नेशनल डेस्क: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम् को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मुसलमान किसी भी इंसान, देवता या चीज़ की इबादत नहीं कर सकता, क्योंकि इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत की जाती है। उन्होंने कहा कि हमें कोई परेशानी नहीं है अगर दूसरे लोग वंदे मातरम् गाते हैं, लेकिन मुसलमान इसे नहीं गा सकते क्योंकि इसमें कुछ पंक्तियाँ पूजा और देवी-देवताओं से जुड़ी हुई हैं।
अल्लाह के अलावा किसी की इबादत नहीं: मदनी
अरशद मदनी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं, और यह उनकी आस्था है कि अल्लाह के साथ किसी और को इबादत में शामिल नहीं किया जा सकता। वंदे मातरम् के कुछ अंतरों में देश को देवी दुर्गा के रूप में प्रस्तुत किया गया है और पूजा करने की बात कही गई है, जो इस्लामी मान्यता के खिलाफ है। इसलिए मुसलमान इसे गा नहीं सकते।
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
मदनी ने कहा कि भारतीय संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है। कोई भी व्यक्ति दूसरे को मजबूर नहीं कर सकता कि वह ऐसा गीत या नारा बोले जो उसके धर्म के खिलाफ हो। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट का भी ऐसा ही फैसला है कि किसी को राष्ट्रगान या किसी भी गीत के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
वतन से मोहब्बत अलग, वतन की पूजा अलग
उन्होंने कहा कि देश से प्यार करना और देश की पूजा करना, ये दोनों अलग बातें हैं। मुसलमान देश से प्यार करते हैं और आज़ादी की लड़ाई में उनकी कुर्बानियाँ इसका बड़ा प्रमाण हैं। वंदे मातरम् न बोलना देशभक्ति की कमी नहीं है।
1937 का ऐतिहासिक फैसला भी बताया
मदनी ने बताया कि 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को लिखा था कि वंदे मातरम् के सिर्फ पहले दो बंद राष्ट्रीय गीत के लिए ठीक हैं, बाकी हिस्से धार्मिक रूप से विवादित हैं। इस वजह से कांग्रेस ने भी सिर्फ दो बंदों को स्वीकार किया था। इसलिए पूरे गीत को सभी पर थोपना इतिहास के खिलाफ है।
राजनीति के लिए विवाद न बढ़ाएं
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् पर विवाद को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। इससे समाज बंटता है। ऐसे समय में जब देश की आर्थिक स्थिति पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, संसद में इन मसलों पर चर्चा की जरूरत है, न कि ऐसे विवादों को बढ़ाने की।
इस्लामी नजरिए से वंदे मातरम्
वंदे मातरम् का पूरा अर्थ है: “मां, मैं तेरी पूजा करता हूँ।” यह देवी दुर्गा की स्तुति में लिखा गया गीत है। इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की पूजा या उसके आगे झुकना मना है। इसलिए मुसलमान इसे गाने से परहेज करते हैं।
मदनी का स्पष्ट संदेश
मौलाना मदनी ने कहा कि हम अल्लाह के अलावा किसी को पूज्य नहीं मानते। चाहे कुछ भी हो जाए, हम शिर्क (खुदा के साथ किसी और को शामिल करना) को स्वीकार नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “मर जाएँगे तो इस्लाम पर, और जिएँगे तो इस्लाम पर।”

