जम्मू : सतवारी इलाके में नेशनल हाईवे परियोजना के तहत चल रहे ध्वस्तीकरण अभियान का आज दूसरा दिन जारी रहा। अभियान के दौरान करीब 39 दुकानों को ध्वस्त किए जाने के बाद प्रभावित दुकानदारों और स्थानीय लोगों में चिंता का माहौल बना हुआ है। मौके की तस्वीरों में बड़ी संख्या में लोग जमा दिखाई दे रहे हैं, जबकि कई दुकानों के स्थान पर मलबा बिखरा पड़ा है। अभियान के दूसरे दिन स्थानीय विधायक विक्रम रंधावा मौके पर पहुंचे और प्रभावित दुकानदारों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनीं।
उन्होंने दुकानदारों को भरोसा दिलाया कि प्रशासन उनके साथ खड़ा है और किसी भी परिवार को उसके हाल पर नहीं छोड़ा जाएगा। विधायक ने कहा, मेरी नजरों में ये दुकानदार नहीं, मेरे परिवार के लोग हैं। उन्होंने कहा कि ये इसी क्षेत्र के लोग हैं और उनकी परेशानी को समझना तथा उसका समाधान निकालना उनकी जिम्मेदारी है। विधायक के मुताबिक, दुकानदारों को करीब दो वर्ष पहले नोटिस दिए गए थे।
नेशनल हाईवे की महत्वपूर्ण परियोजना होने के कारण साइट क्लियरेंस जरूरी थी, लेकिन प्रभावित दुकानदारों को समय देने और समाधान निकालने के प्रयास किए गए। उन्होंने कहा कि दुकानदारों की मांग जमीन उपलब्ध कराने की थी, लेकिन प्रशासन ने अब 8.12 फीट की दुकानें बनाकर देने का निर्णय लिया है। एक दुकान की अनुमानित लागत करीब 18 लाख रुपए बताई गई है। नई दुकानें बनने तक कैसे चलेगा घर? ध्वस्तीकरण के बाद दुकानदारों की सबसे बड़ी चिंता रोजी-रोटी की है। नई दुकानें तैयार होने में समय लगेगा, ऐसे में परिवारों का खर्च कैसे चलेगा, इस मुद्दे पर भी प्रशासन से बातचीत की जा रही है।
विधायक ने कहा कि डिवकॉम और प्रशासन के साथ मिलकर प्रत्येक प्रभावित दुकानदार की पहले की मासिक आय का आकलन कराया जाएगा, ताकि नई दुकानें हैंडओवर होने तक उनके लिए वैकल्पिक आर्थिक सहायता की व्यवस्था पर विचार किया जा सके। उन्होंने निर्माण कार्य में तेजी लाने की मांग करते हुए कहा कि अगर सामान्य तौर पर दुकानों को तैयार करने में छह महीने लगते हैं तो कोशिश होनी चाहिए कि काम तीन महीने में पूरा किया जाए।
मौके पर डॉ. नरेन्द्र सिंह समेत अन्य जनप्रतिनिधि भी पहुंचे और दुकानदारों से बातचीत की। दूसरे दिन भी प्रभावित दुकानदार अपनी दुकानों और भविष्य को लेकर चिंतित नजर आए। अब दुकानदारों की निगाहें प्रशासन के उस आश्वासन पर हैं कि नई दुकानें कितनी जल्दी तैयार होती हैं और तब तक उनके परिवारों की रोजी-रोटी के लिए क्या ठोस व्यवस्था की जाती है।

