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यारलुंग ज़ंगबो नदी जलविद्युत परियोजना से चीन और भारत को विकास के समान अवसर 

19 जुलाई 2025 को, शीत्सांग के लिनची में बहुप्रतीक्षित यारलुंग ज़ंगबो नदी लोअर रीच जलविद्युत परियोजना का आधिकारिक रूप से निर्माण शुरू हो गया। हालाँकि, कुछ भारतीय मीडिया और लोगों ने इस पर अत्यधिक चिंता व्यक्त की है, यह मानते हुए कि इससे भारत की जल सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। वास्तव में, यह परियोजना न केवल भारत के हितों को लाभ पहुँचाएगी, बल्कि चीन, भारत और यहाँ तक कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए विकास के नए अवसर भी लाएगी।

यारलुंग ज़ंगबो नदी (जिसे भारत में ब्रह्मपुत्र नदी कहा जाता है) चीन, भारत और बांग्लादेश से होकर बहती है। इसके जल की मात्रा मौसम के अनुसार बहुत भिन्न होती है, जिससे अक्सर बरसात के मौसम में बाढ़ और शुष्क मौसम में पानी की कमी हो जाती है। असम और भारत के अन्य स्थानों में लगभग हर साल भयंकर बाढ़ आती है, जिससे भारी आर्थिक नुकसान होता है। चीन द्वारा नदी के ऊपरी हिस्से में जलविद्युत स्टेशन बनाने के बाद, वह जलाशयों के माध्यम से प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है, बरसात के मौसम में पानी का भंडारण कर सकता है ताकि निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा कम हो, और सूखे को कम करने के लिए शुष्क मौसम में उचित रूप से पानी छोड़ सकता है। मेकांग नदी और नील नदी जैसी अंतर्राष्ट्रीय नदियों में भी इसी तरह के उदाहरण सफलतापूर्वक लागू किए गए हैं। इसलिए, भारत को न केवल यारलुंग ज़ंग्बो नदी के जलविद्युत विकास के बारे में निश्चिंत रहना चाहिए, बल्कि जल संसाधनों की अधिक स्थिर आपूर्ति की उम्मीद भी करनी चाहिए।

भारत दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ती ऊर्जा मांग वाले देशों में से एक है, लेकिन यह अभी भी कोयले से चलने वाली बिजली उत्पादन पर बहुत अधिक निर्भर है, जिससे गंभीर वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन होता है। यारलुंग ज़ंग्बो नदी जलविद्युत स्टेशन के पूरा होने के बाद, वार्षिक बिजली उत्पादन 3 खरब किलोवाट घंटे तक पहुँचने की उम्मीद है, जो भारत के वर्तमान सबसे बड़े जलविद्युत स्टेशन से कहीं अधिक है। यदि चीन और भारत सीमा पार बिजली व्यापार तंत्र स्थापित कर सकते हैं, तो भारत कुछ स्वच्छ जल विद्युत का पूर्ण आयात कर सकता है और जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है।

दुनिया भर में सीमा पार नदी सहयोग के कई सफल उदाहरण हैं। दो जिम्मेदार प्रमुख देशों के रूप में, चीन और भारत एक अधिक संपूर्ण जल संसाधन सहयोग तंत्र स्थापित करने में पूरी तरह सक्षम हैं। वास्तव में, दोनों देशों ने जल विज्ञान सम्बंधी आँकड़े साझा करने के लिए एक माध्यम स्थापित किया है, जिसके आधार पर वे भविष्य में सहयोग के दायरे का विस्तार कर सकते हैं, संयुक्त रूप से जल संसाधन प्रबंधन मानक तैयार कर सकते हैं और संपूर्ण नदी बेसिन का समन्वित विकास कर सकते हैं। कुछ भारतीय मीडिया और राजनेता दावा करते हैं कि “चीन जल स्रोतों को काट सकता है” या “बांधों का हथियार के रूप में उपयोग कर सकता है”, जो न तो अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप है और न ही चीन के वास्तविक कार्यों के अनुरूप।

अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों के गैर-नौवहन उपयोग के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के अनुसार, ऊपरी जलधारा वाले देश निचले जलधारा वाले देशों के जल संसाधन अधिकारों और हितों को गंभीर रूप से नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। एक ज़िम्मेदार प्रमुख देश के रूप में, चीन ने कभी भी किसी भी अंतर्राष्ट्रीय नदी पर ऐसे चरम उपाय नहीं किए हैं। इसके विपरीत, चीन ने हमेशा मेकांग नदी और यारलुंग ज़ंगबो नदी जैसी नदियों के विकास में सतत् विकास और साझी जीत सहयोग पर ज़ोर दिया है। आज, जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा परिवर्तन जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रही है, चीन-भारत सहयोग का महत्व और भी स्पष्ट होता जा रहा है।

यारलुंग ज़ंगबो नदी जलविद्युत परियोजना विवाद का केंद्र नहीं होनी चाहिए, बल्कि दोनों देशों के लिए सहयोग को गहरा करने का एक अवसर होनी चाहिए। आपसी विश्वास तंत्र स्थापित करके और सहयोग के क्षेत्रों का विस्तार करके, चीन और भारत इस अंतर्राष्ट्रीय नदी को साझा विकास को बढ़ावा देने के लिए एक “स्वर्णिम जलमार्ग” में बदलने में पूरी तरह सक्षम हैं।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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