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हाईकोर्ट ने की दो IAS अधिकारियों की याचिका खारिज

High Court Rejects Plea of Two IAS Officers : श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के चर्चित आर्म्स लाइसेंस घोटाले में दो IAS अधिकारियों को हाई कोर्ट से झटका लगा है। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने पांडुरंग कोंडबाराओ पोल और शाहिद इकबाल चौधरी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अभियोजन मंजूरी पर फैसला लेने से पहले अपना पक्ष सुनने और मामले में पक्षकार बनाए जाने की मांग की थी।

अधिकारियों ने कोर्ट से केंद्र सरकार को यह निर्देश देने का अनुरोध किया था कि उनके खिलाफ अभियोजन मंजूरी (प्रॉसिक्यूशन सैंक्शन) देने के प्रस्ताव पर कोई भी फैसला लेने से पहले, सरकार उनके पक्ष (रिप्रेजेंटेशन) पर विचार करे। मुख्य न्यायाधीश डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति रजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने कहा कि अधिकारियों द्वारा मांगे गए निर्देश का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अधिकारियों की दलील से ऐसा लगता है मानो उनका मानना ​​है कि जब तक कोर्ट निर्देश न दे, तब तक संबंधित अधिकारी मामले पर ठीक से विचार नहीं करेंगे।

यह याचिका 2004 बैच के AGMUT कैडर के IAS अधिकारी पांडुरंग कोंडबाराओ पोल (जो वर्तमान में दिल्ली सरकार के भूमि और भवन विभाग में सचिव हैं) और 2009 बैच के AGMUT कैडर के अधिकारी शाहिद इकबाल चौधरी (जो वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश सरकार में सचिव हैं) द्वारा दायर की गई थी। इन अधिकारियों ने ‘शेख मोहम्मद शफी व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य’ (PIL नंबर 9/2012) मामले में खुद को पक्षकार बनाने की मांग की थी। साथ ही, उन्होंने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को यह निर्देश देने की भी मांग की थी कि CBI द्वारा उनके खिलाफ अभियोजन मंजूरी के लिए भेजे गए प्रस्ताव पर फैसला लेने से पहले, उनके द्वारा दिए गए पक्ष (रिप्रेजेंटेशन) पर विचार किया जाए।

उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सकल भूषण ने (अधिवक्ता राहुल शर्मा के साथ मिलकर) दलील दी कि ‘डीम्ड सैंक्शन’ (मान ली गई मंजूरी) के सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता; बल्कि सक्षम अधिकारियों और कोर्ट को हर मामले के तथ्यों के आधार पर अलग-अलग मूल्यांकन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकारी केवल यह चाहते हैं कि अभियोजन मंजूरी के प्रस्ताव पर कोई भी निर्णय लेने से पहले उनके पक्ष पर विचार किया जाए। हालांकि, खंडपीठ ने इस निर्देश की मांग को अनुचित माना। कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि इसके बाद अधिवक्ता भूषण ने अपनी याचिका वापस लेने और DoPT के समक्ष अपने पक्ष (रिप्रेजेंटेशन) पर विचार कराने की अनुमति मांगी।

पीठ ने टिप्पणी की, “इस अदालत ने आवेदन को स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि वरिष्ठ वकील की दलील का मुख्य सार यह था कि जब तक अदालत निर्देश नहीं देती, तब तक प्रतिवादी मामले पर उचित रूप से विचार नहीं करेंगे। अदालत को यह बात सही नहीं लगी।” इसके बाद, आवेदन को वापस लिया गया मानकर खारिज कर दिया गया। अधिकारियों द्वारा कानून के तहत उचित कानूनी उपाय अपनाने की अनुमति मांगने पर, अदालत ने कहा कि इसके लिए अदालत से किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

सुनवाई के दौरान, जनहित याचिका (PIL) में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील एस.एस. अहमद ने पीठ को बताया कि गृह मंत्रालय (MHA) ने 6 जुलाई, 2026 के अदालत के आदेश के अनुपालन में एक अद्यतन स्थिति रिपोर्ट (status report) दाखिल की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय ने कहा है कि जांच एजेंसी और जम्मू-कश्मीर सरकार के साथ विस्तृत जांच और परामर्श के बाद, उसने प्रस्ताव पर अपनी राय और टिप्पणियां अंतिम रूप दे दी हैं। साथ ही, निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अंतिम निर्णय लेने के लिए अपनी राय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेज दी है।

अहमद ने DoPT को निर्देश देने का अनुरोध किया कि इस मामले पर लिया गया अंतिम निर्णय अदालत के समक्ष रखा जाए। इस दलील पर ध्यान देते हुए, खंडपीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश भारत के उप सॉलिसिटर जनरल, विशाल शर्मा को निर्देश दिया कि वे एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करें, जिसमें अदालत द्वारा समय-समय पर पारित आदेशों के अनुपालन का पूरा विवरण हो। जनहित याचिका को अब 23 दिसंबर, 2026 को फिर से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।

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