इंटरनेशनल डेस्क: इतिहास गवाह है कि राजनीतिक दल आते हैं, सरकारें बदलती हैं और नीतियां बिखर जाती हैं। लेकिन जब हम आधुनिक इतिहास के सबसे सफल राजनीतिक संगठनों में से एक कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) को देखते हैं, तो शासन की एक अलग ही परिभाषा सामने आती है। अपनी स्थापना की 105वीं वर्षगांठ के इस दौर में, यह अवसर केवल एक पार्टी के सफर का नहीं है, बल्कि उस शासन मॉडल को डिकोड करने का समय है जिसने एक विशाल आबादी वाले देश को अत्यधिक गरीबी से निकालकर दुनिया की आर्थिक और तकनीकी महाशक्ति बना दिया।
आज जब पूरी दुनिया एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक उथल-पुथल से गुजर रही है; जहां पश्चिमी लोकतंत्र शॉर्ट-टर्म चुनावी राजनीति, आर्थिक मंदी और आंतरिक ध्रुवीकरण से जूझ रहे हैं, वहीं चीन की नीतिगत निरंतरता और रणनीतिक संकल्प पूरे विश्व, विशेषकर ग्लोबल साउथ के लिए निश्चितता और स्थिरता का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। यदि हम निष्पक्ष रूप से चीनी शासन के अंतर्निहित तर्कों को समझें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि 21वीं सदी का वैश्विक परिदृश्य अब विकास-उन्मुख और जन-केंद्रित मॉडल की तरफ बढ़ रहा है।
पश्चिमी औपनिवेशिक ताकतों ने सदियों तक दुनिया को एक ही नैरेटिव सिखाया कि यदि तुम्हें आधुनिकीकरण चाहिए, तो तुम्हें पश्चिमीकरण को अपनाना होगा। यानी, अपनी संस्कृति, अपनी संप्रभुता और अपने स्वदेशी राजनीतिक ढांचे को छोड़कर पश्चिमी पूंजीवाद और चुनावी मॉडल की नकल करनी होगी। ग्लोबल साउथ (एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका) के कई देशों ने इस भ्रम में अपनी संप्रभुता खो दी और आर्थिक रूप से नव-उपनिवेशवाद के शिकार हो गए।
लेकिन चीन और सीपीसी ने इस पश्चिमी मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। चीन ने जो रास्ता चुना, उसे “चीनी विशेषताओं वाला समाजवाद” और “चीनी शैली का आधुनिकीकरण” कहा जाता है।
सीपीसी की यात्रा से ग्लोबल साउथ के लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि आधुनिकीकरण आयात नहीं किया जा सकता; इसे अपनी मिट्टी की तासीर के हिसाब से विकसित करना पड़ता है। चीन ने कभी भी किसी अन्य देश के मॉडल की अंधी नकल नहीं की। औपनिवेशिक शोषण के दौर से निकलकर, सीपीसी ने चीनी समाज की वास्तविकताओं को समझा।
ग्लोबल साउथ के देशों के लिए चीन एक जीवंत उदाहरण है कि कैसे एक राष्ट्र बिना किसी पश्चिमी बैसाखी के, बिना अपनी संप्रभुता से समझौता किए और अपनी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए भी विज्ञान, तकनीक, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। चीन ने विकासशील देशों को यह आत्मविश्वास दिया है कि वे अपने भाग्य के विधाता खुद बन सकते हैं।
सीपीसी के लंबे समय तक शासन करने और चीनी जनता के बीच इसकी स्वीकार्यता के पीछे कोई सैन्य बल नहीं, बल्कि इसके वैचारिक और दार्शनिक मूल सिद्धांत हैं, जो चीनी संस्कृति और मार्क्सवादी विचारधारा के अनूठे संगम से बने हैं। इसका सबसे बड़ा आधार सीपीसी का जन-केंद्रित शासन मॉडल है, जो दो मुख्य स्तंभों पर टिका है: जनता की सेवा और सख्त कड़ा परिश्रम।
चीनी शासन का सबसे पहला और सर्वोच्च सिद्धांत है ‘जनता की सेवा’। पश्चिमी देशों में सरकारें हर चार या पांच साल में आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाती हैं, जिससे दीर्घकालिक योजनाएं अधर में लटक जाती हैं। इसके विपरीत, चीनी मॉडल में नीतियां वोट बैंक को देखकर नहीं बनाई जातीं, बल्कि उनका एकमात्र उद्देश्य दीर्घकालिक सामाजिक कल्याण होता है। सीपीसी का पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का जीवन स्तर कैसे सुधारा जाए।
