73 साल पुरानी जमीन मामले में ‘सुप्रीम’ राहत

sc-orders-compensation-in-land-case : श्रीनगर। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को 1953 में पुलिस स्टेशन के लिए बिना कानूनी प्रक्रिया के ली गई जमीन के मामले में किसान के वंशज को मुआवजा और किराया देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय की देरी के बावजूद व्यक्ति को राज्य की कथित गैर-कानूनी कार्रवाई का नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
1953 में कंगन में पुलिस स्टेशन बनाने के लिए सात कनाल और 18 मरला ज़मीन बिना किसी कानूनी प्रक्रिया या मुआवज़े के ज़बरदस्ती ले ली गई थी। चीफ़ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने अब्दुल रशीद वानी की याचिका पर गौर किया। वानी ने वकील महफूज़ अहसान नाज़की के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के 2022 के फ़ैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने 1953 में गंदरबल ज़िले में पुलिस स्टेशन के लिए ली गई ज़मीन पर कब्ज़े की मांग वाली रिट याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इस दावे में 68 साल की बहुत ज़्यादा और बिना वजह देरी हुई है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने वानी की ज़ोरदार दलीलों पर विचार किया कि भले ही देरी हुई हो, लेकिन उन्हें राज्य की गैर-कानूनी कार्रवाई की वजह से नुकसान नहीं उठाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लगभग सात दशकों की देरी के कारण वह अभी ज़मीन अधिग्रहण की नई प्रक्रिया शुरू करने का आदेश नहीं दे सकता। हालांकि, बेंच ने कहा कि वह ज़मीन अधिग्रहण अधिकारी को उस तारीख से ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश देगी, जब वानी ने 2021 में हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।
वानी की मदद करते हुए, बेंच ने ज़मीन अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश दिया कि वे 1953 से वानी के लिए किराए की गणना करें और उसका भुगतान करें, जब पुलिस स्टेशन बनाने के लिए ज़मीन ज़बरदस्ती ली गई थी। बेंच ने कहा कि ज़मीन अधिग्रहण और किराए की रकम का फ़ैसला आख़िरकार हाई कोर्ट करेगा। 28 जून, 2022 को हाई कोर्ट की एक डिवीज़न बेंच ने इस मामले में अपने विशेष अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था। बेंच ने कहा था कि याचिकाकर्ता को इतने लंबे समय बाद उस मामले को फिर से शुरू करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती जो असल में “खत्म हो चुका मामला” बन चुका था। वानी ने दावा किया था कि उनके पूर्वज गंदरबल ज़िले के मौज़ा कंगन में सर्वे नंबर 525 वाली 7 कनाल और 18 मरला ज़मीन के मालिक थे। याचिका के अनुसार, 1953 में बिना किसी औपचारिक अधिग्रहण या मुआवज़े के भुगतान के पुलिस स्टेशन के लिए ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया गया था। उन्होंने या तो कब्ज़ा वापस दिलाने या अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करके मुआवज़ा देने, या फिर 1953 से ज़मीन के इस्तेमाल और कब्ज़े के लिए किराया या मुआवज़ा देने की मांग की।
हाई कोर्ट ने गौर किया कि ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कथित घटना याचिका दायर करने से लगभग 68 साल पहले हुई थी और याचिकाकर्ता, जो लगभग 42 साल के हैं, ने यह नहीं बताया कि इतने लंबे समय के बाद यह मामला कोर्ट के सामने क्यों लाया गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि उनके पिता अनपढ़ थे और इसलिए वे पहले कोर्ट नहीं जा सके। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि याचिकाकर्ता खुद दो दशक से भी पहले बालिग हो चुके थे, फिर भी उन्होंने कानूनी मदद लेने की कोशिश नहीं की। हाई कोर्ट ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उन्होंने पिछले 20 वर्षों के दौरान अधिकारियों से संपर्क किया था, लेकिन वे कोई भी सहायक दस्तावेज़ पेश नहीं कर सके; उन्होंने 2014 की बाढ़ के दौरान सरकारी रिकॉर्ड नष्ट हो जाने का हवाला दिया। UT प्रशासन ने याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि यह बहुत देर से दायर की गई है; प्रशासन का कहना था कि 1953 से पुलिस विभाग का ज़मीन पर शांतिपूर्ण कब्ज़ा रहा है और इतने लंबे समय के बाद संपत्ति से संबंधित रिकॉर्ड पेश करना मुश्किल है। हाई कोर्ट ने कहा था, “हर कानूनी मामले का एक निश्चित समय सीमा के भीतर निपटारा हो जाना चाहिए और उसे अनिश्चित काल तक जीवित नहीं रहने दिया जाना चाहिए।”
