0.8 से अधिक होता है। मोदी के भाषण से जाहिर है कि विकसित भारत का विचार भारत की ठोस स्थिति और भारत के दृष्टिकोण पर आधारित है। विकसित भारत का मतलब एक आत्मनिर्भर, समृद्ध और शक्तिशाली भारत है। देश की स्वतंत्रता की शताब्दी तक यह लक्ष्य पूरा करने के लिए मोदी ने अपने संबोधन में दूसरे देशों पर निर्भर राष्ट्र से लेकर विश्व स्तर पर आत्मविश्वास से परिपूर्ण, तकनीकी रूप से उन्नत और आर्थिक रूप से सुदृढ़ देश बनने तक की भारत की यात्रा पर प्रकाश डाला।

स्थानीय विश्लेषकों के विचार में विकसित भारत एक महान और महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। भारत के पास उसे पूरा करने के लिए आधार है और भारत के सामने रणनीतिक मौका भी है, पर रास्ते में कई चुनौतियां मौजूद हैं, जिनका उचित निपटारा किया जाना है।

सबसे पहले, देश में राजनीतिक स्थिरता और विकास के उन्मुख नीतियों की निरंतरता दीर्घकाल तक बनाए रखनी होगी। यह भारत के पुनरुत्थान की पूर्वशर्त भी है। 21वीं शताब्दी की शुरूआत से भारत की अर्थव्यवस्था में तेज वृद्धि हो रही है, जो विश्व के मुख्य आर्थिक समुदायों में अग्रसर   है। 2024-25 वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी 42 खरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है, जो जापान को पीछे छोड़कर विश्व का चौथा सबसे बड़ा आर्थिक समुदाय बन गया है। अनुमान है कि 2-3 साल में भारत जर्मनी को पार कर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा आर्थिक समुदाय बनेगा। इसके पीछे एक बुनियादी कारण देश भर में आम स्थिरता है। स्थिरता बिना विकास असंभव है। पिछली सदी के अस्सी और नब्बे वाले दशक में भारत अस्थिर काल से गुजरा था। उस समय अलगाववादी व उग्रवादी शक्तियां सक्रिय थीं, सामाजिक मुकाबला तीव्र रहा और केंद्र सरकार बार-बार बदलती रही। इसलिए अर्थव्यवस्था भी गतिरोध, यहां तक कि दीवालिया होने के कगार पर पहुंची।

दूसरा, विनिर्माण उद्योग का विकास अधिक नाजुक और अहम हो गया है। इधर के कुछ सालों में भारत ने मेक इन इंडिया पर खास जोर दिया है। उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन समेत सिलसिलेवार प्रोत्साहन नीतियां प्रस्तुत की गयीं। ऑटो, फार्मा, मोबाइफोन आदि क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन के बावजूद विनिर्माण उद्योग की समग्र स्थिति संतोषजनक नहीं है। भारतीय सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत के जीडीपी में मैन्यूफेक्चरिंग का अनुपात वर्ष 2014 के 15.3 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2024 में 12.6 प्रतिशत हो गया, जो 60 साल में सबसे नीचा था। इधर के कुछ सालों में भारत ने सड़कों, रेलवे, समुद्री पोर्टों, हवाई अड्डों, ऊर्जा आदि बुनियादी संस्थापनों के निर्माण में भारी निवेश किया है और भविष्य में इस क्षेत्र में और बड़ी धनराशि लगाने की योजना भी है। बुनियादी संस्थापनों के निर्माण की गति के साथ अगर मैन्यूफेक्चरिंग का विकास गति नहीं पकड़ता, तो भारतीय आर्थिक ढांचे में बड़ा असंतुलन पैदा होगा और राजकीय घाटे का बोझ तेजी से बढ़ेगा। इसके अलावा, हर साल करोड़ों भारतीय युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं और रोजगार सवाल दिन ब दिन गंभीर हो रहा है। इस सवाल का समाधान भी मैन्यूफेक्चरिंग खासकर सघन श्रम व्यवसायों के तेज विस्तार पर निर्भर है।

तीसरा, महिला और जातिवाद आदि सामाजिक समस्याओं का समाधान करना है। अपने स्वतंत्रता संबोधन में मोदी जी ने नारी शक्ति की पूरी प्रशंसा की और महिलाओं को देश के निर्माण में अधिक योगदान देने की अपील की। पर वास्तविक जीवन में भारत में पुरुष-महिला समानता कायम करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है। उल्लेखनीय बात है कि देश में कभी-कभी विश्व को चौंकाने वाले बलात्कार के मामले और उन मामलों पर कुछ भारतीयों के रूख से महिलाओं का कमजोर स्थान जाहिर हुआ है। उधर, जाति का सवाल भारतीय समाज की गहराई और ग्रामीण क्षेत्रों में बना रहा है, जिसके कुप्रभाव की उपेक्षा नहीं की जा सकती। लंबे इतिहास से मौजूद इस समस्या का समाधान करने की जरूरत है।

अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में देखा जाए, वर्तमान विश्व गहरे और जटिल परिवर्तन से गुजर रहा है और परिवर्तन की गति तेज हो रही है। पर वैश्विक बहुध्रुवीकरण और आर्थिक भूमंडलीकरण का आम रूझान रोका नहीं जा सकता। वैश्विक दक्षिण का सामूहिक उदय विश्व के बड़े बदलाव का एक स्पष्ट प्रतीक है। वैश्विक दक्षिण और नवोदित बाजार देशों के एक अहम सदस्य के नाते भारत को ऐतिहासिक धारा के अनुरूप अपने पैर जमा कर बहुपक्षवाद पर डटकर कायम रहना है, जिससे अपने हितों और विकास अधिकार की अच्छी रक्षा की जा सके।

प्रधान मंत्री मोदी ने अपने भाषण के अंत में कहा कि परिश्रम में जो तपा है, उसने ही तो इतिहास रचा है। जिसने फौलादी चट्टानों को तोड़ा है, उसने ही समय को मोड़ा है। कहा जा सकता है कि विकसित भारत एक ब्लूप्रिंट है, उसे साकार करना ठोस कार्रवाइयों पर निर्भर करेगा।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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