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हमले के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने से चूकी सरकार : राधा कुमार

The government failed to restore statehood : श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की पूर्व वार्ताकार प्रो. राधा कुमार ने कहा है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद घाटी के लोगों की ओर से हिंसा की खुलकर निंदा किए जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने का महत्वपूर्ण अवसर गंवा दिया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक भरोसा बहाल करने के लिए अब राज्य का दर्जा जल्द बहाल किया जाना चाहिए।

‘राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी पर उठाए सवाल’

प्रो. कुमार ने कहा है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद केंद्र ने जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने का एक अहम मौका गंवा दिया। उनका तर्क है कि घाटी के लोगों द्वारा हिंसा को नकारने के बाद राजनीतिक स्तर पर भरोसा बढ़ाने वाला कदम उठाया जाना चाहिए था। पत्रकारों से बात करते हुए कुमार ने कहा कि कश्मीरियों की ओर से शांति मार्च निकालने और हमले की व्यापक निंदा करने से यह साफ हो गया कि लोग हिंसा से दूर हो चुके हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के लिए राज्य का दर्जा बहाल करने के अपने बार-बार दिए वादे को पूरा करने का यह सही समय था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने केंद्र के वादों और बार-बार जनता को दिए गए आश्वासनों के बावजूद हो रही देरी पर सवाल उठाए।

‘दोहरी सत्ता व्यवस्था लोकतंत्र को कमजोर कर रही’

उन्होंने कहा कि लंबे समय तक केंद्र शासित प्रदेश बने रहने के कारण जम्मू-कश्मीर के लोग लोकतांत्रिक अधिकारों और सम्मान से वंचित रहे हैं। मौजूदा शासन व्यवस्था की आलोचना करते हुए कुमार ने ‘कश्मीर न्यूज़ ट्रस्ट’ के अनुसार, चुनी हुई सरकार और उप-राज्यपाल के बीच दोहरी सत्ता व्यवस्था को “हास्यास्पद” बताया और कहा कि मौजूदा सिस्टम ने लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर किया है। उन्होंने इस अटकल को भी खारिज कर दिया कि जम्मू-कश्मीर में बीजेपी की सरकार बनने के बाद ही राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि निकट भविष्य में ऐसी स्थिति राजनीतिक रूप से अवास्तविक है और इससे राज्य का दर्जा बहाल होने में अनिश्चित काल के लिए देरी हो सकती है।

‘राज्य का दर्जा टलने से भरोसे की खाई और गहरी’

कुमार ने आगे आरोप लगाया कि इस लंबी देरी ने नई दिल्ली और कश्मीर के बीच भरोसे की कमी को और बढ़ा दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उग्रवाद कश्मीर के लोगों के कारण नहीं, बल्कि सीमा पार के कारकों से प्रेरित है, और इसलिए इस क्षेत्र के लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखने को सही नहीं ठहराया जा सकता। उनकी ये टिप्पणियां जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक दर्जे पर फिर से शुरू हुई राजनीतिक बहस और राजनीतिक दलों द्वारा पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की लगातार मांगों के बीच आई हैं।

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