इंटरनेशनल डेस्क: यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कहा है कि अमेरिका द्वारा भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने का फैसला सही है। उनका कहना है कि जो भी देश रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं, उन पर सख्ती जरूरी है। जेलेंस्की ने दोहराया कि रूस तेल और गैस बेचकर अपने युद्ध के लिए पैसे जुटा रहा है। ऐसे में अगर अमेरिका रूस को मदद पहुँचाने वाले देशों के खिलाफ कड़े कदम उठाता है, तो इसमें कोई गलत बात नहीं है।
एक इंटरव्यू में जेलेंस्की ने कही ये बात
एक इंटरव्यू में जेलेंस्की से पूछा गया कि एससीओ शिखर सम्मेलन में भारत, चीन और रूस एक साथ दिखे। क्या ऐसे में अमेरिका का भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने का फैसला उल्टा पड़ गया है? इस पर जेलेंस्की ने जवाब दिया कि ट्रंप जानते हैं कि रूस को कैसे रोकना है। उन्होंने कहा कि पुतिन का असली हथियार तेल और गैस हैं, जिन्हें बेचकर वह अपनी ताकत बढ़ा रहा है। इस ताकत को कम करना जरूरी है।
रूस ने एक रात में 500 से ज्यादा ड्रोन और दो दर्जन मिसाइलें दागीं
पिछले हफ्ते रूस ने एक रात में 500 से ज्यादा ड्रोन और दो दर्जन मिसाइलें दागीं। इन हमलों का निशाना खासकर नागरिक क्षेत्र और ऊर्जा से जुड़ी सुविधाएं थीं। रूस सर्दियों से पहले यूक्रेन के बिजली और ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचाकर मुश्किलें खड़ी करना चाहता है। इन हमलों में कम से कम पांच लोग घायल हो गए।
जेलेंस्की ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के युद्ध रोकने की कोशिशों के बावजूद रूस लगातार हमले कर रहा है और 1,000 किलोमीटर की सीमा पर दबाव बनाए हुए है। जेलेंस्की ने हाल ही में ट्रंप के युद्धविराम और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से सीधे बातचीत के प्रस्ताव को मान लिया है। लेकिन क्रेमलिन ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है और अभी तक मानने के लिए तैयार नहीं हुआ है।
एससीओ सम्मेलन और पुतिन की मुलाकातें
एससीओ शिखर सम्मेलन में पुतिन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। अमेरिका का कहना है कि ये देश अलग-अलग तरीकों से रूस की मदद कर रहे हैं। उत्तर कोरिया ने रूस को सैनिक और गोला-बारूद दिया। चीन और भारत ने रूसी तेल खरीदा, जिससे रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली।
रूस पर और कड़े प्रतिबंध की मांग
जेलेंस्की ने टेलीग्राम पर लिखा, “पुतिन यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन पर कोई दबाव नहीं है। लेकिन असल में रूस को अभी तक पर्याप्त दबाव नहीं मिला है। खासकर युद्ध की अर्थव्यवस्था पर। यही वजह है कि रूस इस आक्रामक नीति को जारी रख पा रहा है।”