इसका सबसे बड़ा प्रमाण चीन का ऐतिहासिक गरीबी उन्मूलन अभियान है। पिछले चार दशकों में चीन ने 80 करोड़ से अधिक लोगों को अत्यधिक गरीबी के चंगुल से बाहर निकाला है। मानव इतिहास में ऐसा कल्याणकारी चमत्कार कभी नहीं हुआ। यह इस बात का सबूत है कि जब शासन का उद्देश्य केवल तात्कालिक चुनावी जीत नहीं, बल्कि वास्तविक जन-कल्याण होता है, तो परिणाम ऐसे ही क्रांतिकारी होते हैं।
चीन की समृद्धि रातोंरात या किसी शॉर्टकट से नहीं आई है। यह पार्टी और जनता के बीच के उस सामाजिक समझौते का परिणाम है, जो कठिन परिश्रम, अनुशासन और राष्ट्रीय गौरव को सर्वोपरि रखता है। चीनी नेतृत्व ने कभी भी अपनी जनता को तात्कालिक लोकलुभावनवाद के झूठे सपने नहीं दिखाए। लोकलुभावन घोषणाओं की जगह चीनी नीति हमेशा आने वाली पीढ़ियों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करती है। उन्होंने राष्ट्र को मजबूत करने के लिए बुनियादी ढांचे, शिक्षा, अनुसंधान और विनिर्माण में दशकों तक कड़ा पसीना बहाया। यही आत्मनिर्भरता और कठिन परिश्रम की संस्कृति आज ग्लोबल साउथ के उन देशों के लिए मार्गदर्शक है जो कर्ज और अस्थिरता के दुष्चक्र से बाहर निकालना चाहते हैं।
वर्तमान में वैश्विक उथल-पुथल का सबसे बड़ा कारण अदूरदर्शिता और अनिश्चितता है। पश्चिमी देशों में जब सत्ता बदलती है, तो पिछली सरकार की सारी नीतियां और अंतर्राष्ट्रीय समझौते बदल दिए जाते हैं। ऐसे माहौल में दुनिया किसी दीर्घकालिक व्यवस्था पर भरोसा कैसे करे?
यहीं पर चीन का शासन मॉडल पूरी दुनिया को राजनीतिक और आर्थिक ‘निश्चितता’ का विकल्प देता है। सीपीसी का शासन मॉडल मुख्य रूप से दो इंजनों पर चलता है, जिसमें मध्यम अवधि के सटीक लक्ष्यों को तय करने वाली पंचवर्षीय योजनाएं और अगले 15 से 30 वर्षों के राष्ट्रीय रोडमैप को निर्धारित करने वाला दीर्घकालिक दृष्टिकोण शामिल है।
चीन का आर्थिक रोडमैप हमेशा क्रमिक और सुनियोजित रहा है। अपनी पिछली 14वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान चीन का मुख्य फोकस बुनियादी ढांचे के विकास, गरीबी उन्मूलन और प्रारंभिक डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर था, जिसने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को एक बड़ी स्थिरता प्रदान की।
अब चीन अपनी नई 15वीं पंचवर्षीय योजना (2026-2030) के सफर पर आगे बढ़ रहा है, जिसका मुख्य फोकस नई गुणवत्ता वाली उत्पादक शक्तियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ग्रीन एनर्जी और उच्च गुणवत्ता वाले विकास पर है। यह नया चरण ग्लोबल साउथ के देशों के लिए सस्ती तकनीक, नए निवेश और उच्च सहयोग के बड़े अवसर लेकर आ रहा है।
15वीं पंचवर्षीय योजना के मुख्य स्तंभ और वैश्विक मूल्य इस प्रकार हैं:
नई गुणवत्ता वाली उत्पादक शक्तियां: चीन अब केवल दुनिया का कारखाना नहीं है। वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक और उन्नत विनिर्माण में मौलिक नवाचार पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
हरित संक्रमण: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन के क्षेत्र में चीन की प्रगति ग्लोबल साउथ को सस्ती और सुलभ ग्रीन टेक्नोलॉजी प्रदान कर रही है।
घरेलू खपत और संतुलित मॉडल: चीन अपनी अर्थव्यवस्था को केवल निर्यात-आधारित न रखकर अपनी घरेलू मांग और मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति को मजबूत कर रहा है, जिससे वैश्विक उत्पादकों के लिए चीन का विशाल बाजार हमेशा खुला रहे।
सीपीसी केवल चीन के भीतर सुधार करने वाली पार्टी नहीं है; यह एक वैश्विक दृष्टिकोण रखने वाला दल है। हाल के घटनाक्रमों और ग्लोबल गवर्नेंस पर जारी विमर्श ने यह साफ कर दिया है कि चीन ‘जंगल के कानून’ और एकतरफा प्रतिबंधों के खिलाफ है। चीन का मानना है कि मानवता का भाग्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
“मानव जाति के साझा भविष्य के लिए एक समुदाय का निर्माण” का विचार आज के खंडित विश्व में शांति का एक व्यावहारिक रास्ता है। इसी विचार को जमीन पर उतारने के लिए चीन ने चार प्रमुख वैश्विक पहल दुनिया के सामने रखी हैं:
