Farooq Abdullah Moves to Defuse Dissent Within NC : श्रीनगर। नेशनल कॉन्फ्रेंस में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद बढ़े असंतोष को थामने के लिए पार्टी नेतृत्व सक्रिय हो गया है। अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने नाराज विधायकों की मांगों और शिकायतों को जायज बताते हुए कुछ मुद्दों पर जल्द कार्रवाई का भरोसा दिया है। हालांकि, कैबिनेट में बड़े फेरबदल और मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को हटाने जैसी प्रमुख मांगों पर अभी कोई ठोस फैसला नहीं हुआ है।
बैठक के बाद फारूक अब्दुल्ला और वरिष्ठ NC विधायक नजीर अहमद खान गुरेजी के बयानों का मकसद पार्टी में टूट की अटकलों को खत्म करना था। हालांकि, विधायकों की मुख्य मांगों- जिनमें कैबिनेट में बड़ा फेरबदल और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सलाहकार नासिर असलम वानी को हटाना शामिल है – पर नेतृत्व ने अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई ठोस फैसला नहीं सुनाया है। बैठक के बाद फारूक अब्दुल्ला ने उन खबरों को खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि नेशनल कॉन्फ्रेंस टूटने की कगार पर है; उन्होंने ऐसे दावों को पूरी तरह गलत बताया। उन्होंने कहा कि विधायकों की बात सुनी गई है और उनकी समस्याएं जायज हैं।
फारूक ने कहा, “हमने उनसे बात की है, उनकी समस्याएं जायज थीं और उन्हें बहुत ध्यान से सुना गया।” इससे संकेत मिलता है कि नेतृत्व उनकी चिंताओं पर विचार कर रहा है और उन्हें दूर करने के लिए कदम उठाएगा। उन्होंने कहा कि कुछ मुद्दों को जल्दी सुलझा लिया जाएगा, जबकि कुछ में समय लगेगा। उन्होंने जोड़ा कि इसका मकसद पार्टी और सरकार को मजबूत करना है। फारूक ने जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने और अनुच्छेद 370 तथा 35A पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के राजनीतिक रुख को भी दोहराया। नाराज विधायकों में प्रमुख आवाज बनकर उभरे गुरेजी ने भी इस बात को खारिज कर दिया कि यह समूह कोई अलग राजनीतिक दल बनाने की कोशिश कर रहा है।
गुरेजी ने कहा, “हम नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक हैं। हम हर बार अपनी समस्याएं लेकर पार्टी नेतृत्व के पास आते हैं।” उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर पार्टी नेतृत्व के साथ उनकी बैठकों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधायक पार्टी से अलग होने के बजाय, संगठन के भीतर ही अपनी चिंताएं उठा रहे हैं। उन्होंने कहा, “नेशनल कॉन्फ्रेंस से कोई अलग पार्टी नहीं बनी है।” गुरेज़ी ने बताया कि विधायकों ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के सामने अपनी बातें रखीं। उन्हें आश्वासन मिला है कि कुछ मुद्दों पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी, जबकि बाकी मामलों को धीरे-धीरे सुलझाया जाएगा।
यह आश्वासन ऐसे समय में आया है जब 27 अक्टूबर को हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद से असंतोष बढ़ रहा था; इस विस्तार में चार नए मंत्रियों को शामिल किया गया था। बताया जा रहा है कि कई विधायक मंत्रिमंडल के पुनर्गठन के तरीके से नाखुश थे। उनका मानना था कि वरिष्ठता, अनुभव और पार्टी के लिए उनके योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इस समूह की मुख्य मांगों में से एक मंत्रिमंडल (काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स) का पूरी तरह से पुनर्गठन करना है। विधायकों के चार्टर के बारे में आई खबरों के अनुसार, उन्होंने मांग की है कि 15 दिनों के भीतर मौजूदा आठों कैबिनेट मंत्रियों (जिनमें उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र चौधरी भी शामिल हैं) को बदल दिया जाए।
इसके बाद, विचार-विमर्श और योग्यता के आधार पर एक नया मंत्रिमंडल गठित किया जाए। विधायकों ने मुख्यमंत्री के सलाहकार के पद से नासिर असलम वानी को हटाने की भी मांग की है। उनका असंतोष केवल मंत्रिमंडल के गठन तक ही सीमित नहीं है; वे सरकार के कामकाज, राजनीतिक सहायकों की भूमिका और निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ पर्याप्त सलाह-मशविरा न किए जाने से भी नाराज हैं। एक और बड़ी चिंता विधायकों और सरकार के बीच के संबंधों को लेकर है। असंतुष्ट सदस्यों ने एक ऐसी प्रभावी व्यवस्था की मांग की है, जिसके जरिए निर्वाचित प्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े मुद्दे उठा सकें, प्रशासन से जवाब पा सकें और महत्वपूर्ण राजनीतिक व प्रशासनिक फैसलों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें।
उनके व्यापक प्रस्तावों में पार्टी के भीतर अधिक सलाह-मशविरा, संगठनात्मक निकायों की नियमित बैठकें, आंतरिक शिकायतों के समाधान के लिए एक तंत्र, और सरकार तथा पार्टी संगठन के बीच बेहतर तालमेल बिठाने के कदम शामिल हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक अन्य विधायक, बशीर अहमद वीरी ने नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद बताया कि विधायकों द्वारा दिए गए कुछ सुझावों और विश्वास बहाली के कदमों को जल्द ही लागू किया जाएगा, जबकि अन्य पर चरणों में काम होगा। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में इसके परिणाम दिखने लगेंगे।
हालांकि, मंत्रिमंडल को पूरी तरह से बदलने की मांग को स्वीकार करने या नासिर असलम वानी के संबंध में कोई फैसला लेने की अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। नेतृत्व का सार्वजनिक रुख मुख्य रूप से विधायकों की बात सुनने, उनकी चिंताओं को दूर करने और आंतरिक मतभेदों को एक बड़े संगठनात्मक संकट में बदलने से रोकने पर केंद्रित रहा है। यह असंतोष नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में सामने आया है।