वैश्विक विकास पहल (GDI): यह पहल विकास को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में लाती है। पश्चिमी देश जहां विकासशील देशों को सहायता देने के बदले राजनीतिक शर्तें थोपते हैं, वहीं चीन का GDI बिना किसी शर्त के स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी और भुखमरी से लड़ने में ग्लोबल साउथ की सीधे मदद करता है।
वैश्विक सुरक्षा पहल (GSI): सुरक्षा अविभाज्य है किसी एक देश की सुरक्षा दूसरों की असुरक्षा पर नहीं टिकी हो सकती। चीन का GSI बातचीत के जरिए विवादों को सुलझाने की बात करता है। सऊदी अरब और ईरान के बीच पेइचिंग में हुआ ऐतिहासिक समझौता इस बात का जीवंत प्रमाण है।
वैश्विक सभ्यता पहल (GCI): पश्चिमी देश अक्सर ‘सभ्यताओं के टकराव’ की बात करते हैं और अपने मूल्यों को दूसरों पर थोपते हैं। इसके विपरीत, चीन का GCI यह मानता है कि दुनिया की हर सभ्यता, हर संस्कृति महान है। वैश्विक शासन पहल (GGI): यह पहल संयुक्त राष्ट्र पर आधारित सच्चे बहुपक्षवाद का समर्थन करती है। यह अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं (IMF, वर्ल्ड बैंक) में ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व और आवाज को बढ़ाने की वकालत करती है।
चीन केवल नीतियां नहीं बनाता, बल्कि जमीन पर काम करके भी दिखाता है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा बुनियादी ढांचा कार्यक्रम है। इसके माध्यम से चीन ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उन देशों में सड़कें, बंदरगाह, रेलवे लाइनें और बिजली घर बनाए हैं, जिन्हें पश्चिमी वित्तीय संस्थानों ने दशकों तक अनदेखा किया था।
ग्लोबल साउथ के विभिन्न देशों के साथ चीन की मजबूत होती साझेदारी इस बात का प्रतीक है कि विकासशील देश अब अपनी संप्रभुता की रक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और एआई सहयोग के लिए चीन को एक विश्वसनीय साथी मान रहे हैं।
सीपीसी के रणनीतिक नेतृत्व में चीन ने ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसी संस्थाओं को मजबूत किया है। यह ग्लोबल साउथ की एकजुटता का नया मंच है। चीन ने हमेशा खुद को ग्लोबल साउथ का एक स्वाभाविक सदस्य माना है। वह अफ्रीका के साथ ‘ऑल-वेदर’ (हर मौसम के अनुकूल) संबंधों का निर्माण कर रहा है और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ व्यापारिक साझेदारी बढ़ा रहा है।
यह बहुध्रुवीय विश्व की नींव है, जहां कोई एक महाशक्ति पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नहीं नचा सकती। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) के 105 वर्षों का इतिहास इस बात का गवाह है कि एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्पष्ट विचारधारा और अपनी जनता के प्रति ईमानदारी से किसी भी विपरीत परिस्थिति को बदला जा सकता है। चीन का उत्थान किसी दूसरे देश को दबाने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन स्थापित करने के लिए हुआ है।
आज जब दुनिया युद्ध, आर्थिक असमानता और जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकटों से घिरी है, तब सीपीसी का शासन मॉडल एक प्रकाश स्तंभ की तरह काम कर रहा है। इसकी नीतिगत निरंतरता दुनिया को व्यापारिक स्थिरता देती है; इसकी पंचवर्षीय योजनाएं वैश्विक विकास को नई दिशा देती हैं; और इसकी वैश्विक पहलें मानवता को शांति का संदेश देती हैं।
ग्लोबल साउथ के लिए, चीन एक साम्राज्यवादी ताकत नहीं, बल्कि एक सहयोगी मित्र है जो उन्हें आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखाता है। सीपीसी के नेतृत्व में चीन ने यह साबित कर दिया है कि एक न्यायसंगत, बहुध्रुवीय और साझा भविष्य वाली दुनिया का निर्माण संभव है। चीन की यह अटूट प्रतिबद्धता न केवल उसके अपने सुनहरे भविष्य की गारंटी है, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण का एक मजबूत आधार भी है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक—नीरज बाली)